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गोरखपुर दंगा मामले में खुद को बचाने के लिए अपनी सरकार की पूरी ताकत झोंक दी है CM आदित्यनाथ ने !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

सरकार बदलते ही आरोपी निर्दोष और निर्दोष कैसे आरोपी हो जाते हैं इसका जीता-जागता उदाहरण देखना हो तो आदित्यनाथ से अच्छा कोई नहीं। सरकार बदलते ही पूरा प्रशासनिक अमला जुट गया अपने सीएम को दंगों के मामले में आरोपमुक्त साबित करने में। वरिष्ठ पत्रकार अजित साही ने सिलसिलेवार रिपोर्ट प्रस्तुत की है कि कैसे सरकार अपने मुख्यमंत्री को बचाने के लिए जी जान एक किए हुए है-

दो महीने पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने योगी आदित्यनाथ पर 2007 में गोरखपुर और आस-पास के जिलों में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के आरोप में मुक़दमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

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स समय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि योगी आदित्यनाथ पर मुक़दमा चलाने में देर क्यों की जा रही है? जिसके जवाब में सरकार का कहना था कि वह अनुमति नहीं दे सकती.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में काउंटर एफिडेविट दाखिल किया- 

अब उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने उस फैसले को जायज़ ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत किया है. हालांकि इस महीने की शुरुआत में कोर्ट में जमा किए गए 126 पन्नों के इस दस्तावेज में 2007 के आधिकारिक रिकॉर्ड के उलट कई बातें दर्ज हैं.

इस बात का भी कोई सबूत नहीं है कि पुलिस ने कभी आदित्यनाथ से दंगे, हत्या, आगजनी के इस मामले में कोई सवाल भी किया है, जांच या पूछताछ की तो बात ही जाने देते हैं, पर ‘काउंटर एफिडेविट’ के रूप में दिया गया ये दस्तावेज दिखाता है कि किस तरह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपने मुख्यमंत्री को बचाने की कोशिश की जा रही है.

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पर सच ये है कि इस काउंटर एफिडेविट ने उस सवाल का जवाब भी नहीं दिया है, जो कोर्ट में अप्रैल में पूछा था, ‘क्या कोई मुख्यमंत्री किसी ऐसे आपराधिक मामले में अपनी सरकार का रुख तय कर सकता है, जहां वह खुद ही ‘मुख्य अभियुक्त’ है?’

मुस्लिम विरोधी बयानों पर गर्व दिखाते रहें हैं आदित्यनाथ- 

यह भी दिलचस्प है कि न ही आदित्यनाथ और न ही उनके किसी सह-आरोपी ने कभी भी इस मामले में हुई एफआईआर में दर्ज किसी आरोप से इनकार किया है. 2014 में एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में आदित्यनाथ न केवल एफआईआर में बताए गए मुस्लिम विरोधी भाषण, जिससे क्षेत्र में हिंसा शुरू हुई थी, देने की बात गर्व से स्वीकारते दिखते हैं, बल्कि यह भी कहते हैं कि अगर ज़रूरत पड़ी तो वे फिर ऐसा करेंगे. फिर भी, ये काउंटर एफिडेविट इसे प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करता.

मई में सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि वो आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दे सकती, जिस पर याचिकाकर्ता परवेज़ परवाज़ ने आपत्ति जताई. इस पर कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, जिसके जवाब में सरकार ने ये काउंटर एफिडेविट दिया है, जहां कहा गया है-

सालों तक याचिकाकर्ता मामले को उठाने में गंभीर नहीं रहे और अब आदित्यनाथ से राजनीतिक विरोध के कारण ये मुद्दा उठा रहे हैं.

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मामले के निपटारे के लिए याचिकाकर्ता की ओर से एक भी बार प्रयास नहीं किया गया.

याचिकाकर्ता परवाज़ का आपराधिक इतिहास रहा है. उनके ख़िलाफ़ 10 आपराधिक मामले दर्ज हैं.

याचिकाकर्ता ने सालों तक सीबी-सीआईडी द्वारा जांच जारी रखने के मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी पर अब वे ग़लत आरोप लगा रहे हैं.

19 मार्च, जबसे आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने हैं, तबसे याचिकर्ताओं ने इस मुद्दे को उठाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया, जो उनका मकसद साफ दिखाता है.

सीबी-सीआईडी एक विशेषीकृत और स्वतंत्र जांच संस्था है, जो जांच करने के लिए पूरी तरह योग्य है.

राज्य सरकार सीबी-सीआईडी द्वारा अभियोजन की की किसी सिफारिश को मंजूरी देने के लिए क़ानूनी रूप से बाध्य नहीं है.

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परवाज़ की याचिका में दर्ज हिंसा की घटनाओं पर स्थानीय पुलिस द्वारा ज़रूरी कदम उठाया जा चुका है.

परवाज़ द्वारा पुलिस को दी गई सीडी, जिसमें आदित्यनाथ का कथित विवादित भाषण, जिससे हिंसा भड़की थी, की रिकॉर्डिंग होने की बात कही गई थी, उसे फॉरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा ‘टैम्पर’ (छेड़छाड़ किया हुआ) बताया गया है; फॉरेंसिक रिपोर्ट की इस बात को चुनौती नहीं दी जा सकती.

जिस टीवी कार्यक्रम में आदित्यनाथ के यह भाषण देने की बात स्वीकारने की बात कही गई है, वह सबूत के रूप में मान्य नहीं है, जिस कारण जांच अधिकारी द्वारा इसकी जांच करने का सवाल नहीं उठता.

