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JNU में सामाजिक न्याय के पुरोधा सांसद शरद यादव को पहले ‘सोशल जस्टिस अवार्ड’ से नवाजा गया

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

जाति संगठन दलित-पिछड़ों की एकता में बाधक है। ये समय दलित-पिछड़ों के एक होने का है, लेकिन एक राजनीति के लिए नहीं बल्कि दिल  से जुड़ना है। एक दूसरे की सांझा तकलीफों के लिए सड़क पर उतरना है। जेडीयू से राज्यसभा सांसद और सामाजिक न्याय के योद्धा शरद यादव ने ये बातें जेएनयू में आयोजित सम्मान समारोह में कहीं।

इस खास मौके पर  शरदेन्दु कुमार की पुस्तक ‘समाजवादी चिंतन के अमर साधक भूपेंद्र नारायण मंडल’ और विद्वान लेखक प्रो. कांचा इलैया की पुस्तक ‘हिंदुत्व मुक्त भारत: दलित-बहुजन, सामजिक-आध्यत्मिक और वैज्ञानिक क्रांति पर मंथन’ का विमोचन भी किया गया।

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शरद यादव को मिला पहला सोशल जस्टिस अवार्ड- 

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सामाजिक सोच के साथियों की उपस्थिति में तालियों की गड़गड़ाहट और सोशल जस्टिस जिंदाबाद के नारों के बीच जेएनयू के सभागार में सांसद शरद यादव को पहला सोशल जस्टिस अवार्ड दिया गया। इस अवसर पर उन्होंने दलित पिछड़ों को एक होने और दिल से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जाति से मुक्ति इस देश की सबसे बड़ी क्रांति होगी लेकिन यहाँ तो लोगों ने अपनी-अपनी जाति के संगठन बना लिए हैं | उन्होंने आगे कहा जाति से निकलो और पहले इन्सान बनो।

विद्वान लेखक कांचा इलैया ने कहा हमें अपना इतिहास लिखने की जरूरत- 

प्रो. कांचा इलैया की पुस्तक ‘हिन्दुत्व मुक्त भारत’ का विमोचन करते शरद यादव

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विद्वान लेखक प्रो. कांचा इलैया की पुस्तक ‘हिंदुत्व मुक्त भारत: दलित-बहुजन, सामजिक-आध्यत्मिक और वैज्ञानिक क्रांति पर मंथन’ का विमोचन शरद यादव ने किया। इस दौरान प्रोफेसर कांचा इलैया ने रीड, फाइट, और राइट का नारा दिया। उन्होंने कहा कि हमलोग इस देश की उत्पादक जातियां हैं हमें अपना इतिहास लिखने की जरूरत है। गाँधी और नेहरु ने अपनी आत्मकथा लिखी तो लोग उनके जीवन की चर्चा आज तक करते हैं लेकिन क्रांतिज्योति ज्योतिबा फुले, बाबा साहेब अम्बेडकर और बीपी मंडल नहीं लिख पाए जिस कारण लोग उनके विचारो से अवगत है लेकिन जीवन संघर्ष से नहीं। इस मौके पर उन्होंने शरद यादव से अपनी आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया ।

आदिवासी चिन्तक सोनाझरिया मिंज ने आरक्षित वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ विश्वविद्यालयों में हो रहे भेदभाव पर चिंता व्यक्त की । पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष शरदेन्दु कुमार ने विस्तार से बी.एन.मंडल के जीवन और उनके सामाजिक संघर्षों के बारे में बताया।

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अध्यक्षता कर रहे जेएनयू के प्रोफेसर एस.एन. मालाकार ने कहा कि बहुजन का आन्दोलन सिर्फ आरक्षण के सवाल पर सिमट कर रह गया है। उन्होंने पिछड़ी जातियों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आपकी गलती से आज अति पिछड़ा बीजेपी का दलाल बनने पर मजबूर है।

इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत में सामाजिक चिंतक दिलीप मंडल, बी.एन.मंडल के पौत्र दीपक कुमार, अभिषेक सौरभ, शुभ्रा यादव, राहुल राव, अरविन्द कुमार और रमेश यादव ने अतिथियों का गुलदस्ता देकर स्वागत किया |

पांच युवा साथियो को मिला सामाजिक न्याय का युवा पुरस्कार- 

इस अवसर पर आलोक कुमार, श्वेता यादव, सुमित समोस, जेएनयू शोधार्थी धर्मवीर यादव गगन और जुबैर आलम को सामाजिक न्याय का युवा पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा देश स्तर पर सामजिक न्याय की लड़ाई को धार देने के लिए और जेएनयू में ओबीसी हितों के लिए लड़कर निलंबन तक झेलने वाले छात्र नेता  दिलीप यादव और छात्रनेता मुलायम सिंह को विशेष सोशल जस्टिस पुरस्कार से सम्मानित किया गया |

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जेएनयू के शोधार्थी जयन्त जिज्ञासु और पत्रकार आशिमा कुमारी ने मंच संचालन किया। अंत में अवार्ड समिति की तरफ से श्रीमंत जैनेन्द्र ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

 

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