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महामना रामस्वरूप वर्मा पोगापंथी के खिलाफ जंग छेड़ने वाले मानवतावादी-तार्किकतावादी राजनेता थे

नई दिल्ली। नीरज भाई पटेल ( नेशनल जनमत ब्यूरो ) 

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले की राजपुर विधानसभा से 7 बार विधायक और चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में वित्त मंत्री रहे रामस्वरूप वर्मा उत्तर प्रदेश के इतिहास में एकमात्र उदाहरण हैं जिन्होंने फायदे का बजट पेश किया था। ब्राह्मणवाद के सवाल पर डा. राम मनोहर लोहिया तक से किनारा करने वाले वर्मा जी ने अर्जक संघ के रूप में बहुजनों के लिए अलग राह बनाई।

क्यों याद किए जाते हैं महामना-  (22 अगस्त 1923 -19 अगस्त 1998 )

रामस्वरूप वर्मा जी की नजर में निरादर (अपमान) और दरिद्रता(गरीबी) ये दो भारत की मुख्य समस्या है. इसी को केन्द्र बिंदु मानकर बजट बनाने से समस्या का समाधान हो सकता है. यही कारण है कि 1967 में जब वे उत्तर पर्देश के वित्तमंत्री बने तो पहली बार उन्होंने बिना कोई नय़ा कर लगाए मुनाफे का बजट पेश किया जो ऐतिहासिक माना जाता है.

हिन्दी को राज-काज की भाषा बनाने के लिए मंत्री रहते हुए उन्होंने दिल्ली वोट क्लब के मैदान में हजारों लोगों के साथ गिरफ्तारी दी थी।
इन्दिरा गांधी ने कई बार वर्मा जी को पद का लालच देकर कौंग्रेस में शामिल कराने की चेष्टा की थी पर उन्होंने त्याग दिया।

आजाद भारत में समाजवाद के जन्मदाता केरूप में डा. राममनोहर लोहिया और रामस्वरूप वर्मा को जाना जाता है, पर कुछ सैद्धांतिक मतभेदों के कारण डा. लोहिया और रामस्वरूप वर्मा दोनों अलग हो गए।

वे समाज में समानता लाकर वैज्ञानिक सोच के आधार पर समाज की स्थापना करना चाहते थे। श्रम करनेवाले लोगों को एकत्रित करके उनमे स्वाभिमान, स्वावलंबन की भावना भरना चाहते थे. इसलिए आज याद किए जाते हैं।

अर्जक संघ के संस्थापक- 

रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 एससी,एसटी और ओबीसी के सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए ही अर्जक संघ की स्थापना लखनऊ में की थी। अर्जक शब्द का मतलब है कमाकर, पैदाकर या उपजाकर खाने वाले लोग। इसके पहले आजाद भारत के प्रमुख दल कांग्रेस के विरोधी दल के रूप में डा. राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी थी।

डा लोहिया कांग्रेस के विरोधी नेता के रूप उभार पर थे। मूलनिवासी बहुजन समाज कांग्रेस के साथ था। 52 प्रतिशत अन्य पिछडे़ वर्ग का वोट हासिल करने के लिये डा. लोहिया ने नारा दिया, “संसोपा ने बाँधी गाँठ, पिछड़े पावे सौ में साठ” इस नारे ने पिछड़ों को समाजवादी आन्दोलन से जुड़ने का रास्ता साफ किया। वर्मा जी भी संसोपा यानि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गये।

