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आरक्षण विरोधियों जातिवार जनगणना करवा लो पता लग जाएगा देश में किसका हिस्सा कौन खा रहा है ?

नई दिल्ली नेशनल जनमत ब्यूरो।

जातिगत जनगणना कराने की मांग को लेकर देश में छोटे-छोटे कई आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन उसमें समग्रता ना होने का फायदा मोदी सरकार उठा रही है। ओबीसी की इसी एकजुटता ना होने की बजह से मोदी सरकार ने देश के मुसलमानों की संख्या बता दी, आदिवासियों की संख्या बता दी। यहां तक कि देश में रहने वाले अनुसूचित जाति के लोंगों की संख्या भी बता दी  लेकिन ओबीसी की संख्या नहीं बताई है।

ओबीसी के मठाधीश और जमींदार के दंभ में भूले रहने का आलम ये है कि इस देश में गाय, भैंस, घोड़ा, बकरी, बंदर, हाथी, शेर आदि की गिनती भी की जा रही है पर इस देश में ओबीसी समुदाय की जनसंख्या नहीं बताई जा रही है।

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दरअसल देश के सबसे बड़े वर्ग यानि ओबीसी को अपनी आबादी जानने की जरूरत इसलिए है क्योंकि इस देश में ओबीसी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक ही नहीं। एससी को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण मिल रहा है, इसी तरह एसटी समुदाय को भी उनकी आबादी के बराबर आरक्षण मिल रहा है। देश में सिर्फ ओबीसी ही एकमात्र ऐसा समुदाय है जिसकी आबादी 60 फीसदी से भी अधिक है पर उनको मात्र 27 फीसदी हिस्सेदारी ही मिल रही है।

जब भी देश के ओबीसी समुदाय के प्रबुद्ध लोगों ने इस मामले को न्यायपालिका में उठाया तो न्यायाधीशों ने एक ही सवाल पूछा ओबीसी की देश में आबादी कितनी है। क्या इसका कोई आधिकारिक साक्ष्य है। कुल मिलाकर आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में ओबीसी को उसका सही हक नहीं मिल पा रहा है। इस मामले में भारतीय मूलनिवासी संगठन के मध्यप्रदेश अध्यक्ष दुर्गेश यादव जातिगत जनगणना की जरूरत को आवश्यक बताते हुए लिखते हैं कि-

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पदोन्नति में आरक्षण विषय पर न्यायपालिका द्वारा पूछा गया कि सरकार यह बताये कि संबंधित उच्च पदों पर आरक्षित वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है कि। पहली बात कि किस प्रकार के आंकड़े  न्यायपालिका चाहती है ? अगर सरकार के पास मौजूद आंकड़े काफी नही है तो पिर सरकार जाति आधारित जनगणना क्यों नहीं कराती ? जातिगत जनगणना से आरक्षित वर्गों की वास्तविक स्तिथि का पता लगाया जा सकेगा।

लेकिन सवर्ण लोग चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हों , नही चाहते कि जाति आधार पर किसी भी प्रकार के आंकड़े जारी किये जाएं। पदोन्नति में आरक्षण अथवा जाति आधारित जनगणना जातिवाद को बढ़ावा देगी, ऐसा मानने वाले लोग अक्सर भूल जाते है कि जाति इस देश में हजारो साल से मौजूद है और वह किसी भी प्रकार से कम नही हुई है।

आरक्षण के नाम पर नाक- भौं सिकोड़ने वालो को यह जान लेना चाहिए कि यदि आरक्षण गलत है,तो सबसे पहले जाति को समाप्त करना होगा। केवल राजनीतिक स्तर पर ही नही वरन सामाजिक स्तर पर भी। साधारण शब्दो मे कहा जाए, तो आरक्षण श्रेणीबद्ध समाज को समानता पर आधारित समाज मे बदलने का संविधान के माध्यम से किया गया कानूनी प्रावधान है।

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सवर्ण समाज से आने वाले हमारे कुछ साथियों का मानना है कि पदोन्नति में आरक्षण दिए जाने से दलित आदिवासी वर्गों से आने वाला व्यक्ति उनसे पहले प्रमोशन पा जाएगा, तो ऐसा भी नही है। संविधान में स्पष्ट रूप में लिखा गया है कि इन वर्गों से आने वाले व्यक्ति को मापदंडो में कुछ छूट दी जाएगी, न कि सभी मापदंड ही समाप्त किये जाएंगे। जहां तक मेरिट का सवाल है, तो मेरिट तो एकलव्य के पास भी थी और जो अर्जुन से भी तेज तर्रार धनुर्धर था, लेकिन द्रोणाचार्य ने एकलव्य की मेरिट को नही वरन एकलव्य की जाति को देखा था।

इसी प्रकार मेरिट शंबूक के पास भी थी, लेकिन राम ने केवल उनकी नीच जाति को ही ध्यान में रखकर उनकी हत्या कर दी थी। मेरिट की बात करने वालो को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रतिस्पर्धा बराबर स्तर वालो में की जाती है। भारतीय समाज श्रेणीक्रम पर आधारित है, जहाँ प्रत्येक वर्ग एक दूसरे से पद प्रतिष्ठा में ऊंचा या नीचा है। जाति के रहते हुए आप समाज की बराबरी की कल्पना कर भी कैसे सकते हैं।

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