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महामना रामस्वरूप वर्मा के ‘मानवतावाद’ और पिता की ‘चुप्पा तकनीकि’ से IAS बने दिव्यांशु पटेल

नई दिल्ली। नीरज भाई पटेल ( नेशनल जनमत ब्यूरो) 

अर्जक संघ के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा के मानवतावादी विचारों और  पिता की दी हुई चुप्पा तकनीकि और खुद के परिश्रम की बदौलत उत्तर प्रदेश के अंबेडकनगर निवासी दिव्याशुं पटेल आईएएस बन गए हैं. सभी की जानकारी में है कि दिव्यांशु की रैंक 204 है.

वर्तमान में पिता की सर्विस की बजह से बलरामपुर में रहने वाले दिव्यांशु अंबेडकरनगर के अजईपुर अरई गांव के मूल निवासी हैं. ये भी सामाजिक सर्किल में ज्यादातर लोगों को पता चल गया है. तो आगे बढ़ते हैं. दरअसल दिव्यांशु में सामाजिकता की जड़ उनके दादा के कामों में छुपी हुई हैं आज भी उनके 80 साल के दादा अयोध्य़ा प्रसाद वर्मा अजईपुर के चरित्र निमार्ण विद्यालय में नि:शुल्क पढ़ाने जाते हैं.

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अपने दादा और पिता के साथ अंबेडकरनगर में दिव्यांशु

सामाजिक रहते हुए भी दिव्यांशु से आईएएस बनने की प्रेरणा और कहानी जानने के लिए नेशनल जनमत के संपादक नीरज भाई पटेल दिल्ली विश्वविद्यालय के पास स्थित दिव्यांशु पटेल के संघर्ष कक्ष में पहुंचे. वहां नीरज की मुलाकात उनके प्रोफेसर पिता डॉ. अवधेश वर्मा से हो गई उन्होंने अपने और दिव्यांशु के संघर्ष की दास्तान बताते हुए एक चुप्पा तकनीकि का नाम लिया. इसके बाद इस तकनीकि के बारे में जानने की इच्छा बढ़ी तो हमने उनसे विस्तार से बात की.

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संघर्षशील पिता के संघर्षरत पुत्र हैं दिव्यांशु-

दिव्यांशु के संघर्ष से पहले हम उनके पिता के बारे में जानते हैं . दिव्यांशु के पिता डॉ.अवधेश प्रसाद वर्मा वर्तमान में एमएलके डिग्री कॉलेज बलरामपुर में संस्कृत के प्रोफेसर है. माता जी का निधन हो चुका है.  अवधेश वर्मा जी बताते हैं कि मैंने अपने जीवन में जो भी सीखा संघर्ष से सीखा वही संघर्ष के गुण मेरे बेटे में हैं. दोनों ने गलत और ज्यादती को बर्दाश्त करना नहीं सीखा है.

20 साल तक संस्कृत का गोल्डमेडल लेकर भटकना पड़ा- 

अवधेश वर्मा ने 1980 में पोस्ट ऑफिस में बाबू की नौकरी से अपना सफर शुरू किया. नौकरी में रहते हुए अपने संस्कृत की योग्यता को दुनिया के सामने लाने के लिए संघर्ष करते रहे. 20 साल तक संस्कृत में गोल्ड मेडलिस्ट का तमगा और पीएचडी की डिग्री लेकर कॉलेज दर कॉलेज भटकने के बाद अन्तत: 2001 में उच्चतर सेवा आयोग से उसी बलरामपुर महाविद्यालय में प्रवक्ता बनकर आ गए जहां से उन्होंने पढ़ाई की थी.

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पूर्व पुलिस उपाधीक्षक और पटेल प्रतिनिधि सभा के संयोजक ज्ञान सिंह पटेल कहते हैं कि दिव्यांशु को आज जो हासिल हुआ है उसमें इनके पिता का बहुत योगदान है. दिव्यांशु के पिता बेहद ही सामाजिक और त्यागी व्यक्ति हैं. समाज की हर जरूरत में साथ में खड़े रहते हैं. वर्तमान में इनके पिता पटेल प्रतिनिधि सभा बलरामपुर के उपाध्यक्ष भी हैं.

