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JNU में बहुजन साहित्य संघ की स्थापना, वक्ता बोले एक तरफ ब्राह्मणवादी तो दूसरी तरफ बुद्ध का दर्शन है

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

बौद्धिक विश्वविद्यालयय के रूप में पूरे विश्व में अपनी पहचान बनाने वाले जवाहर लाल विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सभी विचारधाराओं को मानने वालों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध है।

वामपंथ, दक्षिणपंथ, अंबेडकरवादी, सामाजिक न्याय जैसी तमाम सारी विचारधाराओं के संगठन मौजूद हैं जिसमें आपको अपनी विचारधारा के हिसाब से संगठन के चुनाव करने की आजादी है।

इसी क्रम में साहित्य एवं संस्कृति के माध्यम से वैश्विक चेतना के निर्माण हेतु जेएनयू के बहुजन शोध छात्रों ने जेएनयू के कन्वेंशन सेंटर में ‘बहुजन साहित्य संघ’ की स्थापना की।

इस संघ की स्थापना का मकसद बहुजन यानि देश की बहुसंख्यक आबादी के साहित्य को समाज के बीच लाना है। बहुजन साहित्य संघ के प्रवक्ता अभिषेक सौरभ कहते हैं कि बहुसंख्यक से तात्पर्य ओबीसी,एससी, एसटी, महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदाय से है।

11 अप्रेल को आयोजित स्थापना दिवस समारोह के मौके पर एक दिवसीय परिचर्चा का आयोजन भी किया गया।

मुख्य अतिथि साहित्यकार प्रो. चौथीराम यादव के अनुसार बहुजन साहित्य की वैचारिकी बुद्ध, कबीर, रविदास, फुले, पेरियार, अम्बेडकर और भगत सिंह की वैचारिकी है। एक तरफ वैदिक, पौराणिक एवं ब्राह्मणवादी दर्शन है तो दूसरी तरफ बुद्ध का दर्शन है जो वैज्ञानिक और तार्किक है।

जाति से मुक्त हुए बिना हम जातिवाद को चुनौती नहीं दे सकते हैं। अतः हमें जातिवादी अतिरेकों से मुक्त होने की जरुरत है। 21वीं सदी अम्बेडकर की शताब्दी है और यह बहुजन नवजागरण का दौर है।

बहुजन साहित्य की जरूरत क्यों ?

समारोह में बोलते हुए हरिराम मीणा ने कहा कि ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ जीने का सूत्र है। सवाल बहुजन और अल्पजन का नहीं है बल्कि मनुष्य विरोधी ताकतों ने जो वर्चस्व की वैचारिकी पैदा की उसके खिलाफ एक समतावादी दर्शन का है।

बहुजन साहित्य में विविधतापूर्ण संस्कृति सम्भव है जबकि वर्चस्ववादी संस्कृति में नहीं। विविधता कृषक, शिल्पियों और मजदूरों के श्रम संस्कृति में है। बहुजन साहित्य के माध्यम से हमें अन्ततः राजनीतिक चेतना में जाना पड़ेगा। बहुजन साहित्य बहुजन राजनीति की मशाल है।

पसमांदा मुस्लिम से तात्पर्य- 

नाज खैर ने बहुजन साहित्य की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि पसमांदा का मतलब है शोषित। सच्चर कमेटी और मंडल कमेटी ने मुस्लिम समाज में स्तरीकरण के तीन वर्ग बताए। अशराफ, अजलाफ और अरजाल।

खैर ने मुस्लिम समाज में फैली जातिवादी सच्चाई पर अपना तर्कपूर्ण वक्तव्य रखते हुए कहा कि किस तरह से हिन्दू समाज की तरह मुस्लिम समाज में भी स्तरीकरण की समस्या है जिसे मुस्लिम समाज के वर्चस्वशाली वर्ग तरह-तरह के दलीलों द्वारा मानने से इंकार करते हैं।

जाहिर है कि इसमें उनका राजनीतिक हित उभरकर सामने आता है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से भी यह दिखाने की कोशिश की कि मुस्लिम समाज में भी ऊँच-नीच की भावना फैली हुई है। पासमंदा और अशराफ के हित एक- दूसरे से टकराते हैं।

आर्यों ने मूलनिवासियों का शोषण किया- 

उषा आत्राम ने कहा कि भारतीय समाज में फैली ऊँच-नीच और वर्णव्यवस्था का भारत में आगमन आर्यों के आने के बाद से है। उनका मानना है कि आर्यों ने यहाँ के मूल निवासियों का शोषण किया, ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों और मूल्यों के माध्यम से एक वर्चस्वशाली वर्ग के रूप में स्वयं को स्थापित कर लिया।

डॉ. जय प्रकाश कर्दम ने कहा कि आज के समय में बहुजन साहित्य की अहमियत और इसका स्रोत क्या है? क्या यह 85 प्रतिशत जातियों के समूह से आ रहा है या फिर बुद्ध के बहुजन से आ रहा है। बहुजन साहित्य और बहुजन राजनीति दोनों अलग-अलग हैं।

बहुजन साहित्य की वैचारिकी के आधार पर हमें बहुजन समाज बनाना चाहिए। साहित्य का राजनीतिकरण न हो इसलिए बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है क्योंकि यह बहुजन राजनीति और बहुजन साहित्य दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

कार्यक्रम का संचालन बहुजन साहित्य संघ की महासचिव नीतिशा खलखो ने किया। स्वागत भाषण बालगंगाधर ने दिया, दिवंगत साहित्यकारों को याद करते हुए शोक सन्देश अभिषेक सौरभ ने पढ़ा। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन जुबैर आलम ने किया।

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