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लालू यादव को मोदी-शाह का अहंकार तोड़ना है तो सीना ठोककर बनना होगा भारत का जैकब जुमा

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

आरजेडी अध्यक्ष और सामाजिक न्याय की बुलंद आवाज लालू प्रसाद यादव पर केन्द्र सरकार के इशारे पर हो रही सरकारी तंत्र की कार्रवाई का सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लोग विरोध कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ हम साथ हैं लेकिन भ्रष्टाचार के नाम पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके  विरोध करने वालो का गला दबाना किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सोशल मीडिया पर आक्रोशित समर्थकों ने साफ कहा है कि पीएम मोदी की हिम्मत है तो भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए नितिन गडकरी, अरुण जेटली और सबसे बड़कर व्यापम घोटाले की जांच कराएं जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। इस बहस के बीच वरिष्ठ लेखक एच एल दुसाध ने सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वालों नेताओं और लालू यादव को एक नसीहत दी है। आप भी पढ़िए-

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अगर लालू भाजपा को तोड़ना चाहते है तो उन्हें बनना होगा : भारत का जैकब जुमा

लालू प्रसाद यादव के 12 ठिकानों पर सीबीआई की रेड पड़ने से जहां सवर्णों में जश्न का माहौल है, वहीं सामाजिक न्याय के समर्थक स्तब्ध हैं. लेकिन बहुजन समाज के लोग अपने नायक के घर सीबीआई के छापे से जिंतना चिंतित हैं, लालू प्रसाद यादव उतने विचलित नहीं हैं, यह मुझ जैसे उनके गुणानुरागियों के लिए भारी राहत की बात है . इस घटना ने लालू जी में भाजपा के खात्मे की और आग पैदा कर दी है, ऐसा टीवी पर उनका बयान देखकर लगा.

लालू यादव का आत्मविश्वास बोल रहा था- 

अन्दर से गुस्से को पीते हुए लालू जी ने कहा ,’ यह भाजपा की राजनीतिक साजिश है. हम उसकी गीदड़ भभकी और बन्दर घुड़की से टूटने वाले नहीं हैं. हम भाजपा को तोड़कर रख देंगे’. बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि वह भाजपा को ख़त्म कर सकते हैं, तोड़ सकते हैं. लेकिन ऐसा वह अपनी खुद की ब्रांड इमेज से नहीं, सिर्फ और सिर्फ जैकब जुमा बनकर ही कर सकते हैं. बिना दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासी समर्थक प्रेसिडेंट जुमा की भूमिका में अवतरित हुए, वह भाजपा को ख़त्म नहीं  कर सकते।

सामाजिक न्याय के नेताओं को तैयारी करनी होगी- 

मैं यह मानता हूं कि सिर्फ लालू ही क्यों गढ़े हुए भ्रष्टाचार के आरोपी जितने भी बड़े बहुजन नेता/नेत्री जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं, उन्हें मूलनिवासी समर्थक छोटा-बड़ा जैकब जुमा बनना ही होगा, नहीं तो वे बर्बाद हो जाएंगे.

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सवर्ण समाज ही भ्रष्टाचार का पर्याय है- 

भ्रष्टाचार का समाजशास्त्र बताता है कि सवर्ण समाज ही भ्रष्टाचार का पर्याय है. देश को हिलाकर रख देने वाले सैकड़ों -हजारों करोड़ के घोटालों में 90-95 प्रतिशत संलिप्तता इसी वर्ग की रहती है. किन्तु सवर्ण भले ही भारत की छाती पर भ्रष्टाचारी वर्ग के रूप में सदर्प उपस्थित हों, भ्रष्टाचार के लिए ज्यादा चर्चा में रहते हैं बहुजनवादी नेता. सवर्णवादी सरकारें समय-समय पर उनके खिलाफ जांच एजेंसियों को सक्रिय कर इसमें और इजाफा कर देती हैं.

वंचित अपने नेता को खुद आरोप मान लेते हैं- 

इस पूरी कवायद से बहुजन नेताओं की छवि प्रभावित होती तथा उनके मनोबल पर बुरा असर पड़ता है. लोगों की आमतौर पर धारणा है कि गिरे हुए मनोबल के कारण ही बहुजनवादी नेतृत्व सम्पदा-संसाधनों में बंटवारे का मुद्दा जोर-शोर से नहीं उठा पाता. उनके ऐसा नहीं करने के कारण जिन दलित-आदिवासी-पिछड़ों के पास चुनाव जीतवाने लायक संख्या बल है, उनमें इन्हें विजयी बनाने के लिए हद से गुजरने का उत्साह पैदा नहीं होता. बहरहाल यह समस्या होकर भी बहुजन नेतृत्व के लिए समस्या नहीं बनती, यदि वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा से प्रेरणा लेते.

