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हैवानियत की हद को पार करती तीन मुल्कों की दास्तान: फ़र्खुंदा, मशाल, अखलाक और उन्मादी भीड़

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

देश में इस समय हत्यारे भीड़तंत्र को लेकर सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक बहस छिड़ी है। बेवजह निर्दोष लोगों कहीं गौहत्या के नाम   पर कहीं बीफ के नाम पर मार दिया जा रहा है। बहस इस बात को लेकर भी है भीड़ खुद इतनी क्रूर होती जा रही है या कुछ खास मकसद वाले सियासतदां उनको अपने राजनीतिक इस्तेमाल के लिए क्रूर बना देते हैं।

इस सारी कवायद के बीच रांची विश्वविद्यालय की छात्रा और सोशल मीडिया पर सक्रिय चाहत अन्वी ने तीन मुल्क भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की हत्यारी भीड़ की अलग-अलग दास्तान लिखी है। ये तीनों घटनाएं अपने आप में सोचने पर मजबूर करती है कि हम धर्म के खांचों में फिट होकर अपनी इंसानियत और मानवता को शायद कहीं पीछे छोड़ते चले आ रहे हैं. आप  भी पढ़िए और साचिए….

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तीन मुल्क: फ़र्खुंदा, मशाल, अखलाक और उन्मादी भीड़- 

अंधभक्ति या अंधविश्वास या अंधी भीड़ कहा जाये इसे जिसके पास सच और झूठ जानने का सब्र भी नहीं. इस भीड़ का धर्म इतना कमज़ोर कैसे हो जाता है कि एक फेसबुक के पोस्ट(चाहे ही वो झूठा हो) से संकट में आ जाता है इन्हें कैसे समझ में आयेगा की धर्म हमेशा हाथों में तलवार लेकर ही नहीं बचाया जा सकता है बल्कि कभी हाथों में कलम थाम कर देखों, इसकी धार तलवार की धार से कम नहीं बरशर्तें दिल में धर्म के साथ-साथ इंसानियत भी हो.

अफगानिस्तान- फर्खुदा- 

19 मार्च 2015 को फ़र्खुंदा नाम की एक 27 साल की अफगानी लड़की अपनी माँ को वादा करती है कि वह बच्चों को पढ़ा कर जल्दी घर आ जाएगी, पर वो फिर कभी घर वापस न लौट पायी। उसका जनाजा हजारों अफगानी महिलाओं ने अपने कंधों पर उठाया। ‘धार्मिक अध्ययन’ की यह छात्रा जो शिक्षिका बनने का ख्वाब देखा करती थी, उन्मादी भीड़ का शिकार आखिर क्यों और कैसे बन गई?

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19 मार्च को वह बच्चों को पढ़ाकर वापस लौट रही थी। वह एक मजार पर गयी। उसने वहां ताबीज बेचने वालों का विरोध किया तथा इसकी शिकायत वहाँ के प्रमुख से की। फलस्वरूप उन मौलवियों ने फ़र्खुंदा पर क़ुरान जलाने का झूठा आरोप लगाकर उसे भीड़ के हवाले कर दिया। भीड़ ने पहले उसे पत्थरों और डंडों से मारा, उसे सड़क पर घसीटा। कार से उसका सर कुचल दिया और अंत में उसे जला दिया गया। उसे मारने वाले अधिकतर लड़के थे, जिन्हें वीडियो में देखा जा सकता है।

इस घटना के बाद उसके खिलाफ ईशनिन्दा कोई सबूत नही मिला और उसकी बेगुनाही साबित हो गई उसे शहीद का दर्जा मिला और जिस सड़क पर उसे घसीटा गया और जलाया गया था उसका नाम ‘फ़र्खुंदा’ के नाम पर रखा गया।

भीड़ साहस तो देती है पर सही गलत सोचने की क्षमता क्यों नहीं देती? फ़र्खुंदाओं की शहादत किसी भीड़ को सम्मति क्यों नहीं देती। फ़र्खुंदा सड़क पर चलने वाले क्या कभी इस बात को याद रखेंगे कि उनमें से कुछ उस भीड़ का हिस्सा बने थे, अब अब ऐसा कभी न होगा।

