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एक थी फूलन : जिसके नाम से सामंती मर्दवाद और मनुवाद की रूहें आज भी कांप उठती हैं !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

फूलन देवी भारतीय इतिहास की श्रेष्ठ विद्रोहिणी में से एक जिसने डर कर नहीं अपनी इज्जत को तार-तार करने वाले सामंतवादियों से बदला लेकर अपना जीवन जिया। लोकतंत्र की कसौटी पर खुद को कसा और देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंदिर संसद पहुंच गईं।

आज फूलन देवी का शहादत दिवस हैं ऐसे में सामाजिक चिंतक चंद्रभूषण यादव फूलन देवी को याद करते हुए उनके कदम को सामंतवाद और मनुवाद के खात्मे के लिए उठाया एक कदम मानते है। आप भी पढ़िए-

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“एक थी फूलन”

फूलन देवी का नाम आते ही शरीर के रोएं फूट पड़ते हैं। एक अजीब तरह का अहसास होता है फूलन देवी का नाम लेने पर क्योकि बचपन में जब मैं कोलकाता में था तो फूलन देवी के बीहड़ के कारनामों की तूती बोलती थी। “फूलन देवी कहती हैं कानून मेरी मुट्ठी में” सहित कईन-कई फिल्में फूलन देवी पर बन चुकी थीं।

फ़िल्म “बैंडिड क्वीन” ने भी फूलन की व्यथा कथा समाज के समक्ष रखी है जो बहुत बाद में आई लेकिन वह दौर जब फूलन देवी चंबल के बीहड़ो में जीवन यापन कर रही थीं उनके बारे में जो प्रचारित किया गया वह अलग था जबकि यथार्थ बिल्कुल अलग जो उनके नजदीक जाने या बीहड़ से बाहर आने के बाद दुनिया जान सकी।

आदर्श नारी चरित्र- 

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मेरा निश्चित मत है कि फूलन देवी को एक आदर्श नारी चरित्र कहा जा सकता है जिसने पढ़ाई-लिखाई न होने के बावजूद मनुवाद और मनुवादी संस्कृति को न केवल नकारा बल्कि इसे तार-तार कर स्त्री अस्मिता की अलग ही आधारशिला रखी। मनुस्मृति कहती है कि स्त्री का अपना अलग कोई अस्तित्व नहीं है। स्त्री और उसमें भी वर्णवार स्त्री का शोषण बहुत ही वीभत्स है।

स्त्री का अपना कोई अस्तित्व नहीं है मनु विधान में जिस नाते इंतजाम है कि शूद्र स्त्री है तो उसका भोग कोई कर सकता है, वैश्य है तो शूद्र पुरुष छोड़कर, क्षत्रिय है तो शूद्र और वैश्य छोड़कर, ब्राह्मण है तो केवल ब्राह्मण उसका भोग करेगा।

फूलन के साथ मनुविधान दोहराया गया- 

फूलन के साथ भी मनुविधान दोहराया गया और सामूहिक रूप से फूलन की अस्मिता तार-तार की गई लेकिन वाह रे फूलन, आपने इसे संयोग, परम्परा, त्रासदी, सामंती रुआब, मनुवादी विधान, गरीबी का अभिशाप, जातिगत इंतजाम न मानकर खुलेआम विद्रोह कर भारतीय संविधान को तार-तार करने वालों या संवैधानिक इंतजामों को अपना दास बनाके रखने वालों का जबाब ईंट के बदले पत्थर से दिया।

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फूलन देवी ने प्रतिकार का जो स्वरूप अख्तियार किया वह सभ्य समाज मे अस्वीकार्य है लेकिन क्या फूलन के साथ जो हुआ वह सभ्य समाज में स्वीकार्य है? मैं कहूंगा कि दोनों ही बातें जब सभ्य समाज में स्वीकार्य नही हैं तो हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया की वैज्ञानिक थ्योरी ने काम किया और फूलन ने खुद की अस्मत तार-तार करने वालों को जीवन से तार-तार कर एक नए तरह का इतिहास रच डाला।

एकलव्य की तरह मनुवाद के झांसे  में नहीं आईं फूलन- 

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एक एकलव्य था जिससे पुरातन कथाओं में अंगूठा ले लेने का दृष्टांत है। एकलव्य को बिन पढ़ाए द्रोण ने गुरु दक्षिणा के नाम पर धनुष चलाने में प्रयुक्त होने वाला अंगूठा कटवा लिया था, एकलव्य भी हंसते हुए अंगूठा दान कर दिया था। इसी परंपरा को हजार वर्ष बाद निभाने की कुचेष्टा जब बेहमई में हुई तो इस अबला फूलन ने उस वक्त रोते-बिलखते खुद की अस्मत लुट जाने दी लेकिन एकलव्य की तरह इसे स्वीकारा नहीं बल्कि इस अपमान ने उसे ज्वालामुखी बना डाला जिसके फूटे हुए लावों में यह पूरी परम्परा झुलस के रह गयी।

