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JNU छात्र संघ: जय श्रीराम-लाल सलाम के लिए मुसीबत बनता जा रहा है दलितों-पिछड़ों का संगठन बापसा

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

जेएनयू छात्र संघ चुनाव में एक बात है, जो बहुत तेजी से बदली है। छात्रसंघ चुनाव में जीत किसी भी हो इतना तो तय हो ही गया है कि ब्राह्मणवादी-फासीवादी शक्तियां अब जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में जीतने वाली नहीं हैं। इस चुनाव से ये भी उम्मीद जगी है कि इस विजय की गूंज देश के सभी विश्वविद्यालय कैम्पसों में सुनाई देगी।

वामपंथी धड़ों की जीत की उम्मीद सभी को पहले से थी। ये संयुक्त वामपंथी संगठन पारंपरिक रूप से जेएनयू में शक्तिशाली रहे हैं और इनके हाथ मिला लेने से इनकी ताकत में इजाफा अवश्यम्भावी था। इस गठबंधन को कम्युनिस्ट पार्टियों का समर्थन भी प्राप्त था। लेकिन इन सबके बीच बापसा (बिरसा-अंबेडकर-फूले स्‍टूडेंट एसोसिएशन) की धमक काबिलेगौर है।

बापसा का जेएनयू में ये दूसरा छात्रसंघ चुनाव था, जिसमें उसने बहुत कम संसाधनों और बिना किसी राजनीतिक दल के सहयोग के यह चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद उसके प्रदर्शन ने जय श्रीराम और लाल सलाम वाले संगठनों को कड़ी टक्कर दी है।

उसके अध्यक्ष पद के प्रत्याशी शबाना अली केवल 571 वोटों से हारीं उन्हे 935 वोट मिले। बापसा के अन्य पदों (उपाध्यक्ष, महासचिव व सह-सचिव) के प्रत्याशियों ने भी खासे वोट हासिल किये। इसके पीछे था बहुजन विद्यार्थियों का ठोस समर्थन।

 

जेएनयू में कुल वोट – 4620

अध्यक्ष-

गीता कुमारी (LEFT) – 1506 (Elected)

निधि (ABVP) – 1042

शबाना अली (BAPSA) – 935

वृष्णिका (NSUI) – 82

अपराजिता (AISF) – 416

नोटा – 127

उपाध्यक्ष- 

सिमोन (LEFT) – 1876 (Elected)

दुर्गेश (ABVP) – 1028

सुबोध(BAPSA) -910

फ्रेंसिस(NSUI) – 201

नोटा -495

महासचिव- 

दुग्गीराला (LEFT) -2082 (Elected)

निकुंज (ABVP) – 975

करम(BAPSA) – 854

प्रीति – (NSUI) – 233

नोटा -389

संयुक्त सचिव-

शुभांशु (left) -1755 (Elected)

पंकज (ABVP) – 920

विनोद (BASPA) -860

अलीमुद्दीन (NSUI) – 222

मेंहदी (AISF) – 214

शिवेंद्र (स्वतंत्र) – 60

नोटा – 501

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आमतौर पर जेएनयू में लेफ्ट बनाम लेफ्ट की जंग होती रही है. लेकिन अब ऐसा नहीं है. यहां दलित-बहुजन और अंबेडकरवादी राजनीति के नाम पर उभरा बापसा (बिरसा-अंबेडकर-फूले स्‍टूडेंट एसोसिएशन) भी बड़ी ताकत बन गया है.

2014 में अस्तित्व में आया था बापसा- 

इसने 2016 के चुनाव में लेफ्ट गठबंधन और एबीवीपी दोनों की नाक में दम कर दिया था. इस बार यह और आक्रामक होकर लड़ा था. 15 नवंबर 2014 को अस्‍तित्‍व में आया यह संगठन पिछले साल अध्‍यक्ष पद के लिए 1545 वोट लेकर दूसरे नंबर पर था. उपाध्‍यक्ष पद पर उसे तीसरा स्‍थान मिला था.

इसने लाल और भगवा झंडे को भाई-भाई बताकर वामपंथी गढ़ में छात्रों को नया विकल्‍प देने की कोशिश की है. इसने अपने गठन के बाद से कैंपस में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, मुस्‍लिमों, कश्‍मीरियों और पूर्वोत्‍तर के रहने वाले विद्यार्थियों में अपनी पैठ बनानी शुरू की. इन्‍हीं पर फोकस किया.

मीडिया से दूर रहकर इसने अपना काडर मजबूत किया. नतीजा यह हुआ कि यह लेफ्ट के लिए उन्‍हीं के गढ़ में चुनौती बन गया. जानकारों का कहना है कि सिर्फ तीन साल पहले बने इस नए संगठन के उभार से सबसे ज्‍यादा नुकसान लेफ्ट को होता दिख रहा है.

लेफ्ट की जीत का रथ रोकने के लिए एबीवीपी और बापसा दोनों खड़े थे. इसीलिए इस बार आईसा (ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन), एसएफआई (स्‍टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) और डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) तीन संगठन मिलकर अपना किला बचाने में जुटे थे।

विकल्प बना है बापसा- 

लेफ्ट से नाराज जो छात्र एबीवीपी से जुड़ना ठीक नहीं समझते उनके लिए बापसा में विकल्‍प मिला है. प्रेसिडेंशियल डिबेट में बापसा की प्रेसीडेंट शबाना अली ने लेफ्ट-राइट दोनों को ललकारा था. इस बार भी उसकी कोशिश एबीवीपी से अधिक वोट लेने की थी जिसमें वो सफल भी रहा।

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