पाकिस्तान- मशाल खान

हाँ, यही तो नाम था उसका जिसकी जिंदगी की ख्वाहिश पैसा कमाना नहीं बल्कि इल्म कमाना था. कवि और लेखक बनने के सपनें देखने के साथ वो नोबल पुरस्कार पाना चाहता था. सूफी संगीत, फोटोग्राफी का शौक रखने वाले 23 साल का ये लड़का सबके अधिकारों ले लिए लड़ा करता था पर अफ़सोस 13 अप्रैल 2017 को जब ये अकेले भीड़ से जिंदगीे की जंग लड़ रहा था तो कोई इसके लिए लड़ने नहीं आया.वो अक्सर लिखता था कि ‘जितना मैं लोगों को समझने लगा हूँ उतना ही मुझे अपने कुत्ते से प्यार हो गया है’.

23 साल के इस जर्नलिज्म के इस मेधावी छात्र को उसके हॉस्टल के कमरे से पहले खींच कर निकाला गया उसे बेहरमी से पीटा गया, गोली मार कर उसे हॉस्टल की बॉलकोनी से नीचे फेंक और गमले से उसका सर फोड़ दिया जाता है, इस दौरान वो अपने बेगुनाह होने और हॉस्पिटल ले जाने की बात कहता रहा.

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अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी, पकिस्तान के इस छात्र की सिर्फ यही गलती थी कि वो अपनी ही यूनिवर्सिटी में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ़ विश्वविधालय प्रशासन से लड़ रहा था. फेसबुक पर ‘ईशनिंदा से संबंधित पोस्ट’ लगाने के झूठे आरोप में उसे फँसा कर भीड़ के हाथ में सौप दिया गया. सबसे हैरत की बात यह थी कि ये भीड़ कोई 40 से 80 साल के प्रौढ़ या बुजुर्गों की नहीं थी बल्कि उसके सहपाठियो की थी जिनके हक़ के लिए वो लड़ रहा था।

भारत- अखलाक- 

‘गौ और अख़लाक़ युग’ की शुरुआत अख़लाक़ की मौत के साथ भारत में एक नई किस्म की धर्मान्धता ले कर आयीं. एक बुज़ुर्ग को केवल गाय खाने के शक में पुरे गांव के बीच मार दिया जाता है, इस हत्या ने भारत में भीड़ को एक नया स्वरुप दे दिया, धर्म रक्षा को देश रक्षा से जोड़ कर उसे इतनी शक्ति दे दी अख़लाक़ की हत्या के आरोपी की मृत्यु पर उसके शव को तिरंगे से लपेटा गया मानो उसने देश की रक्षा में बॉर्डर पर अपनी जान दी हो.

आज अख़लाक़,फर्खुंदा,मशाल हमारे साथ नहीं है, पर अगर भीड़ ने धर्म के साथ-साथ इंसानियत को बचाने की एक कोशिश की होती तो शायद फ़र्खुंदा आज शिक्षिका बन कर बच्चों को इल्म दे रही होती, मशाल कविताएं लिख रहा होता और अख़लाक़ ईद अपनों के साथ मना रहा होता.

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‘नज़रुल इस्लाम’ की एक कविता लिख रही हूँ इस उम्मीद पर की अब और कोई अख़लाक़, जुनैद, कार्तिक घोष की बलि धर्म के नाम पर न चढ़े.

मनुष्य से घृणा करके

कौन लोग क़ुरान, वेद, बाइबिल चूम रहे है बेतहाशा

किताबें और ग्रंथ छीन लो

जबरन उनसे

मनुष्य को मार कर ग्रंथ पूज रहा हैं

ढोंगियो का दल!

सुनो मुखों

मनुष्य ही लाया है ग्रंथ

ग्रंथ नही लाया किसी मनुष्य को.

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