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आरक्षण के खिलाफ जहर उगलने और दलित को गाली देने से एबीपी न्यूज में मिलती है नौकरी !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

खुद को निष्पक्ष बताकर किसी ओबीसी, एससी-एसटी के पत्रकार की सोच और मानसिकता पर सवाल उठाने वाले तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारों की जातिवादी मानसिकता आपके सामने आना बहुत जरूरी है. अपनी एजेंडा सेंटिंग के तहत खबरें बेंचकर ये आपको झूठ या अर्धसत्य परोसते हैं. वो ही मानसिकता आपके साामने लेकर आते हैं जो इनके अंदर की सोच है. आखिर जातिवाद का जहर दिमाग में रहकर ये लोग कैसे किसी घटना या खबर को जातिवादी चश्मे से नहीं देखते होंगे ये समझ से परे है.

हैरान करने वाली बात ये है कि जातिवादी उत्कर्ष सिंह और मनीष शांडिल्य जैसे ओबीसी विरोधी लोग जातिवाद का जहर बोते हुए नौकरी भी पा जाते हैं. क्योंकि तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया ऐसे ही जातिवादियोंं का अड्डा बना हुआ है. जैसे ही आपने आऱक्षण के खिलाफ लिखा दलित और ओबीसी को गाली दी आप तो इनकी आंख का तारा बन जाएंगे. फिर क्या बुलाकर पूरे सम्मान के साथ एक जातिवादी पुरोधा अपने सिपाही को ट्रेनिंग देने के लिए नौकरी पर रख लेता है.

देखिए उत्कर्ष सिंह का जातिवादी ज्ञान- 

बिहार में 12 वीं के कला वर्ग से टॉपर गणेश का इंटरव्यू करने वालेे एबीपी न्यूज के पत्रकार भूमिहार उत्कर्ष सिंह तो अपनी सोच आईआईएमसी के समय से ही जाहिर करते रहे हैं. जो व्यक्ति संवैधानिक आरक्षण को भीख बोलता हो उससे निष्पक्षता की उम्मीद पालना बेमानी ही होगा.

अब देखिए आरक्षण को भीख बताने वाले उत्कर्ष के दिमाग में आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था को लेकर इतना जहर है कि वो लिखते हैं कि एक रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2015 के दौरान करीब 1400 लोगों ने आरक्षण की बजह से आत्महत्या की है. अब ये आंकड़ा उनको कहां से मिलना किसने दिया. क्या सोर्स है. इसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है.

 

दूसरा उदाहरण देखिए इसी जातिवादी टिप्पणी की वजह से इस व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी कमीशन में पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने शिकायत दर्ज की थी. वहां अभी इसके खिलाफ शिकायत लंबित है.

 

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