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आखिर डोकलाम से भारत-चीन ने हटा ही ली अपनी सेनाएं, जानिए कौन हारा-कौन जीता ?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो ।

कई महीनों से चले आ रहे गतिरोध के बाद भारत और चीन ने डोकलाम से सेना हटाने का फैसला किया है. इस अहम निर्णय के बाद लोगों की उत्सुकता ये जानने की भी है कि आखिर इस विवाद में दोनों तरफ से हेकड़ी दिखाने के बाद फायदा किसको हुआ ?

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में दोनों देशों के हितों और चिंताओं पर द्विपक्षीय वार्ता का हवाला देते हुए सेना हटाने की कार्रवाई शुरू करने की घोषणा की है.

इस फैसले पर इंस्टीट्यूट ऑफ़ चायनीज़ स्टडीज़ में सीनियर फ़ेलो अतुल भारद्वाज से इसके मायने समझने की कोशिश की. इसके क्या मायने हैं, अतुल ने बताया.

सेना हटाने के फैसले के क्या है मायने?

डोकलाम को लेकर भारत और चीन के बीच पिछले तीन महीनों से जो तनाव बना हुआ था, वो अब कम होगा और एक नया दौर शुरू होगा. ब्रिक्स सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं. इससे पहले सेना हटाने का ये फ़ैसला अहम है.

सम्मेलन के लिए यह ज़रूरी था कि ब्रिक्स के दो महत्वपूर्ण सदस्य देश तनावमुक्त माहौल में एक साथ बैठ पाएं और सहजता के साथ बातचीत कर सकें.

चीन ने यह अल्टीमेटम दिया था कि जब तक भारत डोकलाम से अपनी सेना नहीं हटाता है, तब तक माहौल अच्छे नहीं समझे जाएंगे.
डोकलाम से सेना हटाने के दोनों देशों के फैसले के बाद तनाव कम होगा.

आगे क्या होगा?

लेकिन इस स्थिति का लंबे दौर तक टिकना मुश्किल है. क्योंकि सुरक्षा भारत की चिंता है. एक सच्चाई यह भी है कि चीन की भारत में निवेश से जुड़ी संभावनाएं और मेक इन इंडिया के तहत चीनी बाज़ार में भारत की पहुंच के चलते इन हालात का ऐसे ही बने रहना कठिन है.
कड़े रुख के बावजूद ऐसा फैसला क्यों?

यह समझदारी भरा कदम है कि दोनों देशों ने सेना हटाने का फैसला किया है. क्योंकि जो भी कुछ हो रहा था उसका नतीजा युद्ध ही होता, जो शायद दोनों देश नहीं चाहते हैं. इससे न सिर्फ जानमाल का नुकसान होता, बल्कि जिन मोर्चों पर दोनों देश एक-दूसरे का समर्थन करते हैं, वह भी बिगड़ जाता.

भारत और चीन, दोनों देश सार्क, संघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन, ब्रिक्स जैसे मंचों पर एक-साथ बैठते हैं, बातचीत करते हैं. यहां दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों पर बातचीत होती है, जिसे सुरक्षा चिंता की वजह से खत्म नहीं किया जा सकता.

कूटनीतिक तौर पर किस देश की हुई जीत?

कूटनीति में ऐसी ही स्थिति पैदा की जाती है कि दोनों पक्ष एक-एक कदम आगे बढ़ाएं. मुद्दा ये था कि भारत ने डोकलाम में अपनी सेना भेजी थी और उस समय कूटनीतिक तौर पर सोचा नहीं गया था.

चीन अगर उस क्षेत्र में गलत सड़क का निर्माण कर रहा था तो भारत को कूटनीतिक तौर पर इसका विरोध करना चाहिए था. सीधे सेना भेजने से रिश्ते तनावपूर्ण हुए. चीन भड़क गया और तनाव इस कदर बढ़ गया था कि चीन युद्ध की घोषणा भी कर सकता था. उस स्थिति से अब हम आगे बढ़ चुके हैं और यह एक सकारात्मक कदम है.

क्या भारत फ्रंटफुट पर था?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत फ्रंटफुट पर था. भारत की सेना जिस जगह खड़ी थी वह हमारे देश का हिस्सा नहीं है. वह भुटान और चीन की है. भारत को कोई नुकसान नहीं था. हम बेहतर स्थिति में थे.

भारत ने क्या सीखा?

भारत को ये जानना ज़रूरी है कि युद्ध से कोई नतीजा नहीं निकलता. भारत और पाकिस्तान के बीच चार युद्ध हुए हैं, इससे कोई नतीजा निकला क्या?

चीन और हमारे बीच में एक आर्थिक खाई है. उस खाई को सेना, सुरक्षा या फिर किसी और तरीके से भरा जाए, यह हमें सोचना होगा.
पाकिस्तान और भारत के बीच भी खाई है, जिसे पाकिस्तान ने नकारात्मक तरीके से भरने की कोशिश की है. अब तय करना होगा कि चीन के साथ हम वो खाई कैसे भरेंगे.

(बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम से साभार )

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