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लेखक-पत्रकार महाजुटान में कलमकारों का संकल्प, पिछड़ो को मानसिक गुलामी से मुक्ति दिला के रहेंगे

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

पिछड़े वर्ग के लोगों ने अपनी-अपनी जातियों के नेताओं, अधिकारियों को तो खूब सम्मान दिया लेकिन असली मानसिक सम्पन्नता के सूत्रधार कवियों, लेखकों और पत्रकारों को उचित सम्मान कभी नहीं दे पाए। पिछड़ों की वैचारिक दरिद्रता का ये भी एक बड़ा कारण है। “जो जाति या वर्ग लेखन, पत्रकारिता, साहित्य में पीछे है वही पिछड़ा है और जो आगे वही अगड़ा ” राजनैतिक सत्ता से भी ज़्यादा जरूरी है बौद्धिक सत्ता। आइये हम बौद्धिक सत्ता की ओर एक मजबूत कदम बढाएं।

इसी मूल विचार की पृष्ठभूमि पर रविवार को विक्रांत गेस्ट हाउस गाजियाबाद में प्रथम पिछड़ा वर्ग लेखक पत्रकार सम्मेलन आयोजित किया गया। जहां मुंबई से लेकर मध्य प्रदेश और लखनऊ से लेकर राजस्थान, हरियाणा तक के लेखकों, कवियों और समाजसेवियों ने शिरकत की।

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अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार पदमश्री डॉ. श्याम सिंह शशि ने कहा कि पिछडे़ वर्ग के सामाजिक, राजनैतिक संगठन कभी भी पिछडे़पन की वास्तविक बीमारी समझ ही नहीं पाए या फिर समझना ही नहीं चाहते थे। इसलिए अब हम कलमकारों की जिम्मेदारी है पिछड़े समाज को मानसिक गुलामी के मकड़जाल से बाहर निकालकर उन्हे तरक्की के रास्ते पर ले जाएं।

संगठन बनाने का प्रस्ताव- 

इस मौके पर कार्यक्रम के मुख्य संयोजक राजकुमार सचान होरी ने पिछड़ा वर्ग के लेखकों और पत्रकारों एक संगठन बनाने का प्रस्ताव रखा। होरी जी ने कहा कि पिछड़ा वर्ग की सरकारी परिभाषा यह है कि जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हो. लेकिन उन सबसे पृथक अगर मजबूत और दमदार परिभाषा की बात करें तो वह है- जो समाज जितना अधिक लेखन, साहित्य, बौद्धिक कार्यों में पीछे है वही पिछड़ा है।

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65% जनसंख्या (लगभग 85करोड़) पिछड़ों में प्रतिशत के हिसाब से सबसे कम लेखक, कवि, पत्रकार, रचनाकार हैं. तो आइये मूल बीमारी को दूर करें संगठन के माध्यम से. इस  दौरान पिछड़े वर्ग के युवा लेखकों, कवियों और पत्रकारों को समाज के बड़े साहित्यकारों द्वारा लेखन की तकनीकि समझ विकसित कराने और पुस्तकें छपवाने के लिए आर्थिक रूप से प्रोत्साहित करने की बात भी रखी गई।

संगठन के माध्यम से पूरे देश में लेखकों, कवियों और पत्रकारों को एकजुट करने के लिए कार्यक्रम आयोजित होंगे। जिसके माध्यम से पिछड़े वर्ग के लेखकों-पत्रकारों को लिखने बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। मौजूद लोगों ने प्रस्ताव पर अपनी सहमति भी जताई।

बहुजन मीडिया बनाना ही होगा- 

नेशनल जनमत के संपादक नीरज भाई पटेल ने प्रस्ताव रखा कि संगठन को खुद का मीडिया बनाने पर जोर देना होगा। उन्होंने कहा कि कलियुग का परमप्रताप ही है कि हम बहुजन मीडिया के बारे में पिछड़े सोच भी पा रहे हैं। हम अपनी क्षमता के हिसाब से मीडिया के माध्यमों वेबसाइट, प्रिंट इलैक्ट्रानिक में अपने पैर मजबूत करें ताकि समाज में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक हम अपनी बात पहुंचा सकें। इस प्रस्ताव को सभी बुद्धिजीवियों ने समर्थन किया।

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कार्यक्रम में तय किए गए बिंदु- 

पिछड़े वर्ग का राष्ट्रीय स्तर का संगठन खड़ा कर समाज को मानसिक गुलामी से आजाद कराना। समाज में तथाकथित बौद्धिक लोगों द्वारा गढ़ी हुई झूठी बातों और इतिहास का सच लोगों के सामने लाना।

पिछड़े वर्ग के महापुरुषों के विचार और उनके वास्तविक जीवन दर्शन और कार्यों से लोगों को अवगत कराना। अगस्त तक ट्रस्ट, संगठन के नियम, उपनियम बनाकर पंजीकरण कराना है और इकाइयां समस्त देश और जहां सम्भव हो विदेशों में स्थापित करनी हैं।

एक न्यूज चैनल, शोध संस्थान, पत्र, पत्रिका के स्थापन और प्रकाशन में पूर्ण आर्थिक सहयोग की घोषणा गाजियाबाद के प्रसिद्ध और समर्पित समाज सेवियों द्वारा की गयी जिस पर आगे काम करना है।

संगठन के ढांचागत निर्माण की एक बैठक गाजियाबाद और एक लखनऊ में होगी. लखनऊ बैठक का संयोजन व्यास जी, अम्बर जी, अजय प्रधान जी और करुण जी की टीम करेंगी. तिथि आगे वार्ता कर तय की जाएगी।

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इस दौरान नेपाल सिंह कसाना, मुम्बई से आए श्याम अचल और कल्पेश यादव, मध्य प्रदेश से विभिन्न नगरों से 8 कवि, लेखक, कवयित्री, रजनीश कटियार बीकानेर, सीतापुर से पत्रकार अनुज वर्मा, आर बी सिंह पटेल, महासचिव अपना दल, बाराबंकी से शिवकुमार व्यास अम्बर, उमाशरण वर्मा करुणेश, अजय प्रधान, एटा के बलराम सरस यादव, फर्रुखाबाद से देश के मशहूर गीतकार पवन बाथम, देश के चोटी के हास्य कवि बलवीर खिचड़ी जी, सीमा सिंह गंगवार, पत्रकार ददन विश्वकर्मा, पानीपत से आए कवि गुलाब पांचाल, पार्षद एवं समाजसेवी बाबू सिंह आर्य, फतेहपुर से आए सत्येन्द्र पटेल प्रखर, कल्पना प्रजापति समेत अनेकों समाजसेवी, साहित्यकार, पत्रकार मौजूद थे।

कार्यक्रम संयोजक- इं. हरिभान सिंह पटेल, महेन्द्र सिंह चौधरी, हरिओम बैसला पटेल, वरिष्ठ साहित्यकार, हरि सिंह पाल, विकास चौधरी, इन्द्र प्रसाद अकेला, बाबा कानपुरी, रूप चंद नागर मौजूद थे।

 

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