You are here

मायावती को सदन में दलितों की बात ना रखने देना लोकतंत्र के ‘मसखरातंत्र’ में तब्दील होने की आहट है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

यूपी के सहारनपुर में दलित विरोधी हिंसा को लेकर बात रखने के दौरान बार-बार टोके जाने और सांसदो के हंगामे से नाराज बसपा प्रमुख मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने अपना इस्तीफा राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को सौंप दिया है.

मायावती ने कहा, मैं शोषितों, मजदूरों, किसानों और खासकर दलितों के उत्‍पीड़न की बात सदन में रखना चाहती थी. सहारनपुर के शब्‍बीरपुर गांव में जो दलित उत्‍पीड़न हुआ है, मैं उसकी बात उठाना चाहती थी, लेकिन सत्ता पक्ष के सभी लोग एक साथ खड़े हो गए और मुझे बोलने का मौका नहीं दिया गया.

दर्जनों मामलो में आरोपी योगी और शिवराज के इस्तीफे की मांग तेज, लोग बोले सफाई का ठेका तेजस्वी ने ले रखा है क्या

बसपा प्रमुख ने कहा, मैं दलित समाज से आती हूं और जब मैं अपने समाज की बात नहीं रख सकती हूं, तो मेरे यहां होने का क्‍या लाभ है. राज्यसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि मायावती का इस्तीफा स्वीकार करने का निर्णय सभापति करेंगे. नियम के अनुसार त्यागपत्र संक्षिप्त होना चाहिए और इसमें कारणों का उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए.

इस बारे में जेएनयू के शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता जयंत जिज्ञासु  का लेख पढ़े जाने योग्य है-

लोकतंत्र के मसखरातंत्र में तब्दील होने की आहट- 

राज्यसभा में मायावती जी के बोलते वक़्त जिस तरह मंत्री हंगामा कर रहे थे, वो ठीक नहीं है। उपसभापति सदन का संचालन कुशलतापूर्वक अगर करते तो वो सीमित समय में भी अपनी बात रख सकती थीं, मगर इतनी टोकाटाकी व शोरशराबा हो रहा था कि महज़ खानापूर्ति के लिए वो नहीं बोलना चाहतीं थीं, अपनी बात पूरी करना चाहती थीं। पर, उन्हें बात नहीं रखने दी गई।

वो बार-बार कह रही थीं कि मुझे अपनी बात पूरी कर लेने दो। अंत में सभापति, मंत्री नक़वी की हुल्लड़बाज़ी और सत्ता पक्ष के सांसदों के रवैये से खिन्न होकर वो कहते हुए निकल गईं कि अगर मैं समाज के दु:ख-दर्द को यहाँ नहीं रख पा रही हूँ, उनके हितों की रक्षा नहीं कर पा रही, तो इस सदन में होने पर लानत है, इस राज्यसभा में रहने का मुझे कोई नैतिक अधिकार नहीं है, मैं इस्तीफ़ा देने जा रही हूँ।

इसे भी पढ़ें- सरकारी बैंको को खत्म करके बैंकिग सेक्टर की नौकरियों के साथ ही आरक्षण खत्म करेगी मोदी सरकार

सांसदों के कहने के बाद भी हुल्लड़बाजी शांत ना हुई- 

उपसभापति हामिद अंसारी के इस तरह के रवैये पर बीच में शरद यादव, सीताराम येचुरी, रामगोपाल यादव समेत कई सांसद उठकर कहते हुए दिखाई दिए कि भाई इतने गंभीर विषय पर बात रख रही हैं, आप टाइम दो इन्हें। मायावती जी ख़ुद सक्षम हैं, वो शरद जी को बैठने के लिए कहती हैं। जब वो निकल रही थी, तो खड़े होकर उन्हें रुकने के लिए दिग्विजय सिंह भी इशारा कर रहे थे।

जो हुआ है सदन में, वो ठीक नहीं हुआ है। जो संकेत मिल रहे हैं, वैसे में आने वाले दिनों में सदन में जो लोग अलग राय प्रकट करेंगे, उन्हें चिढ़ाया जाएगा, उन पर हंसा जाएगा, उन्हें बोलने से रोका जाएगा अभी पतन की सीमा तय नहीं।

ऊना कांड पर बोलने पर भी ऐसी ही प्रतिक्रिया रखी गई- 

पिछले सत्र में भी ऊना की घटना पर सदन में मायावती जी ने मुखर ढंग से बात रखने की कोशिश की, पर उनके आक्रोश पर जब फूहड़पन के साथ कुछ सांसद भावभंगिमा बनाते हैं, और उपसभापति रोक नहीं पाते, तो यह लोकतंत्र के निस्तेज होने की आहट है। आज की यह कचोटने वाली घटना देखकर बी.एन. मंडल द्वारा राज्यसभा में 1969 में दिया गया भाषण बरबस याद आ गया –

“जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जबतक शासन में रहेगा, तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी, वह देश को रसातल में पहुंचाएगा।

इसे भी पढ़ें- राष्टवाद एक कंपलीट पैकेज है जो समाज के मुद्दों की राजनीति न कर काल्पनिक प्रतीक खड़े करता है

हंगाने के बीच धारदार बहस की परंपरा दबा दी गई है- 

धारदार बहस की स्वस्थ परंपरा तो जैसे कहीं विलीन ही हो गई हो। क्या ये सच नहीं है कि लोहिया जब आंकड़ों के साथ बोलते थे, तो नेहरू तक असहज हो जाते थे और कई बार निरुत्तर भी। मधु लिमये सदन में जिसकी तरफ आंख उठा कर एक नज़र देख लेते थे, तो लोग सहम जाते थे कि पता नहीं किस पर कौन-सी गाज गिरेगी। इसी हिन्दुस्तान की संसद में एक-से-बढ़कर एक बहसबाज़ हुआ करते थे। आला दर्ज़े की बहसें दर्ज़ हैं इतिहास में। बी. एन. मंडल से लेकर भूपेश गुप्त, न जाने कितने सांसदों ने विमर्श की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ज़रिये इस मुल्क को गढ़ा। कभी उन नेताओं ने अपनी असहमति को तिक्तता या कटुता की शक्ल नहीं लेने दी।

मंडल कमीशन की बहस में रामविलास पासवान की भूमिका-  

मंडल कमीशन पर जो बहस अगस्त 1982 में हुई, उसमें रामविलास पासवान ने देश भर के सचिवों, अधिकारियों, आदि का जातिवार विवरण देते हुए बताया कि सकारात्मक कार्रवाई क्यों ज़रूरी है। इंदिरा गांधी की कैबिनेट में 18 में 9 ब्राह्मण थे। इस पर भी उन्होंने सभी सूबों के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों की जातीय पृष्ठभूमि की चर्चा की,  पर, विषय की गंभीरता को समझते हुए लोग पूरी संज़ीदगी सुनते रहे। किसी ने कोई हंगामा नहीं बरपाया। जब कभी उनके भाषण के दौरान किसी ने हल्की बात कहने की कोशिश की, स्पीकर ने तुरंत कहा कि बहुत अहम मुद्दे पर चर्चा हो रही है, सभी सहयोग करें, मज़ाक न बनाएं। ऐसा नहीं कि उस वक़्त लोग व्यवधान नहीं पैदा करते थे, पर शर्म का पानी तब बचा हुआ था।

इसे भी पढ़ें-जातिवादी असभ्य समाज का घिनौना सच, सीवर सफाई के दौरान एक साल में हुई 22327 लोगों की मौत

जब रामविलास पासवान भड़क गए थे- 

एक बार रामविलास पासवा बोलने के लिए खड़े हुए और बीच में ही संजय गांधी ने कुछ कहना शुरू कर दिया। बस, पासवान भड़क गए, और यहां तक कहा कि संजय गांधी जी, कहां फरियाना है, चांदनी चौक कि कनाट प्लेस, जगह तय कर लें, झंडा गाड़ के लड़ेंगे, किसी के रहमोकरम पर यहां नहीं हैं, जनता ने अपनी बात कहने के लिए चुनकर यहाँ भेजा है। रामविलास आपकी भभकी से नहीं डरता, गया वो ज़माना कि सभाओं में हम ज़लील होते थे और चूं तक नहीं कर पाते थे। बात इतनी बढ़ी कि ख़ुद इंदिरा जी ने आकर पासवान जी से कहा कि रामविलास जी आप अनुभवी सांसद हैं, संजय को संसदीय परंपरा सीखने में अभी वक़्त लगेगा। मैं खेद प्रकट करती हूँ।

सत्ता के लोगो को समझना चाहिए हम आखिरी आदमी नहीं हैं- 

एक बार चंद्रशेखर ने सदन में कहा था, जो आज सत्ता पक्ष के लोगों को भूलना नहीं चाहिए, “एक बात हम याद रखें कि हम इतिहास के आख़िरी आदमी नहीं हैं। हम असफल हो जायेंगे, यह देश असफल नहीं हो सकता। देश ज़िंदा रहेगा, इस देश को दुनिया की कोई ताक़त तबाह नहीं कर सकती। ये असीम शक्ति जनता की, हमारी शक्ति है, और उस शक्ति को हम जगा सकें, तो ये सदन अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा।”

