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सच्चा पत्रकार न तो गुंडा होता है न ही वसूली AGENT, लेकिन ‘गोंडा’ जैसा वसूली गैंग हर शहर में मौजूद है !

नई दिल्ली/गोंडा। नेशनल  जनमत ब्यूरो 

पत्रकारिता जगत में मिशन और प्रोफेशन की बहस तो अब बहुत पीछे छूट गई है। अब बहस सिर्फ इस बात को लेकर है कि पत्रकारों का जो कम से कम सम्मान बचा है वही बरकरार रहे। लेकिन पत्रकारिता को दलाली का माध्यम समझने वाले लोग ना सिर्फ पत्रकारिता को कलंकित करते हैं बल्कि पूरे पत्रकार जगत पर सवालिया निशान लगा देते हैं।

ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में सामने आया है। उ.प्र. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के गोंडा अध्यक्ष कैलाश नाथ वर्मा की जुबानी सुनिए ऐसे ही एक वसलूी एजेंट की कहानी-

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पत्रकार न गुंडा होता, न वसली एजेंट और न ही उसे कानून को हाथ मे लेने अधिकार है। उसकी भी एक सीमा होती है। पत्रकार को ये अधिकार किसने दे दिया कि जिस ट्राली पर खाद्यान लदा हो उसे वो रोक कर चेक करे और फिर सौदे बाजी करे, सौदा न तय होने पर एसडीएम, पूर्ति विभाग और पुलिस को सूचना दे।

ये कार्य मुखबिर और दलालों का है। पत्रकार का कार्य यदि ऐसी कोई कमी लगती है तो वह अपने समाचार पत्र में उस खबर को साक्ष्य के साथ प्रकाशित करे और संबंधित विभाग के अधिकारी का वर्जन लेकर खबर के साथ प्रकाशित करे।

कुछ आंशिक लोग पत्रकारिता जगत को कर रहे कलंकित- 

ऐसे कुछ तथाकथित पत्रकार जिनका सरगना नरेंद्रलाल गुप्ता है। इनका कार्य अपनी टीम के साथ गोण्डा- बहराइच मार्ग, गोण्डा- बलरामपुर मार्ग, गोण्डा-उतरौला मार्ग पर खड़े होकर इन मार्गो से गुजरने वाले मिट्टी बालू व खाद्यान की ट्राली- ट्रक को रोक कर पूंछ तांछ करना। यदि वह थोड़ा भी सहमा तो समझो इनका मुर्गा फंस गया।

फिर क्या माल के मुताबिक सौदा करना, सौदा नही पटा तो एसडीएम से लेकर कोतवाली, पूर्ति विभाग को फोन पर सूचित करना और मौके पर बुलाना। जिससे पूरा पत्रकारिता जगत कलंकित हो रहा है। एक नही सैकड़ों उदाहरण से जिला प्रशासन से लेकर पुलिस प्रशासन भी वाकिफ है। कई जगह मारे गए, गरियाये गए, भगाए गए फिर भी वसूली बन्द नहीं हुई।

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31 जुलाई का प्रकरण- 

अभी हाल में 31 जुलाई को इटियाथोक के 3-4 किसान नानबाबू, राजू वर्मा,अरविंद वर्मा एक ट्राली को किराए पर लेकर अपने खेत की उपज लाही ,सरसो, गेंहू, धान लाद कर खाता बही के साथ नवीन गल्ला मंडी में बेचने आ रहे थे तभी नरेंद्र लाल गुप्ता अपने गैंग के साथ पत्रकार बताकर ट्राली  को रोक लिया और पूंछताछ करने लगा।

किसान कहां इतने चतुर-चालाक होते हैं वो सहम गए। बस फिर क्या था दलाल को लगा कि उसका काम बन गय। इसके बाद नरेन्द्र लाल गुप्ता ने कोतवाली ले जाकर ट्राली सीज कराने की धमकी देकर 5100 रुपये किसानों से लूट लिए।