क्या है चुप्पा तकनीकि- 

डॉ. अवधेश ने बातचीत में कहा कि मैं अपने बेटे को कोई प्रयोगशाला नहीं समझता कि उसके ऊपर कोई प्रयोग  करने लगूं मैंने अपने जीवन में जो सीखा है वहीं संस्कार और गुण अपने बेटे के जीवन में डालने की कोशिश की है. चुप्पा तकनीकि के बारे में बोले कि मैंने दिव्यांशु को बोला था कि इतनी खामोशी से पढ़ाई करो कि तुम्हारे बगल में रहने वाले को भी ना पता चले कि तुम आईएएस की तैयारी करते हो बोले इससे असफलता का डर और सफलता को बोझ मन में हावी नहीं होता.

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बहन तक को नहीं पता था भाई ने आईएएस का इंटरव्यू दिया है- 

बड़ी बहन प्रज्ञा वर्मा के साथ दिव्यांशु

दिव्यांशु की इकलौती बड़ी बहन प्रज्ञा वर्मा पर भी चुप्पा तकनीकि लागू थी, उनको तक नहीं पता था कि उनके भाई का प्री में चयन हुआ फिर मेन्स में चयन हुआ और फिर फाइनल इंटरव्यू देने जा रहे हैं. यहां तक कि बलरामपुर में दिव्यांशु के पिता और दिल्ली में खुद दिव्यांशु के करीबी लोगो तक को नहीं बताया गया था कि दिव्यांंशु का चयन सिविल परीक्षा के प्री में हो गया है और अब वो मेंस दे रहे हैं.

चुप्पा तकनीकि का लाभ-

भारतीय समाज बंद समाज है. यहां हर किसी को अपनी सफलता से ज्यादा चिंता दूसरे की असफलता की रहती है और उसी में वो खुश रहना चाहता है. ऐसे में आपके ऊपर सामाजिक बंधन और दवाब इतने हावी हो जाते हैं कि आप अपनी असफलता को बार-बार बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं होते. इन बेवजह के दिखावटी अपनापन या तिरस्कार से बचने के लिए खामोशी से अपना काम करते चलो सफलता खुद सबको बता देगी आप क्या काम कर रहे थे.

आईएएस बनते ही दिव्यांशु ने पिता की तकनीकि का शुक्रिया फेसबुक पर कुछ इस अंदाज में किया-  

“मेहनत इतनी खामोशी से करो कि सफलता धूम मचा दे !
आईएएस 204 रैंक ,
बाकी सब बाद में ,
अभी के लिए जय भीम जय भारत !”

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पिता की प्रेरणा से चल रही है सरदार पटेल ज्ञान स्थली-

बलरामपुर में समाज के सहयोग के बनी सरदार पटेल ज्ञान स्थली इनके पिता के संरक्षण में ही बन पाई है. आज भी दिव्यांशु के पिता  डॉ. अवधेश वर्मा इस विद्यालय के पूरी तरह से समर्पित रहते हैं. इस विद्यालय में नि:शुल्क मेडीकल कैम्प से लेकर समाज के हित की सभी जरूर बैठकें भी आयोजित होती हैं. मकसद बस समाज को शिक्षित और सक्षम बनाना है. इनके पिता के इसी त्याग का परिणाम है जो दिव्यांशु पटेल आज आईएएस बन गए हैं.

इनके पिता ने ही दिव्यांशु को परीक्षा की तैयारी कराई. पढ़ने लिखने और लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहने का पाठ पढ़ाया. जिससे वह आज इस मुकाम पर है.

