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मायावती का राज्यसभा से इस्तीफे का ऐतिहासक निर्णय और मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की भूमिका

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

बसपा अध्यक्ष मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा दिया जाना निश्चित रूप से ऐतिहासिक निर्णय है। इस निर्णय में तमाम सारे विश्लेषणों के बीच एक संसदीय कार्य राज्य मंत्री के रूप में मुख्तार अब्बास नकवी की भूमिका का जिक्र होना बहुत आवश्यक था जो संयोग से नहीं हो रहा है।

हालांकि उस दिन की घटना में खुद मुख्तार अब्बास नकवी अपना संघ प्रेम दिखाने के लिए हंगामा करने में सबसे अग्रणी थे। ऐसे में उनकी भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं अरविन्द कुमार जो दुनियाभर में बढ़ रही आर्थिक असमानता का लोकतन्त्र पर पड़ने वाले प्रभाव पर, सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज़, जेएनयू से शोध कर रहे हैं।

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मायावती से बदतमीजी की मुख्तार अब्बास नकवी ने- 

राज्यसभा में सहारनपुर दलित उत्पीड़न की घटना पर बोलने से रोके जाने की वजह से मायावती के राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने पर तरह-तरह प्रतिक्रियाएं व विश्लेषण सामने आ रहे हैं। सत्तापक्ष सहित कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मायावती का यह कदम पूर्वनियोजित था, जिसका मकसद दलितों में सहानुभूति हासिल करना है, क्योंकि लोकनीति-सीएसडीएस के अनुसार हाल के चुनावों में दलितों का झुकाव बीजेपी की तरफ हुआ है, जिसकी वजह से मायावती अपनी चुनावी जमीन खोती जा रही हैं।

वहीं दूसरी तरफ कुछ विश्लेषक इस पूरे मामले में राज्यसभा उपसभापति पीजे कुरियन की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहें हैं? परंतु इन दोनों विश्लेषणों के बीच जो एक महत्वपूर्ण बात छूट रही है, वह है संसदीय कार्य राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी की इस पूरे विवाद में भूमिका? विदित हो कि मायावती जब राज्यसभा में सहारनपुर की घटना पर बोल रहीं थी, उस समय मुख्तार अब्बास नक़वी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ बीजेपी सांसदों नें इतना शोर मचाया कि बात मायावती के इस्तीफे तक पहुँच गई।

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इस पूरे विवाद में संसदीय कार्य राज्यमंत्री के तौर पर यदि नक़वी की भूमिका की पड़ताल की जाय, तो उनका आचरण अशोभनीय लगता है, या फिर शुद्ध देशी भाषा में कहें तो, बदतमीजी से परिपूर्ण मालूम होता है।

इससे पहले अपनी सीनियर नजपा हेपतुल्ला से की थी बदतमीजी- 

ऐसा नहीं हैं कि राज्यसभा में मायावती पहली ऐसी विपक्षी राजनेता हैं, जिनके साथ नकवी ने बदतमीजी की हो, गाहे बगाहें ऐसी खबर आती ही रहती है। परंतु सबसे सीरियस मामला मई 2016 में आया, जब राज्यसभा में विपक्ष के एक सवाल का जवाब देने के क्रम में नक़वी अपनी सीनियर मंत्री नज़मा हेपतुल्ला से ही भिड़ गए, जिसका जिक्र वरिष्ठ पत्रकार कोमी कपूर नें 08 मई 2016 को सण्डे एक्सप्रेस के अपने साप्ताहिक कालम में किया था

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बतौर कोमी कपूर, नकवी राज्यसभा में एक सवाल का जवाब दे रहे थे, उसी दौरान हेपतुल्ला नें उन्हें बैठ जाने के लिए कहा क्योंकि वो खुद अपने मंत्रालय का विस्तृत पक्ष रखना चाह रहीं थी, जिससे नक़वी नाराज हो गए और वो हेपतुल्ला की सीट पर जा कर उनसे बदतमीजी से पेश आए।

