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मराठाओं का शौर्य से भरा गौरवशाली इतिहास बनाम पेशवाओं का कलम से गढ़ा इतिहास पार्ट-2

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

मराठा सेवा संघ दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष कमलेश पाटिल ने अपने विस्तृत लेख में उन जातिवादियों को करारा जवाब दिया है, जो मराठा शासन के गौरवशाली इतिहास पर सवाल उठाते रहते हैं।

लेख के पहले भाग में कमलेश पाटिल लिखते हैं कि जिनके पूर्वजों का इतिहास भारत को गुलाम बनाने का रहा है, उनकी हैसियत ही क्या है मराठाओं के बारे में बात करने की।

पानीपत के तीसरे युद्ध में भारत को बचाने के लिए डेढ़ लाख मराठा सेना मैदान में थी, उसमें कितने मिश्रा, झा, दुबे, तिवारी, त्रिपाठी, त्रिवेदी द्विवेदी, अग्रवाल, गुप्ता जैन थे…?

पहला भाग यहां पढ़ें- 

जिनके वंशजों का इतिहास देश को गुलाम बनाने का रहा है, वह मराठाओं के इतिहास पर उंगली ना उठाएं भाग-1

एक मराठा का जातिवादियों को दिए जवाब का दूसरा भाग- 

अच्छा, छत्रपति शाहू जी प्रथम ने विश्वास जताकर तुम्हे पेशवा क्या बना दिया तो तुमने शाहू जी प्रथम को एकांत देखकर धोखे से जबरन अधिकार पत्र लिखवा लिया और सातारा से राजधानी बदलवा कर पुणे करवा ली। इसके बाद छत्रपति के नाम से तुमने राज किया और कहते हो कंधार से काबुल तक हमने विजय पताका लहराई। पेशवा बाजीराव जैसे व्यक्ति को तुमने इतिहास मे होरी बना दिया।

स्वाभाविक है वहां आप सेना का नेतृत्व कर रहे थे, तो क्रेडिट आपका। लेकिन पानीपत में भी तो सेना का नेतृत्व पेशवा ब्राह्मण कर रहे थे. तो यहां की पराजय भी तो पेशवा के नाम से ही प्रचारित होनी चाहिए. काबुल में झंडा गाड़ा तो पेशवाओं ने और पानीपत में हारे तो मराठे …?

जब जीतने का श्रेय पेशवा का है तो हारने का श्रेय भी पेशवा को ही लेना होगा. लेकिन जातिवादी कलमकारों ने अनैतिक महाभ्रष्टाचार करते हुए इस तथ्य को गलत तरीके से प्रचारित किया। पेशवाओं ने क्यों दिसंबर मे कड़ाके की थंड से सेना को अवगत नही कराया।

क्यों नवंबर के मध्य में ही सेना पानीपत मैदान मे उतार दी? प्रत्यक्ष युद्ध 14 नवंबर 1761 को हुआ. 15 से 40 साल की उम्र के सेना के जवान पहले अनाज और वातावरण से अधमरे हो गए। तुम्हारी सोच पर तो निर्माता को भी तरस आ रहा है।

किसी एक कृत्य से किसी का वंश कलंकित नहीं हो जाता- 

मराठा सिंधिया वंश के बारे में लोग यह तो जानते हैं कि सन 1857 मैं इस वंश के राजा जयाजीराव सिंधिया ने महारानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे और उनके सहयेागीयों की मदद करने के बजाय उनके खिलाफ अंग्रेजों की ओर से सेना उतारी। जयाजीराव सिंधिया के इस कृत्य के आधार पर लोग आज सिंधिया राजघराने को गद्दारी के दाग से कलंकित राजघराने के रूप में जानते हैं।

दूसरा पहलू यह है कि लोग इस राज घराने के सुकृत्य, पराक्रम, रणकौशल, वीरता, महानता और गौरवशाली इतिहास से अनभिज्ञ है। किसी एक के अपने कर्म को नहीं निभाने से वंश, राजघराना गद्दार सिद्ध नहीं होता।

सिंधिया राजघराने के संस्थापक रानोजी राजे सिंधिया  के 5 बेटों में से कोई पानीपत में शहीद हुआ तो किसी ने अंग्रेजो, निजामशाही और मुगलों को पराजित कर के अपने पराक्रम को सिद्ध किया। रानोजी राजे के पुत्रों का नाम (जयप्पाजी ,दत्ताजी ज्योतिबाजी, तुकोजी और महादजी) था ।

