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मित्र अडानी को 500 करोड़ का फायदा पहुंचाने के लिए मोदी सरकार ने SEZ के नियम ही बदल डाले !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने काले धन का मुद्दा जोर-शोर से उठाते हुए कहा था कि केन्द्र की मनमोहन सरकार काला धन रखने वालों का नाम छुपा रही है। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी जब देश के प्रधानमंत्री बने तो वो अपनी ही की  बातों से पलट गए और स्विस बैंक में काला धन जमा करने वाले 600 लोगों के नाम सार्वजनिक करने से मोदी सरकार ने इंकार कर दिया।

इतना ही नहीं केंद्र में सरकार बनाने के तीन साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह दावा किया था कि तीन साल के कार्यकाल में उनकी सरकार पर अब तक कोई दाग नहीं लगा है लेकिन हकीकत इससे अलग है। मोदी सरकार गुपजुप तरीके से अपने सहयोगी उद्योगपतियों को लाभ पहुंचा रही है। आरोप  भी उस उद्योगपति अडाणी के ग्रुप से जुड़ा है जिसकी हवाई सेवा पर पीएम बनने से पहले मोदी चुनाव प्रचार के लिए घूमते थे।

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नई खबर के अनुसार सरकार विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के नियमों में बदलाव कर देश के प्रमुख आैद्योगिक आैर कारोबारी घरानों में शुमार अडाणी समूह की एक कंपनी को करीब 500 करोड़ रुपये का लाभ देने जा रही है। देश की बड़ी बिजनैस मैगजीन इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्लू ) में प्रकाशित खबर के मुताबिक सरकार ने सेज के नियमों में बदलाव के जरिए गुपचुप तरीके से अडाणी समूह की एक कंपनी को 500 करोड़ रुपए का फायदा पहुंचाया है।

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कैसे पहुंचाया फायदा ?

खबर के अनुसार, अगस्त, 2016 में वाणिज्य विभाग ने विशेष आर्थिक क्षेत्र के नियम (सेज नियमों), 2016 में संशोधन करते हुए उसमें एक नया प्रावधान जोड़ा था, जो सेज एक्ट, 2005 के तहत रिफंड के दावों से संबंधित था. सेज एक्ट के तहत किये गये इस संशोधन से पहले किसी तरह के रिफंड का कोई प्रावधान नहीं था. खबर के मुताबिक, यह संशोधन खासतौर पर अडानी पावर लिमिटेड (एपीएल) को लगभग 500 करोड़ रुपये के करीब की उत्पाद शुल्क के रिफंड का दावा करने का मौका देने के लिए किया गया था.

वो रिफंड दिया जा रहा है जिसका भुगतान अडाणी समूह ने किया ही नहीं- 

एपीएल का दावा है कि उसने कच्चा माल और अन्य कंज्यूमेबल्स (इनपुटों) पर यानी बिजली के उत्पादन के लिए मुख्यतः कोयले के आयात पर सीमा शुल्क चुकाया है, लेकिन ईपीडब्लू को मिले दस्तावेजों के मुताबिक दरअसल एपीएल ने मार्च 2015 के अंत में कच्चा माल और उपभोग की वस्तुओं पर बनने वाली करीब 1000 करोड़ रुपये के सीमा शुल्क का भुगतान ही नहीं किया है। पहली नजर में ऐसा लगता है कि सेज नियमों में संशोधन करके उसमें सीमा शुल्क का रिफंड मांगने का प्रावधान डालकर वाणिज्य विभाग एपीएल को एक ऐसी ड्यूटी पर रिफंड का दावा करने की इजाजत दे रहा है, जिसका भुगतान उसके द्वारा कभी किया ही नहीं गया.

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इंडोनेशिया से कोयला आयात में भी अडाणी का खेल- 

अडाणी पावर लिमिटेड इंडोनेशिया से कोयले का आयात करता है. कंपनी द्वारा (साथ ही दूसरी कंपनियों, जैसे, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजा पावर सप्लाई, एस्सार ग्रुप फर्म्स आदि कंपनियों के द्वारा भी) इंडोनेशिया से कोयले का आयात पिछले काफी समय से डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की जांच के दायरे में है. मार्च, 2016 में डीआरआई ने दावा किया था कि इंडोनेशिया से आयात किये जा रहे कोयले की ओवर इनवॉयसिंग (बढ़ाकर बिल बनाना) की जा रही है, ताकि देश का पैसा देश के बाहर भेजा जा सके.

खबर के अनुसार, इससे एपीएल समेत दूसरी बिजली उत्पादक कंपनियां आयातित कोयले की नकली तरीके से बढ़ायी गयी कीमत के आधार पर सरकार से बिजली के टैरिफ पर ज्यादा मुआवजा ले रही हैं. इसके साथ ही, अडानी और एस्सार समूह की कंपनियों पर आयात किये गये बिजली संयंत्र के उपकरणों की ओवर इनवॉयसिंग करने का भी आरोप है. ये जानकारियां पहली बार पिछले साल ईपीडब्लू में अप्रैल और मई में छपी थीं. ड्यूटियों (करों) की सुनियोजित चोरी का यह उदाहरण एक कदम और आगे की चीज है. यह एक ऐसी ड्यूटी के रिफंड की मांग से संबंधित है, जो वास्तव में चुकायी ही नहीं गयी है.

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इससे पहले बीजेपी के करीबी जी न्यूज के मालिक चंद्रा पर लगे थे आरोप- 

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने चार निजी कंपनियों और मिजोरम सरकार के अधिकारियों को 2012-2015 के दौरान राज्य द्वारा चलाई जाने वाली लॉटरियों में हुई भीषण धांधलियों के लिए दोषी ठहराया था।

इन चार कंपनियों में से एक के तार बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा सांसद बने जी न्यूज के मालिक सुभाषचंद्रा के नेतृत्व वाले एस्सेल समूह से काफ़ी नज़दीक से जुड़े हुए हैं, जिसके सबसे बड़े शेयरहोल्डरों में सुभाष चंद्रा के बेटे और भाई शामिल हैं.

इन कथित धांधलियों में ज्यादा गंभीर आरोप करीब 11,808 करोड़ की राशि राज्य के खज़ाने में जमा नहीं कराने का है, जो उसमें जमा कराई जानी थी. साथ ही एक और गंभीर आरोप यह भी है कि इस पूरे खेल में राजस्व बंटवारे के एक गलत मॉडल का इस्तेमाल किया गया. सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक इन दोनों फैसलों से राज्य सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हुआ और डिस्ट्रीब्यूटरों ने चांदी काटी.

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