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समझिए इस कर्मकांडी देश में स्मार्ट सिटी का सपना क्यों कठिन है ?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

स्मार्ट सिटी का सपना भारत मे क्यों कठिन है ये समझना होगा। इस मुद्दे को आप भारत के धर्म की नागर जीवन के प्रति दी गयी सलाह को समझे बिना नहीं समझ सकते। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, आपस्तंब धर्मसूत्र सहित अन्य धर्म शास्त्रों में नगरीय जीवन की निंदा की गई है।

वर्तमान इस्लामिक (अरबी) और ईसाई (यूनानी) जीवन व्यवस्था का विकास रेगिस्तान में नगर बसाते हुये या कबीलों के बीच सिटी स्टेट बसाते हुए हुआ है। इसलिए ये सभ्यताएं और संस्कृतियाँ हिन्दू व्यवस्था की तुलना में नगरीय जीवन के लिए अधिक योग्य हैं।

ईसाई और इस्लामिक व्यवस्था के विपरीत वर्तमान हिन्दू जीवन व्यवस्था का विकास प्राचीन नगरीय जीवन और नगरीय सभ्यताओं को विनाश करते हुए हुआ है। इंद्र का एक नाम पुरन्दर है, अर्थात नगरों का नाश करने वाला। कर्मकांडीय शुचिता के जो शास्त्रीय मानक हैं उसमें कोई भी मन्त्रपाठी ब्राह्मण अपने पवित्र मंत्रों का पूरा लाभ एकांत, वन या गांव में ही ले सकता है।

उसकी कर्मकांडीय सफलता शहरों में सीमित हो जाती है। धर्मशास्त्र साफ शब्दों में ब्रह्मचारियों और वेदपाठियों को नगरों में न आने की सलाह देता है और कुम्भीपाक जैसे नरकों का भय दिखाता है। सामान्य मानसिकता भी यही है कि नगर की सुख सुविधा में जीने वाला व्यक्ति अनैतिक है और गांव के अभाव, भुखमरी, एकांत आदि में जीने वाला व्यक्ति सदाचारी होता है।

ये सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसे लाखों ठोस प्रमाण हैं जो सिद्ध करते हैं कि हिन्दू समाज नगरीय जीवन के साथ तालमेल बैठाने में मुस्लिमों और ईसाइयों की तुलना में बहुत पीछे है। अरब की इस्लामिक व्यवस्था रेगिस्तान की असुरक्षित और कठोर परिस्थितियों में किलेनुमा शहरों में आश्रय खोजती है।

गांधी ने जिस तरह गांव को रोमांटिसाइज किया है उसमें हिन्दू प्रेस्क्रिप्शन का जहर भरा हुआ है। साफ नजर आता है कि हिन्दू व्यवस्था और नगरीय जीवन मे विरोध का रिश्ता है। हमारा सौभाग्य है कि नेहरू ने गांधी की नहीं सुनी और शहरों पर ध्यान दिया।

नगरी जीवन की स्थाई व्यवस्था के प्रति सभी धर्मों में दो तरह के दृष्टिकोण रहे हैं। इस्लाम मे सूफी फकीरों के विभाजन भी नगरी जीवन या यायावरी के आधार पर ‘अल-सफ़री’ (हमेशा सफर करने वाले) और ‘अल-मुकीम’ (एक मुकाम पर टिके रहने वाले) के रूप में हैं ठीक इसी तरह बौद्ध मठों के ‘अल मुकीम’ और ‘अल सफ़री’ भिक्खु भी थे, जैन मुनि भी लगातार चलते हैं वे भी ‘अल सफ़री’ के ही उदाहरण हैं। हिंदुओं में भी मठ या आश्रम में जीने वाले और भ्रमण करने वाले के रूप में दो पहचान है।

बाद के दौर में सामाजिक आर्थिक विकास के साथ हिन्दू धर्म के अलावा अन्य धर्मों और सभ्यताओं ने, विशेष रूप से इस्लाम और ईसाइयत ने नगर के केंद्र में मस्जिद और चर्च को प्रमुखता देते हुए सामूहिक प्रार्थना या साप्ताहिक मास के रूप में सामूहिकता और इंसानी बंधुत्व को विकसित किया। इस तरह उन धर्मो के साथ नगरीय जीवन का और नगर प्रबन्धन की धारणा का विकास तेजी से हुआ।

