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क्या सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे के ट्रस्ट को लाभ पहुंचा रहे हैं मोदी सरकार के 4 मंत्री ?

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

पवित्रता का लवादा ओढे रहने वाली सरकार और ईमानदारी के ब्रांड अंबेसडर पीएम नरेन्द्र मोदी के शासन काल में उनके करीबी कहलाने वाले लोग चांदी नहीं सोना काट रहे हैं। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के बाद अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे पर सवाल उठे हैं।

ऐसा नहीं है कि 2014 में केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने से पहले इन बेटों के काम का कोई अस्तित्व नहीं था। अस्तित्व तो था सभी अपनी जगह व्यवस्थित रूप से काम भी कर रहे थे लेकिन सरकार बनने के बाद इनके कामों में अचानक से हुई तीव्र वृद्धि पर सवाल उठना लाजिमी ही है।

इस उदाहरण से समझिए- 

‘केरल में चरमपंथी इस्लाम’ और ‘आदिवासियों का बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन’ जैसे विषयों पर निबंध (मोनोग्राफ) छापने वाले संगठन के तौर पर इंडिया फाउंडेशन का अस्तित्व 2009 से है. लेकिन अचानक से 2014 से इंडिया फाउंडेशन का जिस तरह उभार हुआ है, उसे किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता है.

आज यह भारत का सबसे प्रभावशाली थिंक-टैंक है, जो विदेशों और भारत के औद्योगिक जगत के प्रमुख हस्तियों को मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठकर सरकारी नीतियों पर बातचीत करने के लिए मंच मुहैया करता है.

लेकिन इंडिया फाउंडेशन की अपारदर्शी वित्तीय संरचना और इसमें वरिष्ठ मंत्रियों की निदेशकों के तौर पर उपस्थिति होने के अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि इसके एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर शौर्य डोभाल का घोषित काम जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज को चलाना है.

क्या है जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज- 

जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज ‘ओईसीडी और उभर रही एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के बीच लेन-देन और पूंजी- प्रवाह के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाली कंपनी है. ये सारे तथ्य मिलकर हितों के टकराव और लॉबीइंग की संभावना को भी जन्म देते हैं. ये वे समस्याएं हैं, जिन्हें सत्ता के गलियारों से हमेशा के लिए मिटा देने का वादा प्रधानमंत्री मोदी ने किया था.

शौर्य डोभाल राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के बेटे हैं और यह ‘संयोग’ भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में किसी रोग की तरह फैले वंशवाद की समस्या में एक नया आयाम जोड़ता है. बीजेपी जिससे दूर होने का दिखावा करती है।

चार-चाार मंत्री निदेशक हैं इंडिया फाउंडेशन के- 

जूनियर डोभाल और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव द्वारा चलाए जाने वाले इंडिया फाउंडेशन के निदेशकों में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, वाणिज्य और उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु, दो राज्य मंत्रियों- जयंत सिन्हा (नागरिक उड्डयन) और एमजे अकबर (विदेश मंत्रालय) के नाम शामिल हैं.

चार मंत्रियों, संघ परिवार के एक कद्दावर नेता और एक कारोबारी जिनके प्रभावशली पिता प्रधानमंत्री कार्यालय में हैं, इन सबने मिलकर इंडिया फाउंडेशन को इतना जबरदस्त सांस्थानिक वजन देने का काम किया है, जिसके बारे में थिंक टैंक की दुनिया के प्रतिष्ठित खिलाड़ी भी सिर्फ सपने में ही सोच सकते हैं.

फाउंडेशन द्वारा आयोजित किए जाने वाले हर कार्यक्रम में उस क्षेत्र के प्रमुख नीति-निर्माताओं की शिरकत होती है, जिसके कारण न सिर्फ इनमें काफी भीड़ होती है, बल्कि प्रायोजकों की भी कोई कमी नहीं होती- इन प्रायोजकों में भारतीय और विदेशी सरकारी एजेंसियां और प्राइवेट कंपनियां, दोनों शामिल हैं.

लेकिन, इंडिया फाउंडेशन की सफलता का राज, जो कि वास्तव में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है- इन छह लोगों की प्रत्यक्ष उपस्थिति- हितों के टकराव को लेकर कुछ परेशान करने वाले सवाल भी खड़े करती है.

फाउंडेशन और व्यापारिक हित- 

साथ ही इससे इस आशंका को भी बल मिलता है कि क्या विदेशी और भारतीय कंपनियां फाउंडेशन के कार्यक्रमों को समर्थन इसलिए देती हैं, ताकि वैसे मसलों में, जिनमें उनका व्यापारिक हित जुड़ा हो, सरकार की कृपादृष्टि हासिल की जा सके !

एक ट्रस्ट के तौर पर फाउंडेशन के लिए अपनी बैलेंस शीट और वित्तीय लेन-देन को सार्वजनिक करने की कोई अनिवार्यता नहीं है. इसके बोर्ड में निदेशकों के तौर पर मंत्रियों की उपस्थिति के बावजूद, यह अपने राजस्व के स्रोतों के बारे में कोई जानकारी देने से इनकार करता है.

