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मौर्य काल से लेकर ब्राह्मणराज की स्थापना तक, शत्रु की हत्या के जश्न में दीप जलाने का रिवाज है ?

नई दिल्ली, मृत्युंजय प्रभाकर (नेशनल जनमत) 

श्रमण संस्कृति का जो सबसे बड़ा और विकसित सम्प्रदाय था उसे हम आजीवक समुदाय के रूप में जानते हैं। बौद्धों और जैनों की तरह यह भी उस जमाने में एक बड़ा समुदाय था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय में इसे बौद्धों और जैनों की तरह बराबर का महत्व प्राप्त था। हालांकि चंद्रगुप्त ने खुद जीवन के आखिरी वर्षों में जैन धर्म स्वीकार कर लिया था।

चंद्रगुप्त के बेटे बिंदुसार ने आजीवक सम्प्रदाय को स्वीकार किया और उसे मौर्य वंश को राजकीय धर्म घोषित किया। उस वक्त आजीवक सम्प्रदाय का गोल्डन पीरियड था। बराबर की पहाड़ियां और उनकी छोटी-छोटी गुफाएं जिन्हे हम बौद्धों की धरोहर मानते आए हैं, वो दरअसल आजीवक समुदाय के थे। यह चंद्रगुप्त मौर्य और बिंदुसार के समय के ही बने हुए हैं।

कहा जाता है कि अकेले मगध में तब 18000 से ज्यादा आजीवक भिक्षु रहते थे, जो दिन-रात जनता के बीच में आजीवक समुदाय की तर्ज पर जीवन जीने का तरीका समझाते थे। इस तरह बौद्ध, जैन और आजीवकों के बीच ज़मीन पर अपने फैलाव को लेकर बड़ी प्रतियोगिता थी। बौद्ध और जैन आजीवक संप्रदायों को अपनी तरफ मिलाने की भरपूर कोशिश में थे।

बिंदुसार के बेटे अशोक ने अपने आरंभिक दौर में तो कोई छेड़छाड़ नहीं की लेकिन कलिंग की लड़ाई के बाद जब वह बौद्ध बना तब उसने बौधों के प्रभाव में आकर आजीवक सम्प्रदाय के भिक्षुओं के कत्लेआम का आदेश दिया। रातो-रात हज़ारों आजीवकों को मौत के घाट उतार दिया गया। उनकी किताबें जला दी गईं। इस तरह मगध से आजीवक सम्प्रदाय का खात्मा शुरू हुआ।

बचे-खुचे आजीवक प्राण बचाकर दक्षिण की तरफ भागे और उनमें से कुछ कर्नाटक में जाकर बसे तो कुछ केरल तक गए। 12 वीं शताब्दी तक उनका उधर इतिहास मिलता है, लेकिन उसके बाद वहां भी उनके साथ वही हुआ। तो बंधु श्रमण संस्कृति और उसके समुदाय को बौद्धों से मिलाने की भूल न करें।

बौद्धों-जैनों ने इनसे आश्रय लेकर बहुत कुछ अपनाया पर बाद में उसके पीठ में ही छुरा घोंप दिया। इसके लिए बख्तियार ख़िलजी नहीं अशोक दोषी थे। मौर्यों के आखिरी राजा बृहद्रथ की हत्या कर उसका हिन्दू सेनापति पुष्यमित्र शुंग राजा बन बैठा और देश में ब्राह्मण राज की ज्ञात और विधिवत शुरुआत हुई।

आजीवकों की जिस तरह क्रूर हत्या बौद्धों के शह पर अशोक ने करवाई वैसे ही ब्राह्मणों के कहने पर शुंग ने बौद्धों का भयंकर कत्लेआम कराया। कहा जाता है कि उस वक़्त धरती पर सिर्फ खून- ही खून बिखरा था। जिसे साफ होने में कई वर्ष लग गए। यह मार-काट श्रावस्ती से शुरू हुई थी जो बौद्धों का बड़ा केंद्र था, तब शायद शुंग उधर ही थे।

बौद्ध लोग तो यह भी मानते हैं कि सरयू नदी में बौद्धों के इतने सर काटकर डाले गए कि उसका पूरा पानी लाल हो गया और सिर्फ सर ही सर दिखते थे, इसलिए उसका नाम सरयू पड़ा। दीपावली का जो त्योहार है वह तभी से शुरू हुआ। यह राम की वापसी का नहीं बल्कि ब्राह्मण राज की स्थापना का विजय उत्सव था, यह भी एक धारणा है।

बाकी तो आपको पता ही है कि ब्राह्मण धर्म में शत्रु की हत्या का जश्न मनाने का रिवाज है। हम आज भी रावण से लेकर जाने कितने लोगों की हत्या का जश्न जोर शोर से मनाते हैं। गांधी हत्या पर भी देश में आरएसएस द्वारा दिए जलाए गए थे। आज भी कई लोग जलाते हैं। बाबरी विध्वंश पर भी कई घरों में दिए जलाए गए और आज भी 6 दिसंबर को लोग दिए जलाते हैं।

यह तो मेरा आंखों देखा है. तो दिए जलाना हमारे लिए शत्रु के विध्वंस पर विजय उत्सव मनाने का प्रतीक है। इसका प्रकाश पर्व से कोई लेना देना नहीं है। यह सब चोचले बाद में डाले गए हैं।

( लेखक बिहार निवासी मृत्युंजय प्रभाकर जाने माने रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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