जैकब जुमा जैसा बदनाम नेता ही क्योंं ?

जैकब जुमा दुनिया के सबसे बदनाम नेताओं में से एक हैं. वह निहायत ही कम पढ़े-लिखे नेता हैं, जिन पर भ्रष्टाचार ही नहीं , मर्डर और यौन अपराध के पर्वत समान आरोप हैं. उनकी रंगीन मिजाजी से आहत होकर उनकी दूसरी पत्नी ने 2000 में पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली थी। ऐसे बदनाम व्यक्ति को किसी भी देश की जनता राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनाती. लेकिन जुमा 2009 में 65.9 प्रतिशत वोट पाकर वहां के राष्ट्रपति बने.

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राष्ट्र प्रधान बनने के बावजूद उनकी आदतों में कोई सुधार नहीं हुआ . 22 बच्चों के पिता जुमा ने 70 वर्ष की उम्र में 2012 में अपनी लड़की की उम्र की महिला से शादी रचाकर तहलका मचा दिया. किन्तु इससे उनका राजनीतिक जीवन अप्रभावित रहा. इसीलिए 2014 में जब दोबारा आम चुनाव में उतरे, उनके वोट प्रतिशत में मामूली सी गिरावट आई. 2009 के 65.9 के मुकाबले 61.1 प्रतिशत वोट पाए.

बस एक खास बात है जैकब जुमा में- 

एक महाबदनाम नेता यह चमत्कार करने में कैसे कामयाब हो गया? कारण साफ़ है मूलनिवासी अश्वेत बहुजनों के हितों की उग्र हिमायत में वे चैम्पियन रहे. तमाम कमियों और सवालों के बावजूद उन्होंने भारत के सवर्णों सादृश्य 9-10 प्रतिशत गोरों, जिनका वहां शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा, से 79 प्रतिशत मूलनिवासियों को लिबरेट करने के लिए ऐसी नीतियां बनाने की घोषणा की, जिससे मूलनिवासी कालों को संख्यानुपात में प्रत्येक क्षेत्र में हिस्सेदारी मिल सके।

वे इस बात के प्रति इतने प्रतिबद्ध रहे कि 2009 में उनके सत्ता में आने के बाद गोरों ने दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भागना शुरू किया. उन्होंने ऐसी नीतियां बनायीं हैं, जिसके फलस्वरूप कभी प्रत्येक क्षेत्र में 80-85 प्रतिशत अवसरों का भोग करने वाले गोरे अपनी संख्यानुपात पर सिमटने लगे . इस क्रम में मूलनिवासी अश्वेत बहुजनों को संख्यानुपात में अवसर मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है. इस कारण ही दक्षिण अफ्रीका का वंचित बहुजन उनकी तमाम कमियों को नजरअंदाज कर अपने ह्रदय सिंहासन पर बिठाये हुए है.

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भारत में भी है एक जैकब  जुमा की जरूरत- 

अब जहां तक भारत का सवाल है, दुनिया में उसकी सर्वाधिक साम्यता दक्षिण अफ्रीका से ही है. दक्षिण अफ्रीका की भांति यहां भी 9-10 प्रतिशत गोरे लोग सदियों से शक्ति के तमाम स्त्रोंतो पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये हुए हैं. शेष विशालतम आबादी दक्षिण अफ्रीका के अश्वेतों की भांति ही 15-20 प्रतिशत अवसरों पर गुजर-वसर करने के लिए मजबूर है.

ऐसे में आप बताएं मर्डर और यौन अपराध नहीं, सिर्फ गढ़े गए आर्थिक भ्रष्टाचार के लिए बदनाम भारत के बहुजन नेता यदि जैकब जुमा का अनुसरण करते हुए हुए मूलनिवासी दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित लोगों को आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षिक प्रत्येक क्षेत्र में ही संख्यानुपात में हिस्सेदारी दिलाने की घोषणा के साथ ही चुनाव में उतरते क्या सवर्णवादी भाजपा आज अप्रतिरोध्य बन पाती ?

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