You are here

विकास न हुआ रीतिकालीन नायिका का ‘कंगना’ हो गया, जिसे वह नदिया किनारे कहीं गुमा आई है !

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

विकास, विकास न हुआ, रीतिकालीन नायिका का ‘कंगना’ हो गया है जिसे वह नदिया किनारे गुमा आई है और गा गाकर ना मिल पाने की व्यथा व्यक्त कर रही है। इधर कुछ लोग विकास के विरह में ऐसे पगला रहे हैं कि कव्वाली की पंक्तियों की तरह एक ही बात बार-बार दोहरा रहे हैं।

विकास-विकास के झुनझुने से कई नदियां सूख गई हैं, कई दारोगा बदल गए हैं और रीतिकालीन नायिकाओं पर कई शोध लिख दिए गए हैं, फिर भी विकास का कंगना अभी तक ‘गुम जाने, के स्टेटस से ‘बरामद हुआ’ वाले स्टेटस पर नहीं आ सका है।

माजरा किसी बड़े नामी चित्रकार की ना समझ आने वाली पेंटिंग की तरह हो गया है। पेंटिंग में चित्रकार ने विकास को घास के रूप में चित्रित किया है जैसे 3D फिल्मों को देखने के लिए एक पोलेराइड चश्मा लगाना पड़ता था वैसे ही आर्ट गैलरी में आए सभी दर्शकों को प्रवेश द्वार पर ही हरे कांच का चश्मा यह कहकर उपहार में दिया जा रहा है कि इससे पेंटिंग ‘अच्छी’ दिखाई देगी।

सावन के अंधे को सब कुछ हरा-हरा नजर आता है- 

जिन्होंने हरा चश्मा लगा लिया है उन्हें पेंटिंग की ऊसर जमीन पर भी हरी घास नजर आ रही है। कुछ दर्शक चित्रकार के इतने बड़े भक्त हैं कि उन्हे घोड़े की लीद भी हरी कच्च दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है मानो उन्हे सावन के महीने में ही आंखों में मोतियाबिंद हुआ है।

दर्शक भी भांति-भांति के होते हैं, यहां भी कुछे ऐसे हैं जिन्हें विकास रूपी पेंटिंग में घास का तिनका तक नजर नहीं आ रही है। ऐसे लोगों को समझाने के लिए पेंटर बाबू की कुछ टुकड़ियां तैयार बैठी है। उन्हें यह कहकर समझाया जा रहा है कि पूरे कैनवास पर घास ही घास थी जिसे पेंटिंग के बनने से लेकर गैलरी में आने के बीच में घोड़ा चर गया है

दर्शक की डिमांड है कि उन्हे घास दिखाई जाए- 

दर्शकों में कुछ ऐसे भी हैं जो अपने बाप को बाप कहने से पहले उसके बाप होने का सबूत मांगते हैं। उनकी मांग है कि उन्हें घास दिखाई जाए। अगर घास घोड़े ने चर ही ली है तो घोड़े पर कोई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ टाइप बात क्यों नहीं की गई? अगर घास चरते घोड़े को आपने पकड़ कर कांजी हाउस में जमा कर ही दिया हो तो उसकी पावती दिखाई जाए।

छायावादी युग के कवियों को प्रकृति के कण-कण में प्रेम दिखता और संगीत सुनाई देता था। उसी तरह विकास वीरों को चोर भरी आवाज में भी विकास का संगीत सुनाई देता है हर धुंधले इस दृश्य में विकास ही विकास नजर आने लगता है। वह कुछ इस सम्मोहक ढंग से दिखाने और सुनाने में लगे हैं कि अंधे को दृष्टि व बधिरों को श्रवण शक्ति प्राप्त हो गई है।

दुर्भाग्य से हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हे विकास के नाम से ही नफरत हो गई है। अपने बच्चों के जन्म के समय किसी कारण बस उसका नाम विकास रख दिया था तो अब शपथ पत्र देकर बदलवाना चाहते हैं।

इसी नफरत के चलते एक मित्र ने तो बेटी के लिए एक बड़ी कंपनी के लाखों के पैकेज वाले लड़के का प्रस्ताव सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसका नाम विकास है।

विकास और विनाश की बात करने वाले एक ही हो गए हैं- 

विकास और विनाश की बातें करने वालों के सुर कभी कभी इतने ज्यादा मिल जाते हैं कि कभी-कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि बंदा विकास की बात कर रहा है या विनाश की ! कुछ विकास के नाम से ही इतने भयभीत हैं कि उन्होंने उसे बकायदा पागल घोषित कर दिया है।

कानून के जानकारों का कहना है कि अगर परिवार का कोई सदस्य पागल हो जाता है तो आप उसे अपनी तमाम संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं।शायद उनका दाम यह हो कि कल को अगर विकास सचमुच सामने आ जाए तो उसकी कोई कीमत उन्हें ना चुकानी पडे, क्योंकि

विकास ‘पागल’ जो ठहरा।।

दुर्गेश यादव”गुलशन” (लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन मध्यप्रदेश के अध्यक्ष है)

‘किसान मुक्ति संसद’ का ऐलान, हिम्मत है तो किसान से पहले अंबानी-अडानी-माल्या की कुर्की करके दिखाओ

तेजस्वी यादव का हमला: अगर BJP जीत रही है तो क्या नीतीश हारने के लिए गुजरात में चुनाव लड़ रहे हैं?

अब बिहार में भी ‘गंदी ड्यूटी’, का विरोध, शिक्षक बोले शौच करते लोगों की फोटो खींचना हमारा काम नहींं

भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता के लिए संतोष पटेल के नेतृत्व में संसद मार्ग पर जुटेंगे भोजपुरिया

योगी बोले, राहुल गांधी को पूजा में बैठना भी नहीं आता, लोग बोले आपको पूजा-पाठ के अलावा क्या आता है?

लोकतंत्र पर चाटुकार हावी, BJP अध्यक्ष बोले मोदीजी की तरफ उठने वाली उंगली तोड़ देंगे, हाथ काट देंगे

 

Related posts

Share
Share