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उच्च शिक्षा में दलितों-पिछड़ों को रोकने के लिए कदम -कदम पर मोदी सरकार कर रही साजिश

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

उच्च शिक्षा में दलितों-पिछड़ों को दाखिला लेने से रोकने के लिए मोदी सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। ताकि यूनिवर्सिटी के खुले माहौल में दलित, पिछड़े औदिवासी औऱ गरीब घर के छात्र नए विचारों से लेस न हो पाऐं। ताकि वंचित प्रष्ठभूमि के छात्र सरकारों से अपनी हिस्सेदारी न मांग सके। उच्च शिक्षा को लेकर मोदी सरकार की नीतियों को लेकर गुजरात सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र राघवेंद्र यादव लम्बे समय से काम कर रहे हैं और मोदी सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियों को लेकर जन-जागरुकता फैला रहे हैं। इसी क्रम में उनका एक महत्वपूर्ण लेख मोदी सरकार की नीतियाों के कारण उच्च शिक्षा से वंचित दलित पिछड़े छात्रों को केन्द्रित है..इसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए>

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मोदी सरकार ने नियमों में संशोधन करके ऐसे नियम बनाए जिससे ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थी यूनिवर्सिटी में शिक्षा हासिल न कर सकें।

उच्च शिक्षा में सुधार के लिए समय-2 पर सरकारी प्रयास किये गये है। एमफिल/पीएचडी की दिशा और दशा सुधारने के लिए एक ऐसा ही प्रयास 2009 में उच्च शिक्षण संस्थानों को गाइड करने के लिए बनाया गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के द्वारा “एमफिल/पीएचडी उपाधि प्रदान करने हेतु न्यूनतम मानदंड और प्रक्रिया” विनियम 2009 बना कर किया गया। इसके बाद विनियम 2009 के प्रतिस्थापन के रूप में विनियम 2016 लाया गया। जो उसका सुधारात्मक रूप था। 2016 का अधिसूचना, कुछ मामलों में पारदर्शिता लाने का एक अच्छा प्रयास था। इसके ज्यादातर क्लॉज और सब-क्लॉज सही थे। जिसे लाग किया गया तो भारतीय शिक्षण संस्थानों में हो रहे शोध की दिशा और दशा में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। लेकिन इस अधिसूचना के कई नियम बहुत ही विवादास्पद रहे है। इसके कुछ क्लॉज और सब-क्लॉज पर देश के एक बड़े तबके की असहमति थी। जिससे वे इसे इसी रूप में लागू करना नहीं चाहते थे क्योंकि इस अधिसूचना का रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के छात्रों पर इसका ऋणात्मक असर पड़ेगा।

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मोदी सरकार को रास नहीं आ रहा मनमोहन सरकार के समय बना नियम

अब यूजीसी ने एक सराहनीय कदम उठाते हुए अधिसूचना 2016 के फर्स्ट अमेंडमेंट करने का प्रस्ताव दिया है। इससे यह स्पष्ट है कि पूर्ववर्ती राजपत्र सरकार को पूरी तरह से रास नहीं आ रहा था इस लिए वे अमेंडमेंट कर रहे है। भारत के राजपत्र, भाग-3, खंड-4, जो 5 मई 2016 को प्रकाशित हुआ, में जिन नियमों से ज्यादातर लोग असहमत थे; हम उन नियमों की समस्याओं, प्रभावों और सुझावों पर संक्षिप्त में चर्चा करेंगे।

अपने ही बनाए नियमों का उल्लघंन कर रही यूजीसी

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 5 मई 2016 के प्रकाशित राजपत्र के धारा 5 के उप-धारा 5.4 के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थान एमफिल/पीएचडी में अभियर्थियों को द्वि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से दाखिला देंगे। लेकिन यह आयोग अपने उसी राजपत्र में त्रि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से एमफिल/पीएचडी में दाखिला देने का अनम्य कानून बनाया है। पहला प्रतिमान अर्थात पहला चरण परास्नातक में 55-50%। दूसरा प्रतिमान लिखित परीक्षा और तीसरा प्रतिमान इंटरव्यू। इस तरह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा बनाये गये कानून में स्वविरोधाभास है और यूजीसी अपने ही वक्तव्य का खंडन कर रही है। मतलब वह कह कुछ रही है और कर कुछ रही है। एमफिल/पीएचडी में एडमिशन के लिए सिर्फ दो प्रतिमान ही होने चाहिए। पहला प्रतिमान लिखित परीक्षा और दूसरा प्रतिमान इंटरव्यू। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को पहले प्रतिमान अर्थात परास्नातक में 55% का मापदंड को तत्काल प्रभाव से समाप्त करना चाहिए क्योंकि शोध कार्य के लिए ऐसे प्रतिमान की कोई प्रासंगिकता नहीं है।