जयप्पाजी सिंधिया ने निर्णायक रूप से मराठों की कमान संभाली वह पराक्रमी योद्धा थे। उनकी हत्या कर दी गई थी। दत्ताजी सिंधिया अपनी बहादुरी के लिए मशहूर थे उनके शौर्य और पराक्रम से उन्होंने अफगानियों को दंग कर दिया था जब अफगानी घुसपैठिया अहमद शाह दुर्रानी भारत में अपने कदम रखने के प्रयास में था तब दत्ताजी सिंधिया ने उसे भारी टक्कर दी।

अफगानियों से लड़ते वक्त उनकी मृत्यु हुई। अफगानियों से जंग के मैदान में जब वह घायल अवस्था में थे तब अफगानी टुकड़ी के सरदार नजीबुद्दौला ने उनसे पूछा कि “क्या पाटिल और लड़ोगे” तब दत्ता जी सिंधिया ( शिंदे ) ने प्रत्युत्तर दिया कि “हां बचेंगे तो और लड़ेंगे”।

नजीबुद्दौला ने दत्ता जी सिंधिया का सर काट दिया। इस तरह देश की रक्षा करते करते वे वीरगति को प्राप्त हुए। तुकोजी सिंधिया भी पानीपत के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए। सन् 1742 में हैदराबाद के निजाम ने विरार और बेलूर में मराठो पर आक्रमण कर दिया तब तुकोजी सिंधिया ने अदम्य साहस और वीरता से हैदराबाद के निजाम को पराजित किया।

महादजी सिंधिंया का कुशल शासन- 

महादजी सिंधिया एक कुशल नेतृत्व कारी शूरवीर और बुद्धिमान योद्धा, शासक रहे। उन्होंने पानीपत में पराजित मराठा साम्राज्य को पुनरुत्थान की ओर ले जाने का कार्य किया। उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य के विस्तार का सबसे अधिक श्रेय महादजी राजे सिंधिया( शिंदे) को दिया जाता है।

वह मराठा साम्राज्य के तीन स्तंभों में से एक रहे। उन्होंने मुगल शासक शाह आलम द्वितीय को स्वयं के अधीन कर दिल्ली की गद्दी प्रदान की। अन्य छोटे-छोटे राजाओ को एक छत्र के नीचे लाकर विशाल भारत को एक संघ स्वराज्य बनाने की दिशा मे काम किया। इसलिए जिन्हे केवल अपना-अपना राज्य ही प्रिय था ऐसे महत्वाकांक्षी राजाओ को भी पराजित करके स्वतंत्र भारत की ओर कदमताल का काम किया।

विशाल एकजुट भारत बनने पर कोई विदेशी आक्रांता दोबारा आक्रमण का साहस ना करे इसलिए विशाल भारत की एक सेना बनाने की ओर महादजी सिंधिया और मल्हार राव होल्कर ने काम किया, और इसे कबूल ना करने वालों पर आक्रमण करना जरूरी समझा, इसलिए उन्होंने नर्मदा के पार जाटों को पराजित करके मथुरा में जाट शक्ति का अंत किया।

जय अप्पाजी सिंधिया के पुत्र जन्कोजी राव सिंधिया भी पानीपत के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए। सिंधिया वंश के गौरवशाली इतिहास से जो लोग अनभिज्ञ हैं वही सिंधिया वंश को गद्दारी के दाग से कलंकित समझते हैं। किसी के भी विषय में चाहे वह राजघराना हो या अन्य मनोधारणा बनाने से पहले उनका पिछला इतिहास अवश्य जान लेना चाहिए।

इतिहास गवाह है कि महाराणा प्रताप के सगे भाइयों, शक्ति सिंह ,जगमाल सिंह, सागर सिंह और अन्य ने उनका साथ छोड़ कर अकबर का साथ दिया परंतु इससे सिसोदिया वंश कलंकित नहीं हो जाता क्योंकि इस वंश के पूर्वजों ( बप्पा रावल जी, राणा सांगा जी ,राणा उदयसिंह जी), का गौरवशाली इतिहास सब को पता है। इसी वंश ने हमें महाराणा प्रताप जैसे वीर, पराक्रमी, क्षत्रिय कुल शिरोमणि योद्धा दिए हैं।

ठीक उसी प्रकार सिंधिया घराने का भी गौरवशाली इतिहास है। अफगानियों से सबसे ज्यादा लोहा इसी वंश ने लिया था। इस वंश के सपूत पानीपत में शहीद हुए हैं। किसी भी विषय पर अपनी मनोधारणा बनाने से पूर्व उसके सभी तत्वों, तथ्यों को परख लेना आवश्यक हैं।

(लेखक कमलेश पाटिल, संयोजक, जाति जोड़ो, भारत बनाओ अभियान- “85 करोड किसान गण परिषद”, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, मराठा सेवा संघ हैं ) 

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