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लड़खड़ाते गुजरात मॉडल से निकले जनादेश ने, विपक्ष को 2019 में मजबूती से लड़ने की संजीवनी दे दी है

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

याद कीजिये 2015 में सड़क पर पाटीदार समाज था। 2017 में सड़क पर कपड़ा व्यापारी थे। इसी बरस सड़क पर दलित युवा थे और सभी सड़क पर से ही गुजरात मॉडल की धज्जियां उड़ा रहे थे।

तो अगस्त 2015 में हार्दिक रैली के बाद भी कांग्रेस जागी नहीं। 2017 में सूरत के कपड़ा व्यापारियों के इस हंगामे के बाद भी कांग्रेस नहीं जागी। कुंभकरण की नींद में सोयी कांग्रेस जब जागी तब राहुल गांधी ने गुजरात की जमीं पर कदम जब रखे।

तो कंधे का सहारा उस तिकड़ी ने दिया जो कांग्रेस के नहीं थे और कांग्रेस के लिये इन कंधों ने आक्सीजन का काम किया। इस तिकड़ी ने पहली बार 22 बरस की बीजेपी सत्ता को शह देने की स्थिति में कांग्रेस को ला खड़ा किया।

2019 के लिए आस जगा दी- 

2014 से लगातार गुजरात मॉडल से घबराती कांग्रेस में 2019 की आस जगा दी और गुजरात के नक्शे पर बीजेपी की जीत का रथ 22 बरस में सबसे कमजोर होकर जीतता हुआ थमा वही कांग्रेस 22 बरस के दौर में सबसे मजबूत होकर हारते हुये दिखायी दी। पहली बार सवाल यही उठा कि क्या 2019 अब नरेन्द्र मोदी के लिये आसान नहीं है। और 2019 में टक्कर आमने सामने की होगी।

तो पन्नों को पलटिये। याद कीजिये। 2014 में मोदी थे। उनका गुजरात मॉडल था और गुजरात मॉडल के ब्रांड एंबेसेडर बने मोदी का जवाब भी किसी के पास नहीं था। इसी ब्रांड एम्बेसेडर ने हर किसी को खाक में मिलाया। जनता ने भी माना एकतरफा जीत जरुरी है।

तो सिलसिला महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, जम्मू कश्मीर में बीजेपी की सरकार बनी। तो दिल्ली और बिहार में बीजेपी हारी पर जनादेश एकतरफा ही आया। उसके बाद असम ,पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, यूपी में भी जनादेश एकतरफा ही आया। और पंजाब में भी काग्रेस जीती तो फैसला एकतरफा था। इस फेहरिस्त में आज हिमाचल भी जुड़ा।

गुजरात मॉडल लड़खड़ाया- 

जिस गुजरात मॉडल की गूंज 2014 में थी । वही मॉडल गुजरात में लड़खड़ाया तो कांग्रेस टक्कर देने की स्थिति में आ गई और पहली बार गुजरात के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को ये एहसास कराया कि वह लड़े तो जीत सकती है। वहीं बीजेपी को सिखाया जब गुजरात में कांग्रेस बिना तैयारी टक्कर दे सकती है तो फिर 2019 की बिछती बिसात इतनी आसान भी नहीं होगी।

गुजरात चुनाव परिणाम ने सोई कांग्रेस को जगाया है तो फिर अगले बरस जिन चार प्रमुख राज्यो में चुनाव होने है उसमें कर्नाटक छोड़ दे तो राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की ही सरकार है।

यानी गुजरात के आगे और 2019 से पहले एक ऐसी बिसात है जो चाहे अनचाहे देश में राजनीतिक टकराव को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ी कर रही है, जहां आमने सामने नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी होंगे ही। इस स्थिति में क्षेत्रीय क्षत्रपों को अपने आस्तित्व के लिये मोदी या राहुल की छांव में आना ही होगा।

मोदी और राहुल की टीमें भी स्पष्ट हैं- 

मौजूदा वक्त की बिसात साफ बतलाती है कि मोदी के साथ अगर नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल, चन्द्रबाबू नायडू, महबूबा मुफ्ती है और पासवान हैं। तो दूसरी तरफ राहुल गांदी के साथ लालू अखिलेश, ममता, नवीन पटनायक, करुणानिधि पवार, फारुख अब्दुल्ला, औवैसी हैं।

उसमें शिवसेना कहां खड़ी होगी, कोई नहीं जानता। वामपंथी और बीएसपी यानी मायावती को भी राहुल साथ लाना चाहेंगे और तेलंगाना के चन्द्रशेखर राव किस दिशा में जायेंगे, इसका इंतजार भी करना होगा।

ये बिसात दो सवालों को भी जन्म दे रही है। पहला एक वक्त कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन का चक्र पूरा हुआ और 2019 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष गठबंधन की सियासत जागेगी। और दूसरा क्या धर्म जाति से इतर आर्थिक मसलों पर टिके मुद्दे जो गुजरात माडल की मुश्किलों से निकले हैं, वह 2019 में पालिटिकल डिसकोर्स ही बदल देंगे।

मोदी-शाह की जोड़ी ने वरिष्ठों को दरकिनार कर दिया है- 

मोदी और अमित शाह की जोड़ी के चलते बीजेपी में कद्दावर रहे नेताओं की कोई अहमियत या कोई पकड़ खत्म हो गई है। उम्र के लिहाज से हाशिये पर जा चुके आडवाणी, मुरली मनमोहर जोशी और यशवंत सिन्हा कोई मायने रखते नहीं।