इसे भी पढ़ें-आरक्षण खात्मे की ओर मोदी सरकार के बढ़ते कदम, अब प्राइवेट लोगों को आईएएस बनाएगी सरकार

चंद्रशेखर ने कहा कि संसद की गरिमा का पालन हो- 

जब अधिकांश लोग सेना बुला कर लालू प्रसाद को गिरफ़्तार करने पर ‘भ्रष्टाचार’ की ढाल बनाकर चुप्पी ओढ़े हुए थे उस समय चंद्रशेखर ने लालू प्रसाद मामले में जो कहा था, उसे आज याद किये जाने की ज़रूरत है –

“लालू प्रसाद ने जब ख़ुद ही कहा कि आत्मसमर्पण कर देंगे, तो 24 घंटे में ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटा जा रहा था कि सेना बुलाई गई ? ऐसा वातावरण बनाया गया मानों राष्ट्र का सारा काम बस इसी एक मुद्दे पर ठप पड़ा हुआ हो। लालू कोई देश छोड़कर नहीं जा रहे थे। मुझ पर आरोप लगे कि लालू को मैं संरक्षण दे रहा हूँ।

मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी दिलचस्पी किसी व्यक्ति विशेष में नहीं है, ऐसा करके मैं इस संसदीय संस्कृति की मर्यादा का संरक्षण कर रहा हूँ। जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कहकर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता। यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है।

इसे भी पढ़ें- दलितों को गुलाम बनाने का पैंतरा, शंकराचार्य ब्राह्मण ही होगा लेकिन दलितो को बनाएंगे नागा साधु

आज बहुत कम लोग नजर आते हैं जो संसदीय मर्यादा का पालन करें – 

आज गिरते मूल्यों के बीच बहुत कम लोग नज़र आते हैं जिन्हें संसदीय मर्यादा का अनुपालन करने की फ़िक्र है। चंद्रशेखर से लाख असहमति हो, पर वो संसद में डिग्निटी के साथ बहस करना और उसका हिस्सा होना जानते थे। इतनी नम्रता और प्रखरता से वो बात रखते थे कि अटल जी भी बुरा नहीं मानते थे, “अपने अंदर में विभेद हो और सारे देश को एकता का संदेश दिया जाय, यह बात कुछ सही नहीं दिखाई पड़ती।

लोकसभा अध्य़क्ष पार्टी लाइन पर चलते हैं- 

पहले ऐसा इसलिए भी संभव हो पाता था कि लोकसभा अध्यक्ष भी उसी निष्पक्षता से अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते थे। एक वाक़या याद आता है कि चंद्रशेखर सदन में पूरे प्रवाह में बोल रहे थे, इतने में एक सदस्य ने अनावश्यक टोकाटोकी की। बस क्या था, चंद्रशेखर अपने युवा-तुर्क वाले अंदाज़ में आ गये, मानीय सदस्य को एक नज़र देखा और डपटते हुए धीरे से बोले:

If you’re Speaker, then I shall address to you. Unfortunately, you aren’t, and I think country will not be that unfortunate that you’ll be a coming speaker. इतना कहकर चंद्रशेखर ने ठहाका लगा दिया, बस पूरे सदन में कहकहे… ये चंद्रशेखर की वाकपटुता और सर्वस्वीकार्यता थी।

इसे भी पढ़ें-महंत आदित्यनाथ के राज में शिक्षा पर पाखंड भारी, कांवड़ियों के खौप से बंद रहेंगे 5 दिन स्कूल

लोगो के प्रशस्ति गान से इतिहास नहीं लिखा जाता- 

मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि पीएम ने अपने आचरण से हमारे जैसे लोगों को निराश किया है। अख़बारों के पन्ने से से इतिहास नहीं लिखा जाता, लोगों के प्रशस्ति गान से इतिहास नहीं बनता। चंद्रशेखर बेअक़्ल लोगों की सलाह लेने से कभी -कभी हम ख़तरे में पड़ जाते हैं, प्रधानमंत्री जी। प्रलाप सामर्थ्य का द्योतक नहीं है । शायद इसीलिए मैं आपके विश्वास तोड़ने की इस कला का विरोध करता हूँ

कुल मिलाकर यह समय मसखरों के लगातार छाने और मंडराने की आहट के साथ हमारे सामने है, किसी रोज़ पूरा तंत्र ही कहीं मसखरा तंत्र में न तब्दील हो जाए, संकट इसी बात का है।

गोपाल दास नीरज ने ठीक ही कहा –

न तो पीने का सलीक़ा न पिलाने का शऊर
ऐसे ही लोग चले आए हैं मैख़ाने में।

 

Related posts

Share
Share