भाग्यवाद, ब्राह्मणवाद के धुर विरोधी- 

उत्तर प्रदेश के जिले कानपुर देहात के गौरी करन गाँव में पिता वंशगोपाल, माता सुखिया की संतान के रूप में 22 अगस्त, 1923 को एक साधारण कुर्मी किसान परिवार में रामस्वरूप वर्मा (22 अगस्त, 1923) का जन्म हुआ। वर्मा जी पढ़ने में मेधावी थे। उन्होंने उस जमाने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. और आगरा विश्विद्यालय से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की, जब शूद्रों के लिए शिक्षा का दरवाजा बन्द था।लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के कारण शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा का रास्ता प्रशस्त हो रहा था जिसका लाभ रामस्वरूप वर्मा को मिला।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने तीन विकल्प थे। पहला विकल्प प्रशासनिक सेवा में जाना, दूसरा वकालत करना, तथा तीसरा विकल्प था राजनीति के द्वारा बहुजनों व देश की सेवा करना। वर्मा जी ने आईएएस की लिखित परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी लेकिन साक्षात्कार देने नहीं गए। उनका मत स्पष्ट था कि प्रशासनिक सेवा में रहकर वे आराम का जीवन व्यतीत कर सकते हैं लेकिन बहुजन समाज को भाग्यवाद, पुर्नजन्म, अन्धविश्वास, पाखण्ड, चमत्कार, जैसी धारणा से निजात नहीं दिला सकते।

लोहिया जी से मतभेद का कारण पोंगापंथ ही था- 

महान साहित्यकार एवं लेखक मुद्राराक्षस डा. राममनोहर लोहिया और रामस्वरूप वर्मा के सम्बन्धों की चर्चा करते हुए लिखते हैं, ”मेरी भेंट वर्मा जी से दिल्ली में डा. राममनोहर लोहिया के गुरूद्वारा रकाबगंज रोड स्थित बंगले में तब हुई जब वे रामचरित मानस को लेकर डा. राममनोहर लोहिया से बेहद उत्तेजक बहस कर रहे थे।

डा. लोहिया की पुस्तक थी रामचरित मानस। वे मनुस्मृति को भी उतना ही पसन्द करते थे। मनुस्मृति और रामचरित मानस पर मैं भी डा. राममनोहर लोहिया से पहले भिड़ चुका था वे हिन्दुत्व को गांधी के नजरिये से देखते थे। उन्हें हिन्दुओं में कुछ ऐसा जरूर दिखता था जिसमें सुधार व संशोधन किया जाये लेकिन हिन्दुत्व को खारिज करना उन्हें पसन्द नहीं था।

लेकिन रामस्वरूप वर्मा भारतीय समाज में क्रान्तिकारी और बुनियादी परिवर्तन के लिए हिन्दुत्व से मुक्ति चाहते थे। डा. लोहिया को हिन्दुत्व को खारिज किया जाए कतई बर्दाश्त नहीं था। इन्ही मुद्दों पर डा. लोहिया का वर्मा जी से भारी विवाद हुआ और यही विवाद डा. लोहिया की पार्टी से अलगाव का कारण बना।”

वर्मा जी इस मुद्दे कितने सही थे, दूसरा बड़ा सबूत यही है लोहिया के रिश्ते तत्कालीन जनसंघ से बहुत गहरे हो गये थे। उनके हिन्दुत्व प्रेम का ही परिणाम था उन्होने जनसंघ प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था और उनके महत्वपूर्ण साथी जार्ज फर्नांडीज जैसे लोग सीधे भारतीय जनता पार्टी में जुड़ गये थे।

मारे मर जाएंगे हिन्दु नही कहलाएंगे- 

वर्मा जी ने नारा दिया था, ”मारेंगे, मर जायेंगे, हिन्दू नहीं कहलायेंगे।“ डा. राममनोहर लोहिया के आदर्श गांधी, गांधी के आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम राम। राम ने ब्राह्मण धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया। गांधी जी ने वर्ण धर्म का समर्थन किया जो जाति व्यवस्था की फैक्ट्री है। फिर डा. लोहिया को समाजवादी कहना बहुत ही बड़ी भूल है।