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देशी – विदेशी छात्रों के लिए अलग-अलग मापदंड क्यों

5 मई 2016 को प्रकाशित अधिसूचना के धारा 2 और 3 के उप-धारा 2.1, 2.2 और 3.1, 3.2 के तहत एमफिल/पीएचडी में दाख़िला लेने के लिए स्नातकोत्तर उपाधि या उसके समतुल्य में कम से कम 55% अंक या इसके समकक्ष ग्रेड प्राप्त हो। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग (गैर लाभान्वित श्रेणी) को 5% की छूट या ग्रेड में समतुल्य छूट प्रदान की जाएगी। यूजीसी द्वारा बनाया गया यह प्रतिमान भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए है।

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भारत के बाहर अर्थात विदेश में पढ़ने वाले भारतीयों के लिए अलग प्रतिमान है। उनके लिए, विदेशी शैक्षणिक संस्थान से स्नातकोत्तर उपाधि या उसके समतुल्य की उपाधि प्राप्त की हो जो ऐसे किसी सांविधिक प्राधिकरण द्वारा या ऐसे एक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है, जो कि उस देश में किसी कानून के अंतर्गत स्थापित अथवा निगमित हो। अब सवाल यह है कि कोई छात्र भारत के टॉप शैक्षणिक संस्थान में पढ़ता हो जो गुणवत्ता एवं मानकों को सुनिश्चित करने एवं उनके आकलन, प्रत्यायन हेतू सांविधिक प्राधिकरण के अंतर्गत स्वीकृत एवं प्रत्यायित है। जो कि भारत के कानून के अंतर्गत स्थापित एवं निगमित है।

उसके लिए परास्नातक में 55% का बैरियर और विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के लिए सिर्फ स्नातकोत्तर या उसके समतुल्य की उपाधि। उनके लिए कोई पर्सेंटेज बैरियर नहीं। आख़िर ऐसा दोहरा मापदंड क्यों है? क्योंकि विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्र इलीट क्लास के होते है। ये बड़े-बड़े नेता, आढ़तिया नौकरशाह, बड़े-बड़े बिजनेसमैन या लाख में हर महीने तनख्वाह उठाने वाले प्रोफ़ेसर्स के बेटे-बेटियाँ होते/होती है। इसलिए उनको परास्नातक के प्रतिशतता में छूट मिलती है और भारत में पढ़ने वाले छात्रों के लिए प्रतिशतता का बैरियर इस लिए लगाया जाता है ताकि वंचित तपका और रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों को शोध में दाख़िला लेने से रोका जा सके। एक कोर्स में दाख़िला के लिए ये दोहरा मापदंड न्याय संगत नहीं है।

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सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर चयन से दलितों पिछड़ों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव की संभावना बढ़ेगी

ऐसे दोहरे प्रतिमान अलोकतांत्रिक, पक्षपातीय और अनौचित्यपूर्ण था। यह नियम पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों को अप्रत्यक्ष रूप से उच्तम शिक्षा से वंचित करने का एक शातिर प्रयास सिद्ध हो रहा था। इसलिए इसका पुरजोर विरोध हुआ था। अगर रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के छात्र शोध कार्य से वंचित रहे तो सामाजिक न्याय की आधारशिला एक अपूर्ण स्वप्न बन कर रह जाएगी। सरकार के कानून निर्माताओं को चाहिए कि वे भारत में पढ़ने वाले छात्रों को भी परास्नातक या समकक्ष की उपाधि प्राप्त करना ही एमफिल/पीएचडी की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करें।
5 मई 2016 के अधिसूचना के धारा 5 के उप-धारा 5.4.1 में कहा गया है कि प्रवेश परीक्षा (लिखित) अर्हक होगी जिसे उत्तीर्ण करने के लिए 50% अंक लाना अनिवार्य है। प्रवेश परीक्षा अर्हक होने का मतलब है कि एमफिल/पीएचडी में दाखिला सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर होगा।

