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जींस पहनने वाले किसानों के आंदोलन पर एसी में बैठे हुक्मरानों-मीडिया को एतराज क्यों ?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

जब किसी आंदोलन से कोई सरकार बुरी तरह हिल जाती है उसको कहीं बच निकलने का रास्ता नहीं सूझता तो सरकार आंदोलनकारियों पर स्तरहीन आरोप लगाती है. मसलन आंदोलनकारी मंहगे मोबाइल लिए थे. मंहगे जींस पहने थे. बोतल बंद मिनरल वाटर पी रहे थे जैसे ना जाने कितने आरोप. खैर इस काम में मीडिया भी बखूबी उनका साथ निभाता है.

आंदोलन की धार कम करने के लिए करता है गोदी मीडिया- 

आंदोलन की धार को कम करने के लिए और अपने आका को खुश करने के लिए गोदी मीडिया ऐसे ना जाने कितने आरोप लगाता है. ताकि उसी सत्ताशीन सरकार को जरा भी तकलीफ ना उठाने पड़ी. तमिलनाडू के किसानों के दिल्ली में प्रदर्शन को मिनरल वाटर की बोतल से खत्म करने की कोशिश हुई थी. अब मध्यप्रदेश किसान आंदोलन के बहाने एक बार ये मुद्दा फिर विमर्श में है.

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इस बार किसानों के आंदोलन को हाइजैक करने का आरोप शिवराज सरकार ने मढ़ा है और किसानों को असमाजिक तत्व तक कह दिया है. कोई किसानों के मोबाइल पर बात कर रहा है तो कोई उनके जींस पर. यहां ये बात समझनी चाहिए जो सझम होगा वही तो लड़ाई को लीड करेगा.

इसी विमर्श पर फेसबुक पर सक्रिय हैदराबाद निवासी नूतन यादव का लेख पढ़ने योग्य है- 

बोतल का पानी न तो आपकी जागीर है और न जीन्स पर पर आपका कॉपीराइट

अभी तक हम किसान को बेचारा, निरीह और भयभीत प्राणी के रूप में देखने के आदि रहे हैं इसलिए आज जब वे अपनी फसल का सही मूल्य अपना हक माँगने सड़क पर उतरे हैं तो शहरी बांगडुओं को घबराहट हो रही है ….उन्हें वे गुंडे नज़र आ रहे हैं

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किसान का मतलब समझते हैं दीन हीन आदमी- 

कुछ लोग किसान का मतलब नहीं जानते . उनके दिमाग में बनियान पहने जमीन पर बैठकर सूखी रोटी खाते हुए एक कमजोर आदमी की छवि ही घूमती रहती है जो बैल चलाकर खेती करता है. न लोगों को हिन्दी फिल्में देखना छोड़ देना चाहिए. उन्हीं ने इनके दिमाग में सांस्कृतिक कूड़ा भरा है. किसान आज वह किसान नहीं रह गया . मोबाईल फोन ने उसकी पंचायत को दिल्ली से जोड़ दिया है.

आज अगर हल चलाने वाला किसान है तो ट्रेक्टर वाला भी है- 

मेरे मामाओं के यहां गांव में कूलर है. टीवी है. शायद अगले साल lcd भी आ जाए. इसी साल बिजली आई है पहले कई सालों तक मोबाइल फ़ोन कस्बे से जाकर चार्ज करवाते थे. उसके पचास रुपये देते थे. मामियाँ नानियां कपड़े गहने से शहरी लोगों से कहीं हल्की नहीं पड़ती.
गाँव में लगभग सबके घर में मोटर साइकिल होती है. स्थिति अच्छी होने पर जीप या ज्यादा अच्छी होने पर मार्शल , बुलेरो या सफारी आती है अब कोई घर में चक्की नहीं चलाता सबके मसाले आटा पिसकर आता है. मेरे गाँव में तीन स्कूल है एक अंग्रेजी मीडियम भी लगभग सभी बच्चे (लडकियाँ भी) पढ़ते हैं .

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मेरी मौसी एटा के पास रहती हैं इसलिए उनके यहाँ सुविधाएं मेरे मामा से ज्यादा मिलती हैं. उनके यहाँ शहरातीपन ज्यादा है
हम अब तक बैठकर दो सब्जी के साथ पांत की कल्पना करते रहे वहां किसान बैंकेट हाल में शादी करने लगे हैं. इस साल मेरी मौसी ने अपने समधियों को पैसा दे दिया क्योंकि वो शहर में इंतजाम नही करवा पा रहे थे तो समधियों ने ही सब इंतजाम किया ये लोग गाँव से आकर शादी करके वापिस लौट गए.

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किसान भिखारी नहीं है जो लड़ सकता है वो ही तो लीड करेगा-

इन सब बातों को बताने का एक ही मकसद है किसान भिखारी नहीं होते.वे सरकार से अपना हक माँग रहे हैं. चाहे जीन्स पहनकर माँगे या धोती कुरता पहनकर. कुट्टकियों ने तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन के समय भी इसी तरह की बहस खड़ी की थी. बोतल का पानी न तो आपकी जागीर है और न जीन्स पर पर आपका कॉपीराइट. इज्जत से रोटी कमाने वाले लोग है. इज्जत करना जानते हैं और करवाना भी.

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संपादन नीरज भाई पटेल द्वारा 

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