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भ्रम मत फैलाइए गिरफ्तार करिए, चेन्नई के इस साधारण से घर में बैठे हैं जस्टिस कर्णन !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

न्यायपालिका से ज्यादा मीडिया परेशान है, चितिंत है. आखिर जस्टिस कर्णन कहां गए? उनकी गिरफ्तारी न होने और बेबाक बयानों से मीडिया का चरित्र साफ होता जा रहा है. ऐसे में जब मीडिया पुलिस को गिरफ्तारी के लिए सक्रिय दिखा रही है. कई जगह पुलिस से छापा डलता हुआ भी दिखा रही है. उसी समय जस्टिस कर्णन के करीबी बता रहे हैं कि वो चेन्नई स्थित अपने घर में आराम से बैठे हैं. लेकिन पुलिस उनको गिरफ्तार कर ही नहीं सकती क्योंकि ये संविधान के खिलाफ होगा.

महाभियोग चलाए बिना गिरफ्तारी संभव नहीं-

कानून के जानकार और संविधान विशेषज्ञ नितिन मेश्राम की मानें तो पुलिस का जस्टिस कर्णन को गिरफ्तार करना संविधान के खिलाफ है. उनका तो यहां तक कहना है कि किसी सिटिंग जज के खिलाफ गिरफ्तारी का आदेश देना ही संविधान सम्मत नहीं है. जस्टिस कर्णन कोलकाता हाईकोर्ट के पदासीन न्यायाधीश हैं और सिटिंग जज को गिरफ्तार करने के लिए पहले उसके खिलाफ महाभियोग लाना जरूरी है.सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज को पद से हटाने की प्रक्रिया का यह पहला चरण है. संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 217 के तहत की गई व्यवस्था में महाभियोग चलाने के लिए लोक सभा के कम से कम 100 या राज्य सभा के 50 सांसदों के समर्थन से सदन में इस आशय का प्रस्ताव लाना जरूरी होता है. इसके बाद सदन के पीठासीन अधिकारी को तीन जजों का एक पैनल बनाकर इसे उसके पास भेजना होगा.इस पैनल में सुप्रीम कोर्ट के एक जज, एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस या जज और एक न्यायविद का होना अनिवार्य है. यह पैनल लगाए गए आरोपों की जांच करेगा। इसकी अगली प्रक्रिया संसद में इस प्रस्ताव पर चर्चा कराने की है, लेकिन इससे पहले प्रस्ताव की एक प्रति उस जज को सौंपना जरूरी है, जिसके खिलाफ महाभियोग की मांग की गई है, ताकि वह अपने बचाव की तैयारी कर सके. यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के अधिकार के बाहर है।

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