इसके उलट हिन्दू धर्म ने मंदिर को अधिकांश जनसंख्या के लिए अनुपलब्ध बना दिया। कुओं, तालों, सड़कों, जंगलों पर सामूहिक आधिपत्य के बोध के व्यवस्थित ढंग से हत्या की ये हिंदुओं का रिकॉर्डेड इतिहास है। आज और अभी भी हिंदुओं में सामूहिक जीवन के निषेध, एकसाथ भोजन के निषेध, आपस में घुल मिलकर रहने की संभावना का निषेध बना हुआ है। अभी भी एकांतवासी, आत्मपीड़क मुनि या ब्रह्मचारी या भिक्खु का भारी सम्मान बना हुआ है। ये सम्मान असल मे सामान्य नगरीय जीवन के समाजशास्त्र के लिए घातक होता है।

ईसाई और इस्लामिक व्यवस्था में वनवासी या आत्मपीडक मुनि या गुरु का कोई सम्मान नहीं है। वे शहरों में आम जनता के बीच सामान्य जीवन जीने वाले लोगों में से अपने धर्मगुरु चुनते आये है। इन चुने हुये लोगों में नगरीय जीवन के प्रति नगर की सुख सुविधा के प्रति कोई चिढ़ या निंदा की भावना नहीं होती। इसके विपरीत हिन्दू धर्मगुरु और वैरागी बाबा लोग नगरीय सुख सुविधा और सुरक्षा के हमेशा खिलाफ रहे हैं।

इस सबका परिणाम सामने है। ईसाई और मुस्लिम देशों में नगरीय जीवन का प्रबंधन भारत की तुलना में बहुत बेहतर है। हालांकि जिन इस्लामिक मुल्कों में पहले हिन्दू प्रभाव था वहां के शहर अभी बहुत बेहतर नहीं हैं, कारण भी साफ है, धर्म बदलने से जीवन शैली पुरी तरह नहीं बदलती।

नगर या सिटी का मतलब होता है अन्य मनुष्यों के साथ सहकार और समता बनाए हुए जीना। सामूहिक प्रयास करना। सड़कों, नालियों स्नानागारों, तालाबों आदि पर सामूहिक आधिपत्य और सबके समान अधिकारों का सम्मान। और दर्भाग्य से समानता, सामूहिकता और सामूहिक प्रयास हिंदू जीवन व्यवस्था के लिए अजनबी सी बातें हैं।

अपना घर गंगाजल और मन्त्र-अनुष्ठान आदि से साफ करके या पवित्र करके पूजा सामग्री आसपास की नदियों, कुओं में फेंक देना एक सामान्य व्यवहार है। पवित्र नदियों में लाशें बहा देना धार्मिक काम है। साल भर अपने घर के आसपास नालियां सड़कें कैसी भी सड़ रही हों लेकिन उसी सड़क पर दस दिन के लिए देवी देवता का फाइव स्टार पंडाल लगाने के लिए करोड़ो का चंदा करेंगे। और किसी को शर्म भी नहीं आती कि ये सब क्या है।

हिन्दू जीवन व्यवस्था का अन्धविश्वास और नगरीय जीवन के खिलाफ दी गयी उनकी हजारों साल की ट्रेनिंग भारत के शहरों पर भारी पड़ रही है। जिन सभ्यताओं ने नागरी जीवन के प्रबंधन और सुख सुविधाओं का विकास किया है उनके धर्म और सभ्यता को भी गौर से देखिये।

अगर आपका मन पाषाण युग मे हवन कर रहा है तो आप कम्प्यूटर युग के शहरों को यूरोप या अरब अमेरिका की नकल करके बना जरूर सकते हैं लेकिन उन्हें चला नहीं पाएंगे। हमारे शहरों में हर साल जो बाढ़ गन्दगी और बीमारी आती है वो साफ बताती है कि सभ्यता उधार में नहीं ली जा सकती।

(लेखक अन्तर्राष्ट्रीय शोधकर्ता और समाज विज्ञानी संजय श्रमण जोठे हैं)

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