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जहरीले वेदांत, गुलाम मानसिकता और अध्यात्म का मुकाबला सिर्फ नास्तिकता ही कर सकती है

नई दिल्ली. नेशनल जनमत ब्यूरो। 

डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को रेप केस में 10 साल की सज़ा मिलने के बाद बाबाओं के प्रति लोगों का भरोसा उठने लगा है। राम रहीम से पहले भी कई ऐसे बाबा थे जो ईश्वर के नाम पर पर्दे के पीछे सेक्स रैकेट चलाते थे।

इस वेदांत और अध्यात्म से दूर रहने में ही भलाई है। इस विषय पर अंतर्राष्ट्रीय शोधार्थी और समाज विज्ञानी संजय श्रमन जोठे का कहना है वेदांत और अध्यात्म से पीछा छुटाने के लिए नास्तिक होना पड़ेगा, तभी हम बाबाओं की तिलिस्मी और रहस्यमय दुनिया से बच सकते हैं वह लिखते हैं-

हमे अगली पीढ़ियों को नास्तिकता की तरफ ले जाना होगा। समाज मे अगर ईश्वर या मोक्ष या समाधि जैसे अंध्विश्वास बने रहे तो ओशो, श्री श्री, आसाराम, राम रहीम जैसों को अपना कोट टांगने की खूंटी मिलती रहेगी। ये खूंटी ही तोड़ देनी है हमें। इसीलिए ईश्वर और धर्म को एकमुश्त निकाल भगाने का रुझान निर्मित करना जरूरी है।

कबीर, नानक,फरीद आदि की असफलताओं को गौर से देखिये, आजकल के ढोंगी इन्ही की शिक्षा को गलत तरीके से इस्तेमाल करके दलदल फैला रहे हैं। अपने समय मे कबीर अगर विशुद्ध नास्तिक की भाषा बोले होते तो ये असंभव था। लेकिन तब नास्तिक कबीर को भी इतिहास ने भुला दिया होता जैसे बुध्द और चार्वाक को भुला दिया।

कबीर ने भी तत्कालीन आस्तिकता के फ्रेमवर्क में ही इनोवेशन किया था लेकिन उनका परलोक, ईश्वर, आत्मा, मुक्ति और राम/हरि से जो लगाव था वो अब भारत के दलितों, बहुजनों, स्त्रियों के लिए जहर साबित हो रहा है। कबीर ने जब ये शब्द रचे थे या इस्तेमाल किये थे तब इनका मतलब कुछ और था।

लेकिन बाद में ओशोराम और आसाराम जैसे धर्मधूर्तों ने बुध्द कबीर आदि को जिस रूप में पेश किया वो रूप हमारे लिए जहर समान है।
अगर आस्तिकता, धर्म, समाधि, पुनर्जन्म, आत्मा, मुक्ति आदि के साथ कबीर भी सुरक्षित नहीं हैं तो हमारी क्या हस्ति है कि हम वेदांती जहर से लड़ सकें?

इस जहरीले वेदांत और अध्यात्म का मुकाबला सिर्फ नास्तिकता ही कर सकती है।

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