फाउंडेशन को पैसा कहां से आता है ? 

इस सवाल पर कि फाउंडेशन के राजस्व का स्रोत क्या है, शौर्य डोभाल भी द वायर को बस इतना कहने के लिए तैयार हुए: ‘सम्मेलनों से, विज्ञापनों और जर्नल से.’

उन्होंने इस राजस्व के उद्गम को लेकर पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. और न ही इस बात का ही कोई स्पष्टीकरण दिया कि इंडिया फाउंडेशन, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि यह एक ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड है,

आखिर अपने रोज के कामकाज का खर्चा कैसे उठाता है? इस खर्चे में लुटियन दिल्ली के हेली रोड में लिए गए पॉश मकान का किराया और कर्मचारियों के वेतन शामिल हैं.

इंडिया फाउंडेशन को मिलने वाले पैसों के स्रोत की जानकारी देने को लेकर डोभाल का यह संकोच नया नहीं है. 2015 में भी वे द इकॉनमिक टाइम्स को बस इतना ही कहने को तैयार थे:

ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड फाउंडेशन की फंडिंग के बारे में पूछे जाने पर डोभाल ने कहा- मासिक जर्नल राजस्व का एक बड़ा स्रोत है.

ऐसे में जबकि इसके निदेशकों में मंत्रियों के नाम शामिल हैं, इन ‘चंदों’ और ‘स्पॉन्सरशिप’ का स्रोत जनहित से जुड़ा काफी अहम मामला बन जाता है. लेकिन, इसके बावजूद इसके बारे में काफी कम या नामालूम-सी जानकारी मौजूद है. सिवाय उन तस्वीरों के जिसे इंडिया फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट पर डाल रखा है.

(यहां रिकॉर्ड के लिए बता दें कि इंडिया फाउंडेशन जर्नल के जिन अंकों की द वायर ने जांच की, उन्हें विज्ञापनों से भरा हुआ नहीं कहा जा सकता.)

विदेशी रक्षा कंपनियों से स्पॉन्सरशिप- 

इंडिया फाउंडेशन के दो आयोजन (एक हिंद महासागर पर और दूसरा ‘स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट’ पर) के प्रायोजकों के नाम तस्वीरों में दिखाई दे रहे थे. उदाहरण के लिए बोइंग जैसी विदेशी रक्षा और विमानन कंपनियां और इस्राइली फर्म मागल, साथ ही डीबीएस जैसे विदेशी बैंक और कई निजी भारतीय कंपनियों के नाम इसमें बतौर प्रायोजक लिखे हुए हैं.

लेकिन, इस स्पॉन्सरशिप की प्रकृति, यानी कितना पैसा दिया गया और किसे दिया गया, इंडिया फाउंडेशन को या किसी ‘पार्टनर’ को, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.

4 मंत्रियों से निदेशक के बतौर सवाल किए गए कोई जवाब नहीं- 

द वायर ने इंडिया फाउंडेशन में निदेशक के तौर पर काम करने वाले चार मंत्रियों को चिट्ठी लिखकर फाउंडेशन द्वारा ऐसे आयोजनों की मेजबानी के औचित्य को लेकर सवाल पूछा, जिन्हें ऐसी कंपनियों द्वारा फंड या डोनेशन दिया गया, जिनके कारोबारी मसले उनके मंत्रालयों के साथ जुड़े हुए हो सकते हैं.

निर्मला सीतारमण से यह पूछा गया कि ‘क्या आप यह स्वीकार करेंगी आपके इंडिया फाउंडेशन (जो विदेशी कंपनियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर पैसे लेती है, खासकर उन कंपनियों के जिनका आपके द्वारा संभाले गए मंत्रालयों (वाणिज्य एवं उद्योग और अब रक्षा मंत्रालय) से नाता रहा है) के निदेशक के तौर पर काम करने से हितों के टकराव का मामला बनता है?’

ऐसे ही सवाल सुरेश प्रभु, एमजे अकबर और जयंत सिन्हा से भी पूछे गए. इस रिपोर्ट के प्रकाशन के वक्त तक, इनमें से किसी ने भी जवाब देने की जहमत नहीं उठाई थी.

इस साल मई में, सीबीआई ने मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में भारत द्वारा खरीदे गए बोइंग एयरक्राफ्ट की प्राथमिक पड़ताल शुरू की.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौड़ के हवाले से लिखा था, ‘इसमें लगाए गए आरोप 70,000 करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय एयरलाइंस के लिए 111 एयरक्राफ्ट की खरीद से संबंधित हैं. ऐसा विदेशी एयरक्राफ्ट निर्माताओं को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया. ऐसी खरीद के कारण पहले से ही खस्ताहाल राष्ट्रीय विमानन कंपनी को और वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा.’

