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पढ़िए कैसे शिक्षा, न्याय और मीडिया आर्यों के कब्जे मे हैं, तीनों में भ्रष्टाचार चरम पर है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक दिलीप मंडल लिखते हैं कि आर्यों के यूरोप से आने की लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की थ्योरी को जिस जेनेटिक प्रमाण की जरूरत थी, वह आख़िरकार पूरी हो गई। इसके साथ ही, दुनिया भर के इतिहासकारों के बीच जारी इस विवाद का अंत हो गया कि आर्य कहाँ से चलकर भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। अब तक सारा कनफ्यूजन इसलिए था क्योंकि शुद्ध आर्य जैसा कुछ वैज्ञानिकों को नहीं मिला। ( तिलक ने आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी लोकमान्य तिलक ने अपनी किताब आर्कटिक होम ऑफ़ दी वेदाज  में बताया है कि आर्यों का मूल निवास स्थान आर्कटिक था)

अब Y क्रोमोजोम के प्रमाण से सिद्ध हुआ कि आर्य अपने साथ परिवार लेकर नहीं आए थे। सिर्फ पुरुष आए थे। इसलिए सब मिल जुल गया है।
स्त्रियों के प्रति धर्मग्रंथों में हिक़ारत का भाव, ताड़न की अधिकारी वगैरह शायद इसी लिए आया है। मनुस्मृति में औरतों पर शूद्रों से ज्यादा सख़्ती है, क्योंकि औरतें उनकी थी नहीं वो इसी देश की मूलनिवासी थीं.

मूल रिसर्च पेपर की लिंक आपकी तसल्ली के लिए –https://bmcevolbiol.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12862-017-0936-9

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इसी थ्योरी के सच होने पर ज्योतिबाफुले पर पुस्तक लिखने वाले अन्तर्राष्ट्रीय शोधकर्ता संजय श्रमण जोठे ने एक विश्लेषण किया है.जो आर्यों की चालाकियों को जानने के लिए पढ़ना जरूरी है-

आर्य आक्रमण थ्योरी के सच साबित हो जाने के बाद अब कुछ आर्यों की तरफ से एक नई बात आयेगी, वे कहेंगे कि पहले अफ्रीका से इंसान आये भारत को खोजा और इसे आबाद किया, फिर शक हूंण आये और बस गये, फिर तुर्क मंगोल मंगोल मुगल आये. लेकिन वे अंग्रेजों का नाम नहीं लेंगे, वरना उनसे पूछा जाएगा कि अंग्रेजों को भगाया क्यों?

हालाँकि मूलनिवासी की बहस भी पूरी तरह ठीक नहीं है कोई भी किसी जगह का मूलनिवासी होना सिद्ध करे तो उसके पक्ष और विपक्ष में पर्याप्त तर्क हैं और मूलनिवासी होने के दावे से फायदे और खतरे भी बराबर हैं.

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समझिए आर्यों ने जातियां और वर्ण क्यो बनाए- 

अंग्रेजों की शेष मेहमानों से तुलना ठीक भी नहीं है. अंग्रेजों के आक्रमण की आर्य आक्रमण से तुलना करना इसलिय पसंद नहीं की जाती क्योंकि अंग्रेजों ने शक, हूण मंगोल तुर्क मुगल आदि की तरह भारतीयों से विवाह और खानपान के रिश्ते नहीं स्वीकार किये वे हमेशा एलीट ही बने रहे और लूटते रहे. उनकी लूट भौगोलिक दृष्टि से साफ़ थी. वे भारत को लूटकर लूट का माल ब्रिटेन भेजते थे. जमीन के भूगोल में उनकी लूट साफ़ नजर आती थी.

यही काम आर्य भी करते हैं, वे भी शेष भारतीयों से भोजन और विवाह के रिश्ते नहीं बनाते, इसीलिये उन्होंने वर्ण और जाति बनाई. अंग्रेजों की लूट से आर्य ब्राह्मणों की लूट कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हुई है. इन्होने जमीन के भूगोल से ज्यादा समाज के भूगोल में लूट और लूट का संचय किया है. भारत की 85 प्रतिशत से अधिक आबादी को अपने ही गाँव गली मुहल्ले और देश में अपनी ही जमीन पर सामाजिक भूगोल (सोशल जियोग्राफी) में अलग थलग और अधिकार हीन बनाया गया है. आर्य ब्राह्मणों ने इन बहुसंख्यको से की गयी लूट का माल अपनी जातियों और वर्णों में भरने का काम किया है.

