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फेसबुक पर मायावती व भीमवाद को गाली देने वाली ‘मैडम अपिरिचित’ को एक बहुजन का खुला खत

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

सोशल मीडिया पर इन दिनों वैचारिक लड़ाई तेज होती जा रही है. कॉरपोरेट मीडिया में जो खबरें बहस का हिस्सा नहीं बन पा रहीं है वहीं खबरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं. पिछले दिनों फेसबुक पर शिवानी एंजेल ( बदला हुआ नाम) नामक एक महिला ने मायावती पर एक आपत्ति जनक पोस्ट डाली जिसके जवाब में भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव सूरज कुमार बौद्ध ने उस महिला को एक खुला पत्र लिखा जो आजकल सोशल मीडिया में वायरल हो गया है. सूरज बसपा सुप्रीमों मायावती पर आपत्तिजनक टिप्पणीं करने वाली उस महिला को लिखे हुए पत्र में लिखते हैं कि…

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एक गुलाम महिला को एक आजाद बहुजन का जवाब…

आदरणीय मैडम अपरिचित,

अभी अभी आपका फेसबुक पोस्ट पढ़ा। आपने Mayawati Fans Club नामक ग्रुप में अपनी मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए बहुजन समाज की बेटी बहन मायावती को अपशब्द कहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आपकी यह फेसबुक आईडी ओरिजिनल होगी। वैसे मैं आपकी भाषा में आपके इस फेसबुक पोस्ट का जवाब दे सकता था लेकिन मैं ऐसा करना उचित नहीं समझता। अतः मैं इसी सार्वजनिक सोशल मीडिया मंच द्वारा आपको खुला जवाब दे रहा हूं। अक्सर लोग कहते रहते हैं कि बोलने की आजादी की अपनी एक सीमा होनी चाहिए। मेरे ख्याल से आजादी की अपनी सीमा ही नहीं होती बल्कि उसके साथ कुछ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हुई होती हैं।

जातिवाद का जहर तो आपके डीएनए में है- 

आप एक महिला हैं। एक महिला के इज्जत और आबरु के मर्म को बेहतर समझ सकती थीं। खैर आपसे कुछ तहज़ीब की उम्मीद करना मेरी नादानी होगी क्योंकि जातिवाद का जहर आपके DNA में घुसा हुआ है। आप मायावती जी की सोच से बेशक असहमत हों, मैं भी असहमत हो सकता हूं लेकिन इतनी हद तक नीचे गिर जाना आपकी सांस्कृतिक और पारिवारिक पहचान को दर्शाता है। दरअसल आप इस बात को पूरी तरह से भूल चुकी है कि आप जो आज खुली हवा में सांस ले रही हैं और अपने पसंद के पुरुष मित्र के साथ कंधे से कंधा मिलाकर घूम टहल पा रही हैं तो यह केवल बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की वजह से ही है।

शुद्र पशु और नारी के मर्म को आप क्या समझें- 

वर्ना मनु स्मृति की विधान के तहत जब आपको देवदासी प्रथा, बाल विवाह, नियोग प्रथा, विधवा मुंडन प्रथा... जैसे वीभत्स कुरीतियों का सामना करना पड़ता तो पता चलता की गुलामी क्या होती है। आखिर जब आप झेली नहीं हैं तो आपको “ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी” की मर्म क्यों महसूस होगी.

मैं ऐसा इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मैं आपके पुरातन परिभाषा में अछूत समाज से आता हूं बल्कि ऐसा इसलिए लिख रहा हूं ताकि आपको इस बात का एहसास हो सके कि मनु की संस्कृति में महिलाओं की स्थिति शूद्रों और अछूतों से भी बदतर एवं भयावह थी। आपने इंसानियत की मर्यादा को लांघते हुए न केवल बहुजन समाज की बेटी बहन मायावती जी का अपमान किया है बल्कि पूरे महिला समाज का अपमान किया है।

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आपको पता है नाक कटने का सांकेतिक अर्थ क्या है- 

जब बात आपने रामायण की काल्पनिक कथा छेड़ ही दी हैं तो हम आपको बताना चाहेंगे कि उसी काल्पनिक कथा में यह उल्लेखित है कि रावण ने अपनी बहन सुर्पणखा की शादी किसी राम या लक्ष्मण से करवाने का कभी कोई प्रस्ताव नहीं रखा था। यह तो राम और लक्ष्मण का चरित्र था कि उन्होंने सुपर्णखा का नाक काटा। और नाक काटना या कटना के मायने क्या होता है यह आप बखूबी जानती हैं।

रही बात रावण की तो रावण सीता को ससम्मान अपने लंका ले जाता है लेकिन सीता के साथ कोई बदसलूकी नहीं करता है। यह रावण का स्वाभिमान और महिला सम्मान ही था कि उसने अपने कब्जे में रखी हुई एक बेसहारा महिला के इज्जत पर हाथ नहीं डाला। यह रावण का स्वाभिमान और महिला सम्मान ही था कि एक बहन की इज्जत और आबरू को बचाने के लिए वह पुरी लंका को दांव पर लगा देता है। यह है रावण की महानता ! यह है रावण का विशाल हृदय !

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पब्लिसिटी की प्यास जायज है। लोग अलग-अलग तरीके अपनाकर पब्लिसिटी हासिल करते हैं लेकिन खुद दुर्गा बनकर पब्लिसिटी स्टंट हासिल करने के लिए किसी महिषासुर को साजिशन बलि का बकरा मत बनाइए। हम मानते हैं कि आजकल कुछ राजनीतिक पार्टियां ऐसी हैं जहां पर बहुजन समाज की बहन बेटियों को गाली देने पर पद मिलता है (उदाहरणस्वरूप दयाशंकर सिंह एवं उनकी पत्नी स्वाति सिंह) लेकिन अगर यही हरकत कोई आपके साथ करे तो आपको कैसा लगेगा? आपने अपने फेसबुक पोस्ट में कटाक्ष करते हुए लिखा कि “सारे भीमवादी भी खुश ”

आंबेडकर ने महिलाओं के लिए जो किया आप जानती भी हैं- 

मैडम अपरिचित, मैं आपसे पूछना चाहता हूं की भीमवाद और अंबेडकरवाद से आपका मतलब क्या है। बाबासाहेब के सोच पर तो आपने कटाक्ष कर दिया पर क्या आपने कभी बाबा साहब अंबेडकर के सोच को पढ़ा है? महिलाओं के प्रति बाबा साहब अंबेडकर की महान सोच उनके इस कथन में अभिव्यक्ति होती है कि ” मैं किसी समुदाय की प्रगति  उसकी महिलाओं ने जो प्रगति हासिल की हैं उससे मापता हूँ। महिलाओं के हक और अधिकारों को लेकर लड़ाई लड़ने वाले इतने महान पुरुष के बारे में आपको कटाक्ष करते हुए शर्म नहीं आई?

वैसे मैं ज्यादा कुछ ना लिखकर आखरी लाइन में यह बात लिखते हुए अपनी बात को खत्म करता हूं कि आप एक बार मनुस्मृति को जरूर पढ़िएगा और जब मनुस्मृति पढ़ लीजिएगा तो उसके बाद एक बार हिंदू कोड बिल, हिंदू लॉ और भारतीय संविधान का भाग-3 और भाग-4 जरूर पलटकर पढ़िएगा। हो सकता है कि आपकी मानसिकता में कुछ परिवर्तन आए, हो सकता है कि आपके अक्ल में थोड़ी इजाफ़ा हो जाए।

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