फाउंडेशन के एक निदेशक (जयंत) सिन्हा विमानन राज्य मंत्री हैं. एक ऐसे थिंक टैंक का सदस्य होना, जो एक ऐसी कंपनी से फंड लेता है, जिसके एयरक्राफ्ट की बिक्री पर जांच चल रही है, स्पष्ट तौर पर हितों के टकराव का मामला बनता है.

इंडिया फाउंडेशन आधिकारिक तौर पर अपने आपको ‘भारतीय राजनीति के मुद्दों, चुनौतियों और संभावनाओं पर केंद्रित एक स्वतंत्र रिसर्च सेंटर’ कहता है. लेकिन, शौर्य डोभाल एक वीडियो इंटरव्यू में काफी साफगोई से इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि फाउंडेशन ‘हमारे नीति-निर्माण से जुड़े कई आयामों पर काफी नजदीकी ढंग से भाजपा और सरकार के साथ मिलकर काम करता है.’

इस स्वीकृति को थिंक टैंक के मुखिया के तौर पर पारदर्शिता बरतने की कोशिश भी कहा जा सकता है, या ‘कॉरपोरेट फाइनेंस और सलाह’ के व्यापार से जुड़े किसी व्यक्ति का सत्ता से नजदीकी का विज्ञापन भी कहा जा सकता है.

जीएफएस के चेयरमैन प्रिंस मिशाल बिन अब्दुल्लाह बिन तुर्की बिन अब्दुल्लाज़ीज़ अल-साऊद, सऊदी अरब के शासक परिवार के सदस्य हैं और अब्दुल्लाह बिन तुर्की बिन अब्दुल्लाज़ीज़ अल-साऊद के बेटे हैं.

भले प्रकटरूप में फाउंडेशन लॉबीइंग में शामिल न होता हो, लेकिन इसके आयोजनों को साफ तौर पर कॉरपोरेटों और दूसरे हितधारकों को अहम अधिकारियों के साथ मिलने का मौका देने के वादे के इर्द-गिर्द तैयार किया जाता है.

साफ तौर पर इन अधिकारियों को अपनी व्यस्तताओं को बीच में छोड़कर इंडिया फाउंडेशन के निमंत्रण पर आना पड़ता है, क्योंकि इसकी पहुंच सरकार के सबसे ऊंचे स्तरों तक है.

जरा इंडिया फाउंडेशन द्वारा फिक्की के साथ मिलकर ‘स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट’ विषय पर कराए गए एक आयोजन की प्रचार बुकलेट की भाषा पर ध्यान दीजिए:

‘आप किससे मिलने की उम्मीद करते हैं’. यह अपने संभावित क्लाइंटों से व्याकरण की चूकों के साथ पूछता है और उसके बाद मंत्रियों और विभागों की पूरी सूची प्रदर्शित करता है, जो वहां आने वाले हैं.

इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या मंत्रियों के पदों का इस्तेमाल एक थिंक टैंक की साख और पहुंच को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, जो अपने राजनीतिक जुड़ाव को किसी से छिपाता नहीं है?

विदेशी पैसे से ‘भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण’ का विकास

इसकी वेबसाइट के मुताबिक इंडिया फाउंडेशन, ‘भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट’ करना चाहता है. इंडिया फाउंडेशन का विजन एक शीर्ष थिंक टैंक बनने का है, जिसकी मदद से भारतीय सभ्यता के समकालीन समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने में मदद मिल सकती है.’

लेकिन, दूसरे स्वयंसेवी संगठनों की ही तरह, जिन पर भाजपा और मोदी सरकार अक्सर ‘राष्ट्रद्रोही’ होने का आरोप लगाती है, इंडिया फाउंडेशन भी अपनी गतिविधियों के लिए विदेशी पैसों पर निर्भर है.

एक ट्रस्ट यानी गैर सरकारी संगठन के तौर पर इंडिया फाउंडेशन की हैसियत को देखते हुए, इसके द्वारा विदेशी चंदे का इस्तेमाल फॉरेन कंट्रीब्यूशंस रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के अधीन है.

प्रधानमंत्री कार्यालय की चुप्पी- 

द वायर ने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा से पूछा कि क्या उन्होंने और मोदी ने उन निदेशकों के संभावित हितों के टकराव की ओर ध्यान दिया है, जो मंत्रियों के तौर पर भी काम कर रहे हैं?

साथ ही इस तथ्य की ओर भी कि शौर्य डोभाल के पिता पीएमओ के शीर्ष अधिकारी हैं, जिनके अधिकार क्षेत्र में ऐसी वार्ताओं का हिस्सा होना शामिल है, जिनका सरोकार ऐसे फैसलों से हो सकता है, जो इंडिया फाउंडेशन के आयोजनों को प्रायोजित करने वाली कंपनियों से ताल्लुक रखते हों?

( द वायर वेबसाइट में प्रकाशित पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के लेख से साभार) 

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