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वो लालू यादव को घेरने आएं हैं तो मैं चुप हूं क्योंकि मैं यादव नही हूं, ध्यान रखना अगला नंबर आपका ही है

नई दिल्ली।  नेशनल जनमत ब्यूरो।

आज सारे देश में जमीन पर बहुजन आंदोलन जड़ जमा रहा है तो इन आंदोलनों को कुचलने के लिए ब्राह्मणवादी हमले भी तेज हो रहे हैं। कहीं इस देश में जातिगत जनगणना को सार्वजनिक करने के लिए आंदोलन हो रहा है तो कहीं ओबीसी के आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 60 फीसदी करने की मांग हो रही है।

कहीं न्यायपालिका में दलितों पिछड़ों की भागीदारी को लेकर आंदोलन चल रहा है। कहीं पर देश में सम्मानजनक जिंदगी की लड़ाई चल रही है पर जिस तरह से देश में जनवादी आवाजें जोर पकड़ रही हैं, इन आवाजों को दबाने वाली ताकतें भी पूरा जोर लगाकर इनको दबाने की कोशिश कर रही हैं। राष्ट्रीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव सूरज कुमार बौद्ध इन्ही मनुवादी ताकतों के हमलों की ओर इशारा करते हुए लिखते हैं कि…

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हबीब जालिब साहब कहते हैं-

शेर से डरते हैं, शायरी से डरते हैं,
कम नजर वाले रोशनी से डरते हैं…

अम्बेडकरवाद , ब्राह्मणवाद पर दिन-ब-दिन तमाचे पर तमाचा मार रहा है। बहुजनों के “बोल कि लब आजाद हैं तेरे” से इनकी ब्राह्मणशाही सत्ता खतरे में नजर आने लगी है। यही वजह है कि बौखलाए मनुवादी सत्ताखोरों ने पहले नेशनल जनमत, नेशनल दस्तक और अब बहुजन नायक दिलीप मंडल के फेसबुक अकाउंट को बंद कर दिया गया।

इसी तरह राजनीति में भी बहुजनों की आवाज को बुलंद करने के लिए लालू यादव को निशाना बनाया जा रहा है। अकेले बहुजनों पर ही हमला क्यों? क्या बहुजन समाज सामाजिक आंदोलन पर उतर आया है? अगर हां तो बहुजनों के सामाजिक आंदोलनों पर इतनी पाबन्दी क्यों? फेसबुक टीम को इस बात का अंदाजा तो होगा ही कि सोशल मीडिया पर असली पहुंच बहुजनों की ही है।

हम फेसबुक से अपील करते हैं कि वह बहुजनों के खिलाफ की जा रही इस साजिश का हिस्सा न बने, क्योंकि फेसबुक जिस अमरीका से संचालित होता है वो देश मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए जाना जाता है। इसके अलावा फेसबुक के संस्थापक मार्क्स जुकरवर्ग अमरीका में विविध लोगों की भागीदारी का सम्मान करते हैं। फेसबुक जाने -अनजाने में ही भारत के मनुवादियों की साजिश का हिस्सा बनकर यहां के 90 फीसदी मूलनिवासी लोगों के हितों के खिलाफ काम कर रहा है।

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बारी-बारी सब पर हमले होंगे- 

इस देश में मूलनिवासियों के खिलाफ बड़ी साजिशें रची जा रही हैं। वो बारी बारी से सबको रोकेंगे। अगर रोकने में नाकामयाब रहे तो हिंसा पर उतर आएंगे। इस तरह की पाबंदियां तो आपातकाल में लगाई जाती है या फिर लोक शांति भंग हो जाने की आशंका पर लगाई जाती हैं। क्या फेसबुक इंडिया के अधिकारियों को बहुजनों की वकालत करने वाली विचारधाराओं से लोक शांति भंग होने का खतरा है ?

यह फेसबुक इंडिया की मनुवादी चरित्र नहीं तो और क्या है जबकि भोजपुरी फिल्म के महिला उत्पीड़न सीन को बंगाल में मुसलमानों द्वारा किए जा रहे अत्याचार बताकर हिंसात्मक जन-आमंत्रण करने वालों के खिलाफ फेसबुक इंडिया के अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं होती है। मीडिया में जहर उगलने वालों का फेसबुक अकाउंट बंद नहीं किया जाता है। फेसबुक सोशल साइट पर ऐसे हजारों अकाउंट हैं जो महिलाओं के प्रति अश्लीलता का प्रचार प्रसार करते हैं, फेसबुक इंडिया उन अकाउंट को बंद नहीं करता। तो फिर इसका मतलब क्या समझा जाए, क्या असली समस्या बहुजनों से ही है ?

गुनाह हमारा सबकुछ सहते जाना है- 

असल में गुनाह उनकी आक्रामकता का नहीं है बल्कि गुनाह हमारी चुप्पी है। जब तक हमारे ऊपर हमला नहीं होता हम सोचते हैं कि यह पड़ोसी का मामला है। अगर X पर हमला होगा तो Y चुप रहेगा क्योंकि उसे लगता है की Y तो सुरक्षित है। इसी तरह से जब Y पर हमला होगा तो Z चुप रहेगा क्योंकि उसे लगता है वह सुरक्षित है। यह सिलसिला इसी तरह से चलता रहता है।। इस संदर्भ में सामाजिक चिंतक सोबरन कबीर यादव की एक कविता मेरे जेहन को छूती है…

“पहले वो यादवों को मारने आए..
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यादव नहीं था
फिर वो जाटवों को मारने आए..
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं जाटव नहीं था”

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मेरे छह अकाउंट बंद कर चुका है फेसबुक- 

सोशल मीडिया पर बहुजनों की आवाज उठाने के कारण अब तक खुद मेरे 6 फेसबुक अकाउंट बंद हो चुके हैं। आए दिन सोशल मीडिया पर यह शिकायत देखने को मिलती है कि बहुजनों के फेसबुक अकाउंट को बंद कर दिया गया है। फेसबुक टीम को इस बात की खबर होनी चाहिए कि वह हमारी आवाज को नहीं रोक सकती है क्योंकि हमारी संख्या करोड़ों में है जो करीब-करीब एक अरब का आंकड़ा हो चुका है।

‘तुम कितने अकाउंट बंद करोगे, हर घर से अंबेडकर निकलेंगे।’ देश और दुनिया के सभी प्रगतिशील चिंतकों, बुद्धिजीवियों और समाज सुधारकों से मेरी अपील है कि वह सब एक साथ खड़े हों क्योंकि यह सवाल केवल लालू यादव, नेशनल जनमत, नेशनल दस्तक, दिलीप मंडल, सूरज कुमार बौद्ध या फिर अन्य विशेष का नहीं है बल्कि सवाल संवैधानिक लोकतंत्र को बहाल करने का है, सवाल अभिव्यक्ति की आजादी को बरकरार रखने का है। अगर आप यह सोचते हैं कि आप सुरक्षित हैं तो यह आपकी भूल है क्योंकि अगला नम्बर आपका ही है।

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