गौर से देखिये आर्यों की लूट अभी भी जारी है और भयानक पैमाने पर चल रही है- 

भारत के मंत्रियों, (कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री) आईएएस आईपीएस, मुख्य ठेकेदार, मन्दिरों के पुजारी, न्यायपालिका के जज, विश्वविद्यालयों के कुलपति, डीन, विभाग प्रमुख, प्रोफेसर और टीचर कौन हैं? किस वर्ण और जाति से आते हैं इसे ध्यान से देखिये. इन सभी पदों पर 50 से लेकर 70 प्रतिशत तक यूरेशियन ब्राह्मण आर्य बैठे हुए हैं. जो शेष भारत की जनसंख्या से भोजन और विवाह के संबंध रखना पसंद नहीं करते हैं.

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असल भारतीय जनसंख्या में भारत के जमीनी भूगोल में इन यूरेशियन आर्यों की आबादी 3 प्रतिशत से भी कम है लेकिन भारत के सामाजिक भूगोल में इन्होने 70 प्रतिशत स्थान घेरा हुआ है. जो लोग गहराई से जानते हैं वे समझते हैं कि भारत हर मामले में पिछड़ा क्यों है.

जिन जिन विभागों और मुद्दों पर आर्यों ने कमान संभाल रखी है उन विभागों और मुद्दों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब है. आप सभी पिछड़े हुए विभागों को उठाकर देखिये इनकी कमान किसने कब से कैसे संभाल रखी है.

शिक्षा, न्यायपालिका और मीडिया का हाल आप देख रहे हैं- 

तीन उदाहरण देखिये, पहला शिक्षा व्यवस्था जिसमे 60 प्रतिशत से अधिक आर्य ब्राह्मण हैं, दूसरा भारत की न्याय व्यवस्था जिसमें 70 प्रतिशत तक आर्य ब्राह्मण हैं. और तीसरा मीडिया जिसमे नब्बे प्रतिशत तक यूरेशियन आर्यों के वंशज हैंं इन तीनों की क्या स्थिति है हम जानते हैं. भारत की शिक्षा व्यवस्था दुनिया में सबसे पिछड़ी नहीं तो बहुत पिछड़ी जरूर है. न्यायपालिका में करोड़ों मुकद्दमे पेंडिंग हैं और मीडिया तो अभी चुड़ैल का श्राप, अश्वत्थामा की चड्डी, और स्वर्ग की सीढियां खोज रहा है.

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डाइवर्सिटी से ही सभ्य बनेगा भारत- 

भारत को अगर सभ्य बनाना है तो सभी जातियों और वर्णों का प्रतिनिधित्व होना जरुरी है. ये देश के हित की सबसे महत्वपूर्ण बात है. ग्लोबल डेवेलपमेंट या सोशल डेवेलपमेंट की जिनकी थोड़ी सी समझ है वे जानते हैं कि पार्टिसिपेटरी डेवेलपमेंट या गवर्नेंस क्या होता है. सहभागी विकास ही सच्चा तरीका है. इसीलिये भारत में यूरेशियन आर्यों को आवश्यकता से अधिक जो अधिकार दिए गये हैं उन्हें एकदम उनकी मूल जनसंख्या अर्थात तीन प्रतिशत तक सीमित कर देने चाहिए ताकि 85 प्रतिशत भारतीयों – क्षत्रिय, राजपूत, वैश्य, वणिक छोटे व्यापारी किसान, शूद्र दलितों आदिवासियों और स्त्रियों को समानता और प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके.

ये भारत के भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है- 

मेरी इस पोस्ट से कईयों को गलतफहमी और तकलीफ हो सकती है, मैं दोबारा स्पष्ट कर दूँ कि मैंने ये पोस्ट इसीलिये मूलनिवासी के मुद्दे को गैर महत्वपूर्ण बनाकर लिखी है, मेरी ये पोस्ट इस बात पर केन्द्रित है कि हम या आप या कोई और मूलनिवासी हों या न हों, हम भारतीय नागरिक के रूप में भोजन और विवाह के व्यवहारों में एकदूसरे को कितना शामिल करते हैं. यही अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात है. समानता और बंधुत्व सहित स्वतन्त्रता भारत की ऐतिहासिक संस्कृति रही है. लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था बनाकर समता, स्वतन्त्रता और बंधुत्व को बाधित करने वालों को देश के दुश्मनों की तरह पहचानना भी जरुरी है.

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