उस दौरान नजमा हेपतुल्ला मोदी मंत्रिपरिषद में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की कैबिनेट मंत्री थीं, जबकि नक़वी संसदीय कार्य मंत्रालय और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय में राज्यमंत्री थे। राज्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री के अधीन कार्य करता है, और नक़वी उस समय उम्र और पद में हेपतुल्ला से छोटे थे, इस लिहाज से वो उनके जूनियर थे।

पार्टी में खुद को सीनियर बताया नकवी ने- 

हेपतुल्ला ने जब नकवी का ध्यान जब इस बात की तरफ दिलाना चाहा, तो नक़वी ने पार्टी में अपने सीनियर होने की बात कही। नक़वी, अटल बिहारी सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं, और लंबे समय से बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. जबकि देश के प्रथम शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद की प्रपौत्री श्रीमती नज़मा हेपतुल्ला, 2004 में बीजेपी ज्वाइन करने से पहले लंबे समय तक कांग्रेस में रहीं थी।

हालांकि तब यह मामला बहुत तूल नहीं पकड़ा और इस घटना के बमुश्किल दो माह बाद जुलाई 2016 के मंत्रिमंडल विस्तार के वक्त हेपतुल्ला ने ज्यादा उम्र होने की वजह से केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और अगस्त 2016 में मणिपुर की राज्यपाल बन गईं। हेपतुल्ला के इस्तीफे के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक़वी की तरक्की देते हुए अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय का राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बना दिया।

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संसदीय कार्य मंत्री की रणनीति पर सवाल- 

उक्त घटना के दौर में पार्लियामेंट खासकर राज्यसभा शोर शराबे की वजह से काफी डिस्टर्ब रहती थी। उस शोर शराबे की खासियत यह होती थी कि उसमें सिर्फ विपक्ष के सांसद ही नहीं, बल्कि सत्तापक्ष के सांसद भी शामिल रहते थे। सत्तापक्ष के कुछ मंत्रियों का बर्ताव विपक्ष के नेताओं के साथ गरिमामयी नहीं होता था, जिससे सरकार महत्वपूर्ण बिल राज्यसभा से पास नहीं करा पा रही थी।

नक़वी संसदीय कार्य राज्यमंत्री के साथ झारखंड से राज्यसभा के सदस्य भी हैं, इसलिए ज्यादातर वो राज्यसभा में ही मौजूद रहते हैं, और सरकार की तरफ से सवालों का जवाब देते हैं। ऐसे में सदन में जब ऐसी अव्यवस्था फैले, जिसमें सत्तापक्ष के सांसदों का भी योगदान हो, तो ज्यादा सवाल सरकार के मंत्री खासकर संसदीय कार्य मंत्री की रणनीति की तरफ भी उठता है ?

उस दौर में ऐसा हुआ भी था, लेकिन गाज नक़वी के दूसरे सीनियर कैबिनेट मंत्री वैंकेया नायडू पर गिरी थी, जिनसे संसदीय कार्य मंत्रालय का कार्यभार वापस लेकर, बीजेपी में उनके धुर विरोधी अनंत कुमार को दे दिया गया था।

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उसी मंत्रिमण्डल विस्तार में, विवाद खड़ा करके सुर्खियां बटोरने वाली स्मृति ईरानी से शिक्षा मंत्रालय वापस लेकर कम महत्वपूर्ण कपड़ा मंत्रालय दे दिया गया था। तब यह कहा गया था कि प्रधानमंत्री काम करने वाले मंत्रियों को पसंद करते हैं, ना कि बेवजह विवादों में रहने वालों को हालांकि अब दोबारा सूचना प्रसारण जैसा मंत्रासय देकर बीजेपी ने ये बात खुद खत्म कर दी है। अब अगले मंत्रिमण्डल विस्तार में यह देखना होगा कि मुख्तार अब्बास नक़वी अपने खराब व्यवहार की वजह से संसदीय कार्य राज्यमंत्री का पद गँवाते हैं, या नहीं ?

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