चूंकि अरविंद मेरे रिश्तेदार हैं इसलिए उन्होंने मुझसे पूरी बात बताई तो मैंने पत्रकार संदीप अवस्थी से नरेंद्र गुप्ता को फोन कराके कहा कि जिनसे पैसा लिए हो वो किसान है वर्मा जी के रिश्तेदार हैं पैसा वापस कर दो। इस बात  पर नरेन्द्रलाल गुप्ता साफ मुकर गया फिर पीड़ित से फोन कराकर पैसा वापस करने को कहा तो इंकार कर फोन काट दिए।

इस बात को लेकर पीड़ित ने तहसील दिवस, कोतवाली और एसपी से मिलकर तहरीर दी है। जिस पर एसपी ने न्याय देने का आश्वासन दिया है।

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बौखलाया नरेंद्र गुप्ता- 
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पेश बंदी को लेकर नरेंद्र गुप्ता ने एक पेपर  में मुझे कोटेदारों का संरक्षक बताकर खबर छापी जबकि मैने खबर छपने से पूर्व अखबार के मालिक पवन गुप्ता से बता दिया था। आज वही चीज किसी अन्य अखबार में प्रकाशित की है। फिसलहाल मैंने बदलता स्वरूप के संपादक प्रकाशक सहित अन्य को मानिहानी का नोटिस भेज दिया है।

आम जनमानस से अपील- 
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जो भी सज्जन नरेंद्र गुप्ता व इनके गैंग से पीड़ित है वह एक शिकायती पत्र डीएम व पुलिस अधीक्षक को साक्ष्य सहित प्रेषित करे जिससे इस गैंग का सफाया होकर जेल भेजा जा सके। इस संबंध में मैं भी उ0प्र0 श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बैठक बुलाकर ऐसे तत्वों पर कार्रवाई के लिये पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी, डीआईजी, कमिश्नर से मिल कर अपील करूंगा।

देश के हर शहर में मौजूद हैं ऐसे वसूली एजेंट- 

नेशनल जनमत के संपादक की हैसियत से मैं नीरज भाई पटेल चूंकि खुद हिन्दुस्तान, अमर उजाला, इंडिया टुडे और न्यूज नेशन जैसे ग्रुपों में काम नहीं पत्रकारिता कर चुका हूं, इसलिए अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं कि ऐसे वसूली एजेंट गोंडा ही नहीं देश के हर कोने में मौजूद हैं।

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हर शहर में कम पढ़े-लिखे लोग, जो भू माफिया हैं, ठेकेदार हैं, किसी नेता के सेवक हैं, शराब की दुकानें चलवा रहे हैं, घर में जुआ खिलवा रहे हैं, ट्रक चलवा रहे हैं, कोई नीम-हकीम बनकर नकली दवाएं बिकवा रहे हैं, तो कोई अवैध शराब। ऐसे लोगों के हाथों में बहुतायत में किसी चैनल की माईक आईडी या कोई अनसुना सा समाचार पत्र आसानी से दिख जाएगा।

इन दोयम दर्जे के लोगों को पत्रकार बनाते हैं चैनल या अखबार के दफ्तरों में बैठे बड़े-बड़े दलाल। जो मालिकों के चरण वंदन से संपादक और वरिष्ठ संपादक तक बन जाते हैं। ऐसे लोग छोटे शहरों के दलाल किस्म के लोगों को चिन्हित कर अपने पास बुलाते हैं और पचास हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक में अपने चैनल या समाचार पत्र की पत्रकारिता को उनके हाथों गिरवी रख देते हैं।

ये कहानी सिर्फ गोंडा अकेले की नहीं है देश के हर शहर में ऐसे तथाकथित पत्रकार बाईक में प्रेस लिखाकर हाथ में कई सारे छुटभैय्ये टाइप के चैनलों के माइक या अनजाना सा समाचार पत्र लिए अपने गुर्गों के साथ थाने-कोतवाली में पत्रकारिता को बेचते आसानी से नजर आ जाएंगे।

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प्राइमरी स्कूलों में पहुंचने वाले इन दलालों को कोई हक नहीं है किसी शिक्षक का ज्ञान चैक करने का ऐसे लोगों से डरने या झिझकने की जरूरत नहीं है। हर शहर में ऐसे दलालों के खिलाफ मुहिम चलाकर आला अधिकारियों को अवगत कराने की जरूरत है।

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