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दरअसल हम अपने सम्प्रदाय, पंथ, मठ की मानसिक गुलामी को ही धर्म समझकर ‘केकड़ा’ बन बैठे हैं

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

गुरमीत राम रहीम के करोड़ों शिष्य हैं। उनमें विज्ञान की पढ़ाई पढ़े हुए डाक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस, नेता, अफसर सभी हैं, वह शराबी, अय्याश, गुंडा और बलात्कारी था, उसे यह सभी बुद्धिमान लोग भगवान मानते थे।

इन किताबी ज्ञान से पढ़े लिखे लोगों के मूर्ख बने रहने का सिलसिला कोई एक दो घंटे के लिए नहीं हुआ, लोग सत्ताईस साल तक मूर्ख बनते रहे। आज भी गुरमीत राम रहीम के भक्तों की संख्या में कमी नहीं आयी है।

एक खबर देख रहा था कि पिछले हफ्ते गुरमीत राम रहीम के ऑन लाइन फालोवर्स की संख्या में लाखों लोगों का इजाफा हुआ है। कैसे हुआ यह जादू कि इतने करोड़ लोग मूर्ख बने रहे, और आज भी बन रहे हैं।

केकड़े और अंधभक्त एक ही प्रजाति के होते हैं-

ऐसा कीजिये किसी खुली टोकरी में कुछ केकड़े रख दीजिये. देखिएगा उनमें से एक भी केकड़ा निकल कर भाग नहीं पाएगा. क्योंकि जैसे ही कोई एक केकड़ा आज़ाद होने के लिए ऊपर चढ़ेगा. दूसरे केकड़े उसकी टांग पकड़ कर वापिस टोकरी के भीतर गिरा लेंगे,और इस तरह आपके सारे केकड़े टोकरी में ही बने रहेंगे।

गुरमीत राम रहीम के डेरे का कोई भी भक्त जब डेरा छोड़ना चाहता था तो बाकी के भक्त उसकी जान के दुश्मन बन जाते थे. इसके अलावा पूरा परिवार ही भक्त बनता था। व्यक्ति अपने परिवार से प्रेम के चलते परिवार का मन रखने के लिए गुरमीत राम रहीम का भक्त बना रहता था।

अपने धर्म, सम्प्रदाय की बुराईयां सामने लाना ही चाहिए-

मैं जब हिन्दू पंथ में फ़ैली कट्टरता और साम्प्रदायिकता के बारे में लिखता हूँ, तो मेरा विरोध कई सारे हिन्दू करते हैं। वो कहते हैं कि तुझे सारी बुराइयां हिन्दुओं में ही नज़र आती हैं ? और उसके बाद मेरे सामने मुसलमानों की बुराइयों की एक लम्बी लिस्ट रख दी जाती है और कहा जाता है कि इस पर बोल कर दिखा, कुछ लोग आकर कहते हैं कि हिन्दू इतने ही बुरे हैं तो अपना नाम बदल ले, कुछ लोग आकर कहते हैं कि मैं पाकिस्तान चला जाऊं वगैरह वगैरह।

मेरी तरह ही मेरे कुछ मुसलमान दोस्त लेखक भी हैं, वो मुसलमानों के बीच फ़ैली हुई कुरीतियों के खिलाफ लिखते हैं। उनकी वाल पर जाकर मैं देखता हूँ तो उन्हें भी मुसलमान आकर उसी तरह डांट रहे होते हैं जैसे मुझे हिन्दू डांटते हैं। मुसलमानों की कुरीतियों के बारे में लिखने वाले मुसलमान दोस्तों को संघ का दलाल, मुसलमानों को बदनाम करने वाला, इस्लाम छोड़ दो, वगैरह वगैरह ऊलजुलूल कमेन्ट मिलते हैं।

दुनिया में धर्म तो एक ही है इंसानियत का धर्म- 

असल में हम सब गुरमीत राम रहीम के भक्तों जैसे दिमाग वाले लोग ही हैं। हम आज़ाद दिमाग से सही गलत का फैसला करने की समझ गंवा बैठते हैं। हम अपने सम्प्रदायों की गुलामी को ही धर्म समझ बैठे हैं। धर्म का नाम हिन्दू या मुसलमान नहीं है। दुनिया में धर्म तो एक ही हो सकता है।  वह है इंसान का धर्म, हिन्दू मुसलमान सम्प्रदायों का नाम है,

पूजा नमाज़, व्रत, रोज़ा, उपवास, टोपी, चोटी, दाढ़ी, बुरखा, घूँघट, बकरा, गाय, अरबी, संस्कृत का सम्बन्ध धर्म से है ही नहीं। जो लोग जिस सम्प्रदाय में पैदा हुए हैं और उसकी कुरीतियों के खिलाफ लिख बोल रहे हैं। वही लोग उस सम्प्रदाय के लोगों को अज्ञान से बाहर निकाल सकते हैं। दूसरे के सम्प्रदाय की बुराई देखने से आपका कोई फायदा नहीं होगा।

जो मुसलमान लोग, हिन्दू सम्प्रदाय की बुराइयां देखते हैं इससे उनका अपना कोई भी फायदा नहीं होने वाला। इसी तरह जो हिन्दू लोग, मुसलमानों की बुराइयां खोजते रहते हैं वो हिन्दुओं का कोई भला नहीं कर रहे। भला तभी होता है जब आप अपनी कमी खोजते हो और उसे दूर करने की कोशिश करते हैं।

मैं अपने मुस्लिम लेखक दोस्तों द्वारा मुसलमानों की कमियों पर लिखी गई किसी भी पोस्ट पर कभी कमेन्ट नहीं करता,क्योंकि उससे मुसलमान डर सकते हैं कि देखो ये हिन्दू लोग हमारा मज़ाक बना रहे हैं।

इसी तरह से अगर हिन्दुओं की कुरीतियों के खिलाफ लिखी गई किसी पोस्ट पर मुसलमान आकर समर्थन में कमेन्ट करते हैं तो उससे हिन्दू डर जाते हैं कि देखो मुसलमान हमारा मज़ाक बना रहे हैं।

इसलिए आपके अपने फायदे में यही है कि अपने बीच फ़ैली हुई बुराइयों को खोजिये और उन्हें जितनी जल्द हो छोड़ दीजिये। इसी में आपके समुदाय का फायदा है।

दूसरे सम्प्रदायों की बुराइयां खोज कर खुद को ऊंचा समझने में इस दुनिया ने कई हज़ार साल बर्बाद कर लिए हैं। गुरमीत राम रहीम के चेलों जैसे मत बनिये जो अपनी बुराइयों को देखने में असमर्थ हो गए और अपने गुरु पर लगे बलात्कार के आरोप से गुस्सा होकर शहर में आग लगाने और दूसरों को मारने के लिए निकल पड़े थे।

(लेखक हिमांशु कुमार सामाजिक मुद्दों पर बेबाक लिखते हैं, मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं )

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