रामचरित मानस में पिछड़ी जातियों को नीच और जंगली कहा गया है उसी रामचरित मानस को आदर्श ग्रन्थ मानकर डा. राममनोहर लोहिया रामायण मेला लगवाते थे फिर लोहिया को समाजवादी कैसे कहा जा सकता है। लोहिया समाजवादी नहीं ब्राह्मणवादी थे। वहीं ब्राह्मणवाद जिसे उखाड़ फेंकने में रामस्वरूप वर्मा आजीवन संघर्ष करते रहे। रामस्वरूप वर्मा, महामना गौतम बुद्ध के सन्देश को अंगीकृत करते हुए, अपना दीपक खुद बने।

महामना सम्पूर्ण क्रांति के पक्षधर थे- 

रामस्वरूप वर्मा सम्पूर्ण क्रान्ति के पक्षधर थे। उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति में भ्रान्ति के लिए कोई स्थान नहीं। वर्मा जी के अनुसार जीवन के चार क्षेत्र होते हैं- राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक। इन चारो क्षेत्रों में गैरबराबरी समाप्त करके ही हम सच्ची और वास्तविक क्रान्ति ला सकते हैं।

रामस्वरूप वर्मा निःसन्देह डा. राम मनोहर लोहिया के राजनैतिक दल संसोपा से जुड़े थे किन्तु लोहिया जी के साथ वर्मा जी का वैचारिक मतभेद था। लोहिया गान्धीवादी थे, वर्मा जी आंबेडकरवादी। लोहिया के आर्दश मर्यादा पुरषोत्तम राम और मोहन दास करमचन्द गान्धी थे, रामस्वरूप वर्मा के आदर्श बुद्ध, फूले, आंबेडकर और पेरियार थे।

डा. अंबेडकर ने कहा था, “असमानता की भावना, ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेको, वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगा दो।” अर्जक संघ के संस्थापक माननीय रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि पूरे देश में जहाँ जहाँ अर्जक संघ के कार्यकर्ता हैं वे बाबा साहब आंबेडकर के जन्म दिन को चेतना दिवस के रूप में मनाएं और मूल निवासी बहुजनों को जागरूक करने के लिए 14 अप्रैल 1978 से 30 अप्रैल तक पूरे महीने रामयण और मनुस्मृति का दहन करें।

अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं ने रामस्परूप वर्मा के आदेशों का पालन करते हुए रामायण और मनुस्मृति को घोषणा के साथ जलाया। सन् 1967 की संबिद सरकार में वर्मा जी डा. लोहिया की पार्टी संसोपा पार्टी से जीतकर उप्र विधान सभा पहुँचे। चौधरी चरण सिंह के मंत्रीमंडल में वित्त मंत्री बनाये गये जहाँ उन्होंने मुनाफे का बजट पेश किया।

इतना ही नहीं वर्मा जी ने उत्तर प्रदेश के सरकारी और गैरसरकारी पुस्तकालयों में बाबा साहब डा. आंबेडकर का साहित्य रखवाया जिसके कारण मूलनिवासी बहुजनों में स्वाभिमान जागने लगा। जातिवादियों द्वारा बाबा साहब द्वारा लिखित- जातिभेद का उच्छेद ओर धर्म परिवर्तन करें दोनो पुस्तकों को जब्त करने का आदेश जारी कर दिया।

शासनादेश के विरोध में रामस्वरूप वर्मा ने ललई सिंह यादव से हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर करवाई। ललई सिंह यादव ने विधिक लड़ाई जीतकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोनों पुस्तकों को बहाल करवाया। इतना ही नहीं उन्होने उत्तर प्रदेश सरकार पर मानहानि का मुकदमा दायर कर उन्होनेे उत्तरप्रदेश सरकार से पूरे मुकदमें का हर्जा और खर्चा भी वसूल किया।

शोषित समाज दल- 

महामना ने इन्ही सब मुद्दों के बाद लोहिया जी की संसोपा से अलविदा कर चौधरी महाराज सिंह भारती, बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा, प्रो. जयराम प्रसाद सिंह, लक्ष्मण चौधरी, नन्द किशोर सिंह के साथ 7 अगस्त 1972 को शोषित समाज दल की स्थापना की और नारा दिया-