पुरुषवादी और मनुवादी सोच ने फूलन को डकैत, हत्यारा और न जाने क्या-क्या कहा? हम सब फूलन के बारे में पता नही क्या-क्या धारणाएं बना लिए लेकिन फूलन ने सामन्तवाद, मनुवाद को ऐसे झकझोरा कि कई दशक तक फूलन के नाम लेने मात्र से मनुविधान मानने व चलाने वालों के रोएं फूटते रहे।

आत्मसमर्पण के बाद  लोकशाही- 

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फूलन देवी के आत्म समर्पण के बाद उनकी जेलयात्रा और फिर लोकशाही में मजबूत हिस्सेदारी फूलन देवी के जीवन यात्रा को तीन भागों में बांट देता है। एक बेहमई इलाके की निषाद की भोली-भाली, अनपढ़, गरीब बेटी फूलन जिसका शील भंग किया जाता है, दूसरी अपने अपमान का बदला लेने के लिए विद्रोही वीर बाला फूलन देवी और तीसरी सभ्य समाज के बीच आकर संसदीय जीवन जीने वाली सांसद फूलन देवी।

फूलन देवी जब सांसद थीं तो वे मेरे जनपद देवरिया में चुनावी सभाओ को करने आई थीं। मैं तब समाजवादी पार्टी का जिला प्रवक्ता व मीडिया प्रभारी हुआ करता था। मैंने उस फूलन को जिसे बचपन में फिल्मों, काल्पनिक कथाओं, अखबारों आदि में पढ़कर एक क्रूर महिला के रूप में जाना था, नजदीक रहने, साथ सभाएं करने पर देखा कि वह मानवीय पहलुओं पर मोम सरीखी तो सामाजिक कुरीतियों,अपमानजनक कार्यो पर चट्टान सरीखी थीं।

आज फूलन के हत्यारे को महिमामंडित किया जा रहा है- 

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फूलन देवी जब दुनियावी छल-प्रपंच को नही समझती थी तो उनकी अस्मत को इस सभ्य समाज ने छलनी किया, जब वे बगावत छोड़के फिर सभ्य समाज के आंगन दिल्ली के सांसद निवास आईं तो इस तथाकथित सभ्य समाज ने उनके शरीर को गोलियों से 25 जुलाई 2001 को छलनी कर दिया।

इन दोनों स्थितियों को देखते हुए क्या यह कहना सही नही होगा कि फूलन का वही रूप बढ़िया था जिसमें वह डकैत, आततायी या हत्यारी थीं, कम से कम इतना तो उस रूप में था कि यह सभ्य समाज तब न फूलन को छू सकता था, न आंख दिखा सकता था और न मार सकता था।

जब टीटी भागकर स्टेशन मास्टर को बुला लाया-   

मुझे याद है अखबारों में छपा एक वाकया जो कुछ इस कदर था। फूलन ट्रेन से यात्रा कर रही थीं लेकिन वे टिकट नही बनवा सकी थीं। ट्रेन में टिकट चेकिंग करते हुए जब टीटी फूलन देवी के पास पहुंचा तो उसने उनसे टिकट मांगा। फूलन ने कहा कि टिकट नही है, टिकट बना दो।

टीटी ने टिकट बनाने के लिए जब नाम पूछा तो उन्होंने जैसे ही अपना नाम फूलन देवी बताया, टीटी भाग खड़ा हुआ और स्टेशन से, स्टेशन मास्टर व जीआरपी के जवानों के साथ कूपे में वापस लौटा। स्टेशन मास्टर और जीआरपी को देखकर फूलन देवी ने मामला जानना चाहा तो स्टेशन मास्टर ने कहा कि आप फूलन देवी हैं?

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फूलन के हां कहने पर उसने टीटी द्वारा उन लोगो को बुलाने का प्रयोजन बताया। फूलन देवी  ने कहा कि आप लोगों के आने का क्या काम, मैंने तो इन्हें टिकट बनाने को कह दिया था। फूलन देवी के नाम की ऐसी हनक थी लेकिन चंबल की फूलन बनने से पूर्व भी फूलन अस्मत लूटने के बाद मन से मारी गईं और बीहड़ छोड़ने के बाद शरीर से।

इस भारतीय सभ्य समाज ने एक बहादुर नारी को बर्दाश्त नही किया और 25 जुलाई को नृशंस हत्या कर उन्हें शरीर से भले मार डाला लेकिन फूलन को ऐतिहासिक पात्र बनने से कोई मनुवाद रोक नही सकता है।

बहादुर नारी फूलन देवी को उनकी पुण्यतिथि पर नमन है…..

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