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स्वागत करिए! बदलते भारत की तस्वीर बयां करता है सहारनपुर का ‘द ग्रेट चमार’ गांव

नई दिल्ली। नीरज भाई पटेल 

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर. सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि एक विचार है. एक सोच है जिसने शोषित तबके को देश की मुख्य धारा में लाने का काम किया. आजादी के बाद भी दलित समाज की मुख्यधारा से वंचित रहा. उसे बाबा साहेब ने सही मायने में आजादी दी. दलितों को स्वाभिमान से सर उठाकर जीना सिखाया. अब पढ़ लिखकर दलित युवा बदलाव के उस मोड़ पर खड़ा है, जब वो खुद को दलित कहलाने से परहेज नहीं करता बल्कि उस पर फख्र करता है.सहारनपुर के गांव घड़कौली का ये बोर्ड उसकी एक बानगी भर है.

द ग्रेट चमार ग्राम घडकौली में आपका स्वागत है-

सहारनपुर के एक कोने में बसा है घडकौली गांव. यह गांव इसलिए भी खास है और आज के दौर में प्रासंगिक है क्योंकि यहां घुसते ही पता चलता है कि दलित अब दबा और कुचला नहीं है. घडकौली गांव में पैर रखते ही चलेगा, जहां गांव के बाहर लगा साइन बोर्ड कहता है- ‘द ग्रेट चमार डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ग्राम घडकौली आपका स्वागत करता है.

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द ग्रेट राजपूताना है तो द ग्रेट चमार से क्या हर्ज है-

चंद्रशेखर आजाद रावण इस बोर्ड के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि ‘इलाके में वाहनों तक पर जाति के नाम लिखे होते हैं और उन्हें दूर से पहचाना जा सकता है. जैसे द ग्रेट राजपूत, राजपूताना. इसलिए हमने भी ‘द ग्रेट चमार’ का बोर्ड लगाया. इसे लेकर विवाद भी हुआ लेकिन आज भी ये मौजूद है.’अपनी पहचान और अपनी जाति पर हम शर्मिंदा नहीं है.

सामंतवादियों के विरोध का सामना करना पड़ा है इस बोर्ड को-

एक हजार से ज्यादा आबादी वाले घडकौली गांव में 800 से ज्यादा दलित रहते हैं. इस नाम की वजह से ही गांव ने साल 2016 में जातीय संघर्ष भी देखा है, लेकिन संघर्ष के बाद भी गांव खड़ा है और शान से दुनिया को अपनी पहचान दिखा रहा है. घडकौली कांड आज भी गांव वाले भूल नहीं पाते. आरोप है कि सर्वण जाति के लोगों ने पहले गांव के नाम वाले बोर्ड को काली स्याही से रंग दिया और उसके बाद गांव में लगी अंबेडकर की प्रतिमा पर भी स्याही पोती.

गांव वालों का आरोप है कि यह सब ठाकुरों ने किया और शिकायत पर पुलिस ने भी गांव वालों की नहीं सुनी. इसके बाद गांव वालों ने अपनी हिफाजत के लिए भीम आर्मी का गठन कर लिया. एक बार फिर से ‘द ग्रेट चमार ग्राम’ का बोर्ड हर आने-जाने वाले का स्वागत करता है.

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इस बोर्ड विवाद के कारण चर्चा में आई भीम आर्मी-

अप्रैल 2016 में इस गांव में हुई जातीय हिंसा के बाद भीम आर्मी पहली बार सुर्खियों में आई. एडवोकेट चंद्रशेखर आजाद पास के ही गांव के रहने वाले हैं. चंद्रशेखर का शुरु से ही दावा था कि भीम आर्मी का मकसद दलितों की सुरक्षा और उनका हक दिलवाना है. इसके लिए तरीका कुछ भी हो.बोर्ड विवाद में चंद्रशेखर की भीम आर्मी खुलकर सामने आई और बोर्ड की दोबारा स्थापना कराई.

बहरहाल तमाम जलन कुढ़न और हिंसा के बीच ‘द ग्रेट चमार’ 21वीं सदी में इस बात की मिसाल है कि दलित अब अपनी जाति को लेकर फख्र महसूस करने लगा है.

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