“दस का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा नहीं चलेगा।

सौ में नब्बे शोषित हैं नब्बे भाग हमारा है।”

शोषितों का राज, शोषितों के लिए शोषितों के द्वारा होगा।

राजनीतिक दार्शनिक- 

रामस्वरूप वर्मा का मानना था सामाजिक चेतना से ही सामाजिक परिवर्तन होगा और सामाजिक परिवर्तन के बगैर राजनैतिक परिवर्तन सम्भव नहीं। अगर येन केन प्रकारेेण राजनैतिक परिवर्तन हो भी गया तो वह ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं होगा। रामस्वरूप वर्मा सामाजिक सुधार के पक्षधर नहीं थे। वे सामाजिक परिवर्तन चाहते थे।

वे हमेशा समझाया करते थे कि जिस प्रकार दूध से भरे टब में यदि पोटेशियम साइनाइट का टुकड़ा पड़ जाये तो उस टुकड़े को दूध के टब से निकालने के बाद भी दूध का प्रयोग करना जानलेवा होगा। इस लिए ब्राह्मणवादी मूल्यों में सुधार की कोई गुंजाइश नही है। ब्राह्मणवाद सुधारा नहीं जा सकता बल्कि नकारा ही जा सकता है।

सात बार विधायक रहे वर्मा जी- 

रामस्वरूप वर्मा संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से सन् 1957 में कानपुर के रामपुर क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधान सभा के सदस्य चुने गये। इसके बाद 1967, 1969,1980,1989, और 1991 में राजपुर विधानसभा से विजयी रहे।

वर्मा जी के तर्क के सामने विधान सभा में ब्राह्मणवादी पस्त हो जाते थे। उनके अनुयायियों ने ही उत्तर प्रदेश विधान सभा में रामायण के पन्ने फाड़े। बाहर रामायण और मनुस्मति को जलाकर राख कर दिया।

वर्मा जी ने उत्तरप्रदेश विधानसभा में धर्म के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर मन्दिर और मजार बनाकर सरकारी भूमि का अधिग्रहण करने, सड़कों के किनारे व बीच में धर्म स्थल बनाने से रोकने के लिए प्रस्ताव रखा। सवर्णों ने बिल का विरोध किया कि ऐसा करने से साम्प्रदायिकता बढ़ेगी।

वर्मा जी ने कहा, ”कुछ लोगों ने कहा है कि इससे साम्प्रदायिकता बढ़ेगी। तमिलनाडु में सरकार ने 12 हजार मन्दिरों को अपने हाथ में ले लिया वहां कोई अशान्ति नहीं हुई। कोई साम्प्रदायिकता नहीं भड़की। हाँ अगर यह होता कि विधेयक के जरिये जो मन्दिर हैं उनको गिरा दिया जाये तो जरूर अशांति की बात होती।

इसमें तो यह है कि जितने पूजा स्थल हैं उनको सरकार अपने नियन्त्रण में ले और हर पूजा स्थल पर जो चढ़ावा चढ़ेगा वह सरकार को प्रात्त होगा। पुजारी रखने के बाद जो बचता है वह धर्महित कार्यों में खर्च किया जाये। इसमें साम्प्रदायिकता लेश मात्र भी नहीं हैं। बहुजन समाज के विधायक जहाँ एक तरफ बिल का समर्थन कर रहे थे तो ब्राह्मण विधायक परेशान थे।

रामस्वरूप वर्मा ने कभी भी सिद्धान्तो से समझौता नहीं किया। उन्होंने सिद्धान्त हीन राजनीति नहीं की। 19 अगस्त 1998 को वे यशकायी हो गये। आज वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी तार्किक सोच और उनकी साहित्य सम्पदा के रूप में वो हमारे बीच आज भी जिन्दा है।

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