2014 से पहले राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज गडकरी रविशंकर प्रसाद या उमा भारती की जो भी महत्ता रही हो उनकी तुलना में एक अदद लोकसभा सीट ना जीत पाने वाले वाले अरुण जेटली ज्यादा मजबूत हैं। कैबिनेट पदों पर आसीन निर्मला सीतारमण, स्मृति इरानी, पीयूष गोयल, धर्मेन्द्र प्रधान, प्रकाश जावडेकर एक नयी ब्रिग्रेड है।

राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कमान भी दिल्ली के हाथ में है- 

इस कतार में राज्यो में भी आसीन बीजेपी मुख्यमंत्रियों की जमीन को परखे तो सभी की डोर दिल्ली के हाथ में है। मसलन महाराष्ट्र में फडनवीस, हरियाणा में खट्टर, झारखंड में रघुवर दास, उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत, असम में सर्वानंद सोनोवाल, मणिपुर में बिरेन सिंह और यूपी में योगी आदित्यनाथ। ये सभी ऐसे नेता हैं, जो झटके में सीएम बने और इनकी पहचान दिल्ली से इतर होती नहीं है।

इस कड़ी में सिर्फ योगी आदित्यनाथ ही ऐसे हैं जिनकी एक पहचान थी लेकिन वो भी एक सीमित दायरे में। खुद में सिर्फ मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ के रमन सिंह, राजस्थान की वसुंधरा राजे और गोवा के पर्रिकर पहचाने जाते हैं वो भी मोदी युग के पहले के मुख्यमंत्री हैं।

बीजेपी भी कांग्रेस की राह पर है- 

यानी चाहे अनचाहे बीजेपी या कहे मोदी उसी राह पर चल पड़े हैं, जिस राह पर कभी कांग्रेस थी। क्योंकि अस्सी के दशक तक कांग्रेस के क्षत्रप का कद दिल्ली हाईकमान तय करता था। अब  ध्यान दे तो बीजेपी भी उसी राह पर है।

कांग्रेस से हटकर बीजेपी में सबसे बडा अंतर सत्ता के लिये चुनावी मशकक्त जो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह करते है और उसमें ब्रांड एंबेसेडर की तरह पीएम मोदी खुद को झोंक देते हैं। उसका कोई जोड़ कांग्रेस के पास नहीं है।

कांग्रेस जब तक तैयार होती है बीजेपी जमीनी बिसात बिछा चुकी होती है। कांग्रेस जब तक क्षत्रपों पर निर्णय लेती है तब तक बीजेपी बूथ स्तर पर पहुंच चुकी होती है।

बड़ा सवाल राहुल कांग्रेस को कितना बदलेंगे- 

अब बड़ा सवाल ये है कि क्या गुजरात की सीख कांग्रेस की कुंभकर्णी नींद तोड़ पाएगी। जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं तो क्या पारंपरिक राजनीति करने वाली कांग्रेस खुद को बदल पाएगी।

राहुल गांधी कैसे संघर्ष करेंगे? राहुल गांधी गैर कांग्रेसियों के कंधे के आसरे पर टिकेंगे या फिर क्षत्रपो को भी खड़ा करेंगे। ये सवाल इसलिये जरुरी है क्योकि गुजरात में बीजेपी को टक्कर देने की खुशी हो सकती है। पर हिमाचल में हार से आंखे ऐसी मूंद ली गई हैं जैसे कांग्रेस वहां चुनाव लड़ ही नहीं रही थी।

बीजेपी शासित तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की तैयारी- 

जब बीजेपी शासित तीन राज्य चुनाव के लिये तैयार हो रहे हैं तब कांग्रेस के किस नेता को किस राज्य की कमान सौपी गई है, ये अब भी संस्पेंस ही है। मसलन राजस्थान में गहलोत क्या करेंगे और सचिन पायलट की भूमिका क्या होगी, कोई नहीं जानता।

छत्तीसगढ में जोगी के बाद कांग्रेस की कमान किसके हाथ में है, जो निर्णय लें तो सभी मानें कोई नहीं जानता। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ या दिग्विजिय सिंह। कमान किसके हाथ में रहेगी इस पर से अभी तक पर्दा उठा ही नहीं है।

तो कांग्रेस क्या राहुल के भरोसे रहेगी या फिर संगठानत्मक रुपरेखा पर भी विचार करने का वक्त आ गया है। क्योंकि गुजरात के जनादेश ने ये संदेश तो दे दिया कि मोदी का मॉडल अगर वोटर फेल भी मान लें तो फिर वह चुने किसे । मोदी के विकल्प का इंतजार मोदी के फेल होने के इंतजार में जा टिका है।

राहुल की परीक्षा पहले कांग्रेस को मथने की ही है- 

तो क्या पहली बार राहुल गांधी की परीक्षा बीजेपी से टकराने से पहले कांग्रेस को ही मथने की है? क्या पहली बार राहुल गांधी को कांग्रेसियों में विपक्ष के तौर पर संघर्ष करने का माद्दा जगाना है? क्योंकि सच तो यही है कि पारंपरिक कांग्रेसी भी कांग्रेस से छिटके हैं।

पारंपरिक वोट बैक भी कांग्रेस से छिटका है। क्योंकि काग्रेस के पास देश की आंकाक्षा से जोड़ने के लिये ना कोई विजन है ना ही कोई  रास्ता। युवा तबके की आकांक्षा जब किसी की सत्ता तले पूरी हो नहीं पा रही है तो फिर राहुल के सामने ये सवाल आयेगा कि कि मोदी को जनता खारिज कर भी दें तो भी राहुल को विकल्प क्यों माने।

क्योंकि चुनावी लोकतंत्र का आखरी सच तो ये भी है कि देश में बेरोजगारी का सवाल, किसानों की त्रासदी का सवाल, बढ़ते एनपीए का सवाल, बैकिंग रिफार्म से जनता के सामने संकट पैदा होने के सवाल सब कुछ चुनावी जीत तले दब गए।

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