यह नियम एक मनमाना नियम था। जो प्रवेश प्रक्रिया में पक्षपात व भेदभाव को बढ़ावा देने को न्योता दे रहा है। अगर यह नियम लागु रहा तो इससे, सबसे ज्यादा नुकसान रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के संस्थान में पढ़े छात्रों का होगा और साथ ही साथ यह नियम लागु करने पर पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए कोई मजबूत आधार नहीं बचेगा।

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उच्चतम न्यायालय ने भी माना कि इंटरव्यू में जातीय के आधार पर भेदभाव होता है

लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के सन्दर्भ में माननीय उच्चतम न्यायलय ने अजय हासिया बनाम खालिद मुजीब 1980 के मामला में कहा कि, इंटरव्यू के लिए 15% से ज्यादा अंक दिया जाना मनमाना और अतार्किक है। हमारे देश में जाति एक अकाट्य सच्चाई है। शिक्षण संस्थानों में जातिगत शोषण होता है और उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत शोषण का एक लम्बा इतिहास है। इस बात को न्यायालयों और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा गठित विभिन्न कमेटियों ने भी स्वीकार किया है। अगर एमफिल/पीएचडी में दाखिला के लिए इंटरव्यू को पूरा वेटेज दिया जायेगा तो जातिगत शोषण होने के अवसर बढ़ जायेंगे। इसलिए एमफिल/पीएचडी में दाखिला के लिए (लिखित+इंटरव्यू) को 85%+15%के अनुपात में रखा जाय जिससे इस नियम से ग्रामीण पृष्भूमि के संस्थानों के छात्रों को होने वाले नुकशान से बचाया जा सके और साथ ही साथ भाई-भतीजावाद और चमचा कल्चर को भी रोका जा सकेगा। इससे वंचित तबके का हो रहे जातिगत शोषण के अवसर भी बेहद कम हो जायेगा।

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थर्ड कैटेगिरी की यूनिवर्सियों में दाखिले के लिए नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने की बाध्यता क्यों

सरकार, केटेगरी III में आने वाली सभी यूनिवर्सिटीज में नेट/सेट/स्लेट एमफिल/पीएचडी में दाखिला लेने के लिए अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है। ज्ञात हो कि नेट/सेट/स्लेट शिक्षक होने के लिए बुनियादी योग्यता है। इसे किसी भी तरह के संस्थान में एमफिल/पीएचडी में दाखिला लेने के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। देश के सभी शैक्षणिक संस्थाओ (जो सरकार द्वारा स्थापित, अनुरक्षित अथवा सहायता प्रदत्त है) में रिमोट (सुदूरवर्ती) और शैक्षणिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के संस्थान से पढ़े हुए सभी छात्रों-छात्राओं (चाहे वे किसी भी केटेगरी के हो) को प्रवेश में डेप्रिवेशन पॉइंट के तहत प्रवेश लेने में कुछ अंक की छूट दी जानी चाहिये।

जैसा कि यह सर्वविदित है कि आजाद भारत सातवें दशक के उत्तरार्ध में है लेकिन हैरत की बात है कि आज तक हमारा संविधान पूरी तरह से जमीनी स्तर पर इम्प्लीमेंट नहीं हो पाया है। अगर भारत के “शैक्षणिक संस्थान ” (वे चाहे यूनिवर्सिटी हो या नेशनल इंट्रेस्ट के इंस्टिट्यूशन) की बात की जाय तो वहाँ भी कुछ ऐसे संस्थान आज भी मिलेंगे जहाँ पर भारत सरकार की रिजर्वेशन या रिलैक्सेशन पालिसी पूरी तरह से इम्प्लीमेंट नहीं हो पायी है। इसलिए, उच्च शैक्षणिक संस्थानों के सरकारिया-साहबजादों को इसपर विशेष ध्यान देना चाहिए और भारत के संविधान की आत्मा का सम्मान करते हुए, देश के सभी शैक्षणिक संस्थाओ (जो सरकार द्वारा स्थापित, अनुरक्षित अथवा सहायता प्रदत्त है) में रिजर्वेशन लागू करवाना सुनिश्चित करें। शैक्षणिक संस्थानों में हो रहे छात्रों और छात्राओं के शोषण के लिए विशेष सुनवाई केंद्र बनाया जाय जो अतिशीघ्र सुनवाई करे और न्यायोचित निर्णय ले तथा इसकी जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाय।

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