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जिस दिन भ्रम की पट्टी टूटी उस दिन तेरा क्या होगा…करारा जवाब है धर्मेन्द्र पटेल की कविता में

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

सरकार के रवैये के प्रति लोगों में रोष है. आम आदमी में हर सरकार में परेशान होता है. बीजेपी ने अतिश्योक्तिपूर्ण भाषणबाजी से लोगों के मन में इतनी आस जगा दी थी कि पूरे ना होने पर आस गुस्से में बदल गई है. सभी अपने-अपने ढ़ंग से ये गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

पेशे से अध्यापक धर्मेन्द्र सिंह पटेल बांदा के बबेरू क्षेत्र के रहने वाले हैं. पढ़िए उनकी ये शानदार कविता आज की व्यवस्था और सरकार पर करारा प्रहार कर रही है.

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जज्बातों से रोज न खेलो, जयकारो से क्या होगा

जीत गया मै जीत गया, बस कहने से क्या होगा

धधक रही है आग ये कैसी, चुप रहने से क्या होगा

बदल गया है चाल चरित्र, बस कहने से क्या होगा

रोज शहीद होते वीरों पर, बस फूल चढाने से क्या होगा

घोर मुशीबत में अन्नदाता, सब्जबाग दिखाने से क्या होगा

दुनिया से दिल हाथ मिलाया, प्यार से झूले खूब झुलाया

ले लो तुम मेरा भी हाल, मैं हूँ देश का बदहाल किसान

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कथनी करनी मे फर्क बहुत है, चिल्लाने से क्या होगा

बात गरीबों की, काम अमीरों का

लोकतंत्र के मंन्दिर में, नित कसमें खाने से क्या होगा

बंद करो सपनो का व्यापार, दो खाली हाँथो को रोजगार

बेरोजगार फौलादी हांथो के मिल जाने से, तेरी सत्ता का क्या होगा

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सत्ता का विकराल नशा है, हाहाकार खूब मचा है

भाषण में तकदीर बदल दी, सच में ये कब होगा

जिस दिन भ्रम की पट्टी टूटी, उस दिन तेरा क्या होगा

जज्बातों से रोज न खेलो, जय कारो से क्या होगा ।

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