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‘जाटों के निर्णायक वोट से बनी बीजेपी सरकार जाट इतिहास को ही कब्र में दफना रही है’

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

राजस्थान को जाट बाहुल्य प्रदेश माना जाता है.ऐसे में ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वसुंधरा सरकार अन्य जातियों के साथ ही इन्हीं जाटों के निर्णायक वोटो के सहारे सत्ता में पहुंची. अब राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार और उनके शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी धीरे-धीरे स्कूलों में संघ का एजेंडा लागू करते जा रहे हैं. कभी परशुराम की जीवनी स्कूलों में पढ़ाने की घोषणा करते हैं तो कभी पीएम मोदी और हेडगेवार की. जाटों के समृद्ध इतिहास और जाटों की गरिमामयी परंपरा को धीरे-धीरे जमींदोज किया जा रहा है.

राजस्थान के स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता जितेन्द्र महला का इस बारे मेे विश्लेषण पढ़ने लायक है. उन्होंने आसान शब्दों में समझाया है कि जाटों की परंपरा के साथ छेड़छाड़ कैसी जा रही है-

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जाटों के निर्णायक वोट से बनी सरकार ने जाट इतिहास और महापुरूषों को क़ब्र में दफ़नाकर. ब्राह्मणवादी इतिहास को स्कूलों में ओर ज्यादा मजबूती के साथ स्थापित करने की ग़ैरलोकतांत्रिक साज़िश की है.

हेडगेवार से लेकर परशुराम की जीवनी पढ़ाई जाएगी स्कूलों में – 

जाटों ने राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2013 में आरएसएस और उसकी राजनैतिक शाखा बीजेपी को झूम-झूम कर वोट डाले. आज उसी आरएसएस और बीजेपी ने मनुवादी स्वयं सेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की जीवनी, गोधरा दंगों के समय राजधर्म ना निभाने वाले नरेद्र मोदी की जीवनी, ब्राह्मणवादियों के आदर्श विनायक दामोदर सावरकर और मनुवादी विचारक राम माधव की किताबें स्कूलों में भेजने का फैसला किया है.इतना ही नहीं सीधे-सीधे ब्राह्मण समाज को खुश करने के लिए परशुराम की जीवनी उपलब्ध कराने की घोषणा भी की है राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने.

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जानिए देश के विकास में क्या योगदान है इनका- 

-केशव बलिराम हेडगेवार वही हैं जिन्होंने जर्मनी जाकर हिटलर और उसके नाजी दल से जाति उर्फ ब्राह्मणवाद उर्फ आर्य श्रेष्ठता का रिफ्रेस कोर्स किया. जिसकी जड़ें मनुस्मृति में पहले से मौजूद थीं और बाद में ब्राह्मण पुरूष वर्चस्व वाले सवर्ण संगठन मनुवादी स्वयं सेवक संघ की स्थापना की.

-नरेद्र मोदी वही है जिन्होंने गोधरा दंगों के वक़्त अपना राजधर्म नहीं निभाया. जिन्हें समरसता का स भी नहीं मालूम अब उन्हीं की किताब ‘सामाजिक समरसता’ स्कूलों के पुस्तकालय में मिलेगी. विनोयक दामोदर सावरकार और राम माधव मनुवादियों और ब्राह्मणवादियों के बड़ें आदर्श हैं ही.

भगत सिंह, चौधरी छोटूराम, चौधरी चरण सिंह को नहीं समझा इस लायक- 

जाटों के निर्णायक वोट से बनी सरकार ने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, रहबर-ए-आज़म चौधरी छोटूराम और किसान मसीहा और भारत में पिछड़ों की राजनीति के जनक चौधरी चरण सिंह की जीवनी और किताबों को स्कूल में भेजने लायक नहीं समझा. आरएसएस और बीजेपी ने ब्राह्मणवाद की चरम सीमा के पार जाते हुये जाट इतिहास को क़ब्र में दफ़न करने की साज़िश की है.

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लाल किले का दरवाजा उदयपुर में लगाने वाले आज शांत हैं- 

इन सारी बातों से  जाट और जाट संगठनों को कोई फर्क़ नहीं पड़ता. जिन्होंने इतिहास में दिल्ली के लाल किले से दरवाजा उखाड़कर भरतपुर में लगाया था उनके वंशज शांत हैं क्योंकि जाटों के बच्चे जो अब युवा हैं वे रोज़ाना ब्राह्मणवाद की चरस पीकर बड़े हो रहे हैं. वे सबसे पहले स्कूल में घुसते ही सरस्वती वंदना करते हैं, हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, पूजा-पाठ कर्मकांड सीखते हैं, रामायण-महाभारत पढ़ते हैं. वे चरस पीते हैं. उन्हें नहीं मालूम कि उनका इतिहास क्या है. भगत सिंह, चौधरी छोटूराम, चौधरी चरण सिंह और महाराजा सूरजमल के बारे में उन्हें नहीं मालूम. न ही कोई बताने वाला है.

मनुवादी व्यवस्था की जड़ है स्कूलों में पूजा पाठ- 

दरअसल भारतीय गणराज्य के बजट से चलने वाली सार्वजनिक स्कूलों में होने वाली सरस्वती वंदना मनुवादी स्वयं सेवक संघ की शाखा है. वहाँ संविधान और लोकतंत्र बिल्कुल नहीं है, बस ब्राह्मणवाद और मनुवाद है. ब्राह्मणवाद और मनुवाद की जड़ें संघ में नहीं बल्कि स्कूल में सुबह-सुबह होने वाली सरस्वती वंदना में हैं. सुबह की सभा में होने वाली पूजा-पाठ, कर्मकांड और पाखंड में हैं. वैसे सरस्वती वंदना संविधान के अनुच्छेद 28 के तहत गैरसंवैधानिक है.सरस्वती वंदना संविधान और लोकतंत्र को स्कूल में नहीं आने देती.

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मनुवादी अपने घर में सरस्वती वंदना कर सकते हैं, पूजा-पाठ कर सकते हैं, रामायण-महाभारत पढ़ सकते हैं. यज्ञ कर सकते हैं. भागवत कर सकते हैं. यह आपका निजी मामला है. संविधान इस बात की इजाज़त तो अनुच्छेद 25 के अंतःकरण और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत देता ही है, लेकिन अनुच्छेद 28 के तहत देश के ख़जाने से चलने वाले सार्वजनिक स्कूलों में हर तरह की धार्मिक शिक्षा का निषेध है. सार्वजनिक स्कूलों को हर तरह की धार्मिक शिक्षा से मुक्ति मिलनी चाहिये.

जब तक देश के स्कूल लोकतांत्रिक नहीं होते तब तक लोकतंत्र और संविधान ख़तरे में रहेगा.

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