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सपा ने बनाए 21 प्रवक्ता, 13 सवर्ण, 6 पिछड़े, दलित शून्य, सोशल मीडिया पर फिर पर उठे सवाल

नई दिल्ली । नेशनल जनमत ब्यूरो।

यूपी विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद ये अनुमान लगाया जा रहा था कि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव अब पिछड़ी जातियों पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे. पर ये अनुमान झूठा ही साबित हुआ. समाजवादी पार्टी द्वारा घोषित प्रवक्ताओं की लिस्ट में ज्यादातर सवर्ण प्रवक्ताओं के नाम देखकर उन अटकलों को भी विराम लग गया कि पार्टी जल्द ही अपनी राजनीति के केन्द्र में पिछड़ों को लाने वाली है.

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21 में से 13 सवर्ण प्रवक्ता, एक भी पसमांदा समाज के मुसलमान को लिस्ट में जगह नहीं

आपको बता दें कि पार्टी द्वारा जारी 21 प्रवक्ताओं की लिस्ट में 15 फीसदी आवादी वाले सवर्ण समुदाय के 13 लोगों को जगह दी गई है। यानि 15 फीसदी सवर्णों को 60 फीसदी से भी अधिक भागीदारी दी गई है. प्रवक्ताओं की लिस्ट में 4 मुसलमानों को भी जगह दी गई है जसमें से पसमांदा समाज का एक भी मुस्लिम शामिल नही हैं.

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प्रवक्ताओं की लिस्ट में किसी दलित को कोई जगह नहीं, अति पिछड़ी जातियों से बनाया सिर्फ एक प्रवक्ता- 

समाजवादी पार्टी द्वारा जारी राष्ट्रीय प्रवक्ताओं की लिस्ट में किसी भी दलित को प्रवक्ता नहीं बनाया गया है. आपको बता दें कि सपा पर पहले भी दलित विरोधी पार्टी होने का आरोप लगता रहा है पर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के इस फैसले से सपा पर दलित विरोधी पार्टी होने के आरोपों को औऱ बल मिलेगा. इसके अलावा यूपी में लगभग 30 फीसदी अावादी वाले अति पिछड़े समुदाय से सिर्फ राजपाल कश्यप के रूप में एक प्रवक्ता बनाया गया है.

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पिछड़ों को नजरअंदाज किए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर हो रही अखिलेश की खिंचा 

सपा के प्रवक्ताओं की लिस्ट में पिछड़ी जातियों को नजरअंदाज किए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की जमकर खिचाई हो रही है. सपा ने 21 प्रवक्ताओं की लिस्ट में सिर्फ 6 पिछड़ी जाति के नेताओं का प्रवक्ता बनाया है.

आपको बता दें कि सपा के प्रवक्ताओं की लिस्ट में यूपी में अच्छी खासी संख्या रखने वाली कुर्मी जाति के एक भी नेता को प्रवक्ता नहीं बनाया गया है. इसके अलावा लोध कुम्हार,कलवार, लोहार, सुनार , कहार,निषाद, गूजर, तेली, तमौली, राजभर , चौरसिया आदि मेहनतकश ओबीसी जातियों के किसी भी नेता को सपा ने प्रवक्ता की अपनी सूची में शामिल नही किया है.

इसको लेकर कई सामाजिक चिंतकों ने सपा पर सवाल उठाए हैं . सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभानु ने इस पर चिंता जताते हुए कहा है कि सपा ने 15 फीसदी सवर्णों को तो 60 फीसदी से अधिक जगह दी है पर 60 फीसदी से अधिक आबादी वाले पिछड़ों को 30 फीसदी के आसपास ही जगह दी है. अगर यही हाल रहा तो धीरे-धीरे पिछड़ी जातियां सपा से दूर होती चली जाएंगी.

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इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हाजी हसन निसार ने सपा के प्रवक्ताओं की लिस्ट में पसमांदा समुदाय के एक भी नेता को प्रवक्ता न बनाए जाने को लेकर गहरी नाराजगी व्यक्त की है. हाजी हसन निसार कहते हैं कि जब पसमांद समाज की आबादी मुस्लिम समाज में 85 फीसद है तो इस समुदाय को राजनीतिक भागीदारी भी 85 फीसदी मिलनी चाहिए. पसमांदा समाज को यदि इसी तरह नजरअंदाज किया गया तो इस देश में जल्द ही सेकुलर पॉलिटिक्स ही समाप्त हो जाएगी. परमांदा समाज को जहां उसका हक मिलेगा वहां चला जाएगा.

एक भी दलित को प्रवक्ता न  बनाने को लेकर खिंचाई- 

सपा द्वारा दलित समुदाय के एक भी नेता को प्रवक्ता न बनाए जाने पर भारतीय मूल निवासी संघ के महासचिव और सामाजिक चिंतक सूरज कुमार बौद्ध ने निराशा जताते हुए कहा है कि सपा के पास ये अच्छा मौका था कि सपा अपने को दलित हितैषी पार्टी के रूप में अपनी छवि बना सकती थी पर सपा ने येअवसर खो दिया. दलित समुदाय के एक भी नेता को प्रवक्ता न बनाए जाने से सपा की दलित विरोधी छवि मजबूत हुई है.

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