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तुम सवाल से डरते हो, हमें मौत से डर नहीं… क्या यही वजह है मेरे कत्ल की…

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

नरेंद्र दाभोलकर, कलबुर्गी, पनसारे……. अब गौरी लंकेश। व्यवस्था के नकारेपन के खिलाफ जनता को जागरूक करने वाले लेखकों, पत्रकारों, कलमकारों की आवाज खामोश की जा रही है। इन बेबाक आवाजों का गुनाह सिर्फ इतना है कि ये साम्प्रदायिकता एवं फासीवाद के खिलाफ लिखते थे।

आखिर सवाल से इतनी बौखलाहट? सवाल से इतनी झल्लाहट? जम्हूरियत को बंदूक के नोक पर टिकाए यह शासक वर्ग कब तक पाबंदी लगाएगा? कितनों को मारेगा? जब तक एक भी कलम बचा रहेगा तब तक कलमकारों की बेबाकी यूँ ही जारी रहेगी।

सामाजिक क्रांतिकारी सूरज कुमार बौद्ध द्वारा लिखी गई इन्ही संवेदनाओं को छूती हुई मार्मिक कविता –

कलम की आवाज !

क़लमकारों के कलम की आवाज़
हुक्मरानों के नग्न ज़ुल्मीयत को
बहुत बेबाकी से बयां करती है।
क्या यही वजह है मेरे क़त्ल की ?

तुम सवाल से डरते हो,
हमें मौत से डर नहीं।
तुम बवाल करते हो,
हमें बवाल से डर नहीं।
तुम कहते हो मत बोलो,
हम कहते हैं सच बोलो
क्या यही वजह है इस हलचल की?
क्या यही वजह है मेरे क़त्ल की ?

आंसुओं के समंदर में
कुछ अय्यासी की मीनारें
खड़ी करके हमारी खुशहाली तय करते हो?
औसत से यूँ मेरी बदहाली तय करते हो?
तुम्हारे अच्छे दिन पर हम सवाल कर लिए
क्या यही वजह है इस जलन की?
क्या यही वजह है मेरे क़त्ल की ?

कलम रेह की मिट्टी सी नहीं होती,
जिंदा लाश बन चुप्पी सी नहीं होती,
हम सवाल करते हैं
तुम कत्ल करते हो
जरा बताओ कौन जिंदादिल है,
जरा बताओ कौन बुजदिल है।
कुछ सवालों से तिलमिलाकर,
त्रिशूल तलवार उठा लिए?

क्या यही वजह है इस पहल की?
क्या यही वजह है मेरे क़त्ल की ?

– सूरज कुमार बौद्ध,
(भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं)

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