सीबी-सीआईडी की जांच उस ‘षड्यंत्र’ के बारे में कुछ नहीं बताती, जिसका ज़िक्र एफआईआर में किया गया है.

इस काउंटर एफिडेविट में बताई गई सबसे महत्वपूर्ण बात उस सीडी की विश्वसनीयता पर उठे सवाल हैं, जिसमें योगी आदित्यनाथ के कथित भड़काऊ भाषण होने के प्रमाण हैं.

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सीडी पर सवाल- 

गौरतलब है कि परवेज़ ने यह सीडी अप्रैल 2008 में कोर्ट में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को सौंपी थी. परवेज़ के अनुसार इस सीडी में 27 जनवरी 2007 की शाम को दिया योगी आदित्यनाथ का वो भाषण है, जिससे हिंसा भड़की थी.

परवेज़ के सीडी देने के तकरीबन 6 साल बाद 14 अगस्त 2014 को सीबी-सीआईडी द्वारा ये सीडी सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (सीएफएसएल) को भेजी गई. इसके 2 महीने बाद 13 अक्टूबर 2014 को सीएफएसएल द्वारा दो पन्नों की एक ‘एग्जामिनेशन’ रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें कहा गया था कि उन्हें प्राप्त डीवीडी (गौर कीजिए सीडी नहीं) में जो वीडियो थे, वे ‘असली’ नहीं हैं बल्कि वह संपादित हैं और उससे छेड़छाड़ की गई है.

सीडी जांच पर संदेह पैदा होता है- 

लेकिन ऐसे कई तथ्य हैं, जिससे सीएफएसएल के इस एग्जामिनेशन’ पर संदेह पैदा होता है.

पहला, जिस फॉरेंसिक परीक्षक द्वारा सीडी का यह सील किया गया पार्सल खोला गया, उसका विवरण कहता है, ‘सीडी के अलावा पार्सल में 5 जून 2014 की तारीख का सिटी फोकस अख़बार का एक पन्ना भी था.’ अगर सीजेएम कोर्ट में परवेज़ ने सीडी अप्रैल 2008 में जमा की थी, तो यह कैसे संभव है?

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क़ानून की मानें तो कोर्ट के अधिकारियों द्वारा जमा करने के साथ ही ये सीडी सील पैकेट में रख दी जानी चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया गया, तब ही ऐसा मुमकिन है कि सीएफएसएल में इसमें 2014 का अख़बार पाया जाए.

और अगर सीजेएम कोर्ट में सील किए गए इस पैकेट से फॉरेंसिक लैब में पहुंचने से पहले छेड़छाड़ हुई है तो सीडी कि विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाना लाज़मी है. याचिकर्ताओं ने यही बात हाईकोर्ट को बताई है.

इसके अलावा फॉरेंसिक रिपोर्ट और याचिकाकर्ता द्वारा सीडी में बताए गए तथ्यों को लेकर भी मतभेद है. सीएफएसएल की रिपोर्ट कहती है कि डीवीडी में दो फोल्डर मिले, जिनमें से एक में ‘सैफरन वॉर’ नाम की फिल्म थी.

2008 की जमा सीडी में 2011 की फिल्म कैसे ?

गौर करने वाली बात है कि आदित्यनाथ की सांप्रदायिक गतिविधियों पर बनी ये फिल्म 2011 में लखनऊ के दो सामाजिक कार्यकर्ताओं राजीव यादव और शाहनवाज़ आलम ने बनाई थी. 2011 में बनी कोई फिल्म 2008 में जमा की गई किसी सीडी/डीवीडी में कैसे हो सकती है?

सीएफएसएल की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उन्हें मिली डीवीडी ‘कोने से चटकी’ हुई थी. परवेज़ इस बात से साफ इनकार करते हैं कि उनके द्वारा सीजेएम कोर्ट में दी गई सीडी चटकी हुई थी. हालांकि इस बात को भी बहुत आसानी से सत्यापित कर सकते हैं.

सीजेएम कोर्ट में जमा किए गए सामान की फाइल में नोट किए विवरण से ये जाना जा सकता है कि जमा करते वक़्त वह किस स्थिति में थी. ये समझना मुश्किल है कि कोर्ट कोई ‘चटकी’ हुई सीडी स्वीकार करेगा और यह बात विवरण या रसीद में नहीं लिखी जाएगी.

इन सब तथ्यों के अलावा सीडी को लेकर कहा गया सबसे बड़ा झूठ इस ‘एग्जामिनेशन’ रिपोर्ट से इतर है. 11 मई 2017 से राज्य सरकार लगातार हाईकोर्ट से यह कह रही है कि उसने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ अभियोजन की अनुमति सीडी की फॉरेंसिक रिपोर्ट के कारण नहीं दी.

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लेकिन सीएफएसएल द्वारा इसकी जांच रिपोर्ट अक्टूबर 2014 में सौंपी गई थी, वहीं सीबी-सीआईडी ने अप्रैल 2015 में यह निर्णय दिया था कि उसके पास आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं. तब क्या सीबी-सीआईडी जैसी एक स्वतंत्र संस्था एक नेगेटिव फॉरेंसिक रिपोर्ट को ग़लत साबित करने के प्रमाणों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थी.

इस मामले में अगली सुनवाई 27 जुलाई को होनी है.

(द वायर हिन्दी वेबसाइट से साभार प्रकाशित)

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