बीमारी के दौरान भी संस्कृत पढ़ाते रहे- 

दिव्यांशु ने बताया कि मेन्स से तुरंत पहले उनके पिता बीमार पड़ गए. इलाज कराने के लिए दिल्ली आए तो डॉक्टर ने आराम की सलाह दी. फिर क्या था पिता का इलाज और दिव्य़ांशु की संस्कृत की तैयारी साथ-साथ चलती रही. दो महीने में ही पिता ने दिव्यांशु की ऐसी तैयारी करवाई कि संस्कृत पर एकाधिकार जमाने वाले मठाधीशों को पीछे छोड़ते हुए दिव्यांशु ने संस्कृत विषय में 500 में से 303 नम्बर प्राप्त किए. जानकारी के अनुसार संस्कृत विषय में इस साल ये दूसरे नम्बर पर सबसे ज्यादा नंबर हैं. दिव्यांशु कहते हैं पिता के अलावा डीयू के डॉ. आयुष गुप्ता, डॉ. रंजन कुमार त्रिपाठी और डॉ. राजेन्द्र कुमार के सहयोग से मैं इतने अधिक नबंर लाने में कामयाब रहा.

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संस्कृत के लिए अच्छे गाइड की दिक्कत- 

दिव्यांशु कहते हैं कि संस्कृत  विषय के बारे में लोगों को भ्रम है कि संस्कृत विषय सिर्फ नंबर बढ़ाने के काम आता है जबकि संस्कृत में में कई अध्याय जीएस बढ़ाने के लिए उपयोगी हैं. संस्कृत का सिलेबस छोटा और कसा हुआ है लेकिन दिल्ली में किसी भी कोचिंग संस्थान में संस्कृत को लेकर प्रोपर गाइडेंस नहीं है. दिव्यांशु ने बताया कि उनके पिता बचपन से ही उनको संस्कृत के श्लोक पढ़ाते थे.पंचतंत्र की कहानियां पढ़वाते थे. नाटकों में रुचि जगाते थे उसका फल ये रहा कि संस्कृत ने ही उन्हें अच्छी रैंक दिला दी.

मानवतावादी अधिकारी साबित होंगे दिव्यांशु- 

दिव्यांशु ने बताया कि महामना रामस्वरूप के तर्क, डॉ. अंबेडकर की शिक्षित होकर सामाजिक समता की प्रेरणा, राजा होते हुए भी शाहूजी महाराज का वंचितों को हक देने का जज्बा, क्रांति ज्योति ज्योतिबाफुले की समाज के अंतिम छोर तक शिक्षा पहुंचाने की ललक और सरदार बल्लभ भाई पटेल के देश निर्माण के कठोर निश्चयों से मैं प्रेरणा पाता रहा हूं इसलिए जातीय धर्म से परे होकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक मदद करने की कोशिश करूंगा. दिव्यांशु कहते हैं कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में बीपी सिंह और अर्जुन सिंह ने अच्छे घरों से आने के बाद अपना योगदान दिया इसे कैसे भूला जा सकता है.

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पिता के गाइड ने रखा दिव्यांशु का नाम- 

डॉ. अवधेश वर्मा ने बताया कि दिव्यांशु का नाम उनके संस्कृत पीएचडी के गाइड डॉ. माधवराज द्विवेदी ने रखा. दरअसल उनके सबसे छोटे बेटे का नाम था दिव्यांशु धर. गाइड होने की बजह से दिव्यांशु के पिता को तकरीबन हररोज उनके घर जाना पड़ता था ऐसे में दिव्यांशु भी कई बार अपने पिता के साथ उनके यहां चले जाते थे, दिव्यांशु को बेटे की तरह स्नेह देने के कारण डॉ. माधवराज ने अपने बेटे के नाम पर दिव्यांशु का नाम रख दिया.

एनसीसी ने सिखाया अनुशासन- 

तस्वीर बताती है कि दिव्यांशु पटेल बचपन से ही अनुशासित जीवन वाले व्यक्ति रहे हैं. लेकिन उनको सही रूप में अनुशासन एसएसपी इंटर कॉलेज फैजाबाद में एनसीसी के डायरेक्टर मेडर डॉ. ओपी सिंह के निर्देशन और प्रिंसिपल डॉ. वीरेन्द्र त्रिपाठी के सिखाए मूलमंत्र से उन्होंने जीवन को अनुशासित रखना सीखा. ये 12 वीं में सीखे मंत्र परीक्षा की तैयारी के साथ ही जीवन में आगे के सफर में भी काम आते रहेंगे.

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