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मोदी सरकार की गलत नीतियों से अर्थव्यवस्था हो गई बर्बाद, लाखों लोग हुए बेरोजगार

नई दिल्ली नेशनल जनमत ब्यूरो।

एक ओर तो मोदी सरकार अपने तीन साल पूर होने का जश्न मना रही है। वहीं दूसरी और देश के लाखों लोग मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण अपनी नौकरी जाने का शोक मना रहे हैं। अर्थव्यस्था को लेकर आए मोदी सरकार की नीतियों की चुगली कर रहे हैं। कहां तो मोदी सरकार ने हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था और कहां मोदी सरकार लोगों का पहले से मिला रोजगार भी बचाने में नाकाम रही है।

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नोट बंदी के नतीजे अपना बुरा असर दिखाने लगे हैं

इकोनॉमी के मोर्चे पर खुद की पीठ थपथपाने वाली मोदी सरकार को इसके आंकड़े आईना दिखा रहे हैं। नोटबंदी के खतरनाक नतीजे सामने आने लगे हैं। ताजा आंकड़ा निर्यात का है। निर्यात का हिस्सा जीडीपी में लगातार घटता जा रहा है। आंकड़ों के हिसाब से वस्तुओं का निर्यात बढ़ा है लेकिन जीडीपी की तुलना में इसकी हिस्सेदारी घट रही है। यानी वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन जिस तेजी से हो रहा है और तेजी से निर्यात नहीं बढ़ा है।

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तेजी से घट रहा है निर्यात

वित्त वर्ष 2016-17 के आखिर में वस्तुओं का निर्यात बढ़ा लेकिन यह रफ्तार देश के वस्तुओं के निर्यात और जीडीपी के अनुपात को कम होने से नहीं रोक सकी। इस दौरान यह 2005-06 के बाद सबसे निचले स्तर पहुंच गया।
वर्ष 2013-14 में वस्तुओं के निर्यात की जीडीपी में हिस्सेदारी 17.16 फीसदी थी। लेकिन यह 2016-17 में यह घट कर 12.38 फीसदी रह गई।

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सिर्फ वस्तुओं ही नहीं सेवाओं  (सर्विसेज) के निर्यात में भी गिरावट दर्ज की गई। 2013-14 से ही जीडीपी की तुलना में सेवाओं के निर्यात में गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2016-17 में सर्विसेज के निर्यात में गिरावट 2009-10 के बाद इस सेक्टर का सबसे निम्न स्तर थी। दरअसल यह गिरावट कंप्यूटर सेक्टर के निर्यात में गिरावट से आई । 2016-17 में इसका निर्यात न सिर्फ घट गया बल्कि यह  सीमित भी हो गया। यह 2000 के दशक सबसे बड़ी गिरावट है। कंप्यूटर सेवाओं का निर्यात में बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए इस सेक्टर में गिरावट भारी चिंता का विषय है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंम्प की संरक्षणवादी नीतियों ने इस सेक्टर के लिए और मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।

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नोटबंदी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आत्महत्या जैसा कदम साबित हुआ

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी में सुनामी के बाद विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों  की मांग में गिरावट आई। अब तक इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है। अमेरिका और यूरोप, दुनिया की सबसे ज्यादा मांग वाली इकोनॉमी हैं लेकिन यहां मांग की रफ्तार धीमी है। ऐसे में मोदी सरकार के कर्ता-धर्ताओं का उन्हें नोटबंदी की सलाह देना इकोनॉमी के लिए खुदकुशी करने जैसा था।

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अब जब इसके नतीजे सामने आ रहे हैं तो भी मोदी सरकार इस सच को झुठलाने की कोशिश में लगी है। बेहतर होगा कि सरकार अपनी गलतियों को स्वीकार करे और नोटबंदी से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कदम उठाए। इसमें जितनी देरी होगी इकोनॉमी को उतना ही ज्यादा नुकसान होगा। अर्थव्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों के खराब आंकड़े, रोजगार में कमी और किसानों का असंतोष देश को एक और दुश्चक्र में डाल देगा।

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