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सोशल मीडिया को हथियार बनाकर सत्ता में आई मोदी-शाह जोड़ी, आज उसको गाली क्यों दे रही है?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

राजनीति अजीब होती है और राजनेता तो उससे भी ज्यादा अजीब। दरअसल राजनीति एक बिजनेस की तरह है। जैसे बिजनेसमैन कोई भी बात अपने नफे-नुकसान के आधार पर तय करता है ठीक उसी तरह स्वार्थी राजनेता भी अपने नफा नुकसान को ध्यान में रखते हुए राजनीति का एक-एक कदम रखते हैं।

ऐसे ही नफे-नुकसान का खेल गुजरात में खेला जा रहा है क्योंकि गुजरात में एक बार फिर वोट लेने की बारी आ गई है, गुजरात में इसी साल नवंबर में चुनाव होने हैं, अब गुजरात में ऊना कांड को दबाए जाने की जरूरत आन पड़ी है। अब साहेब को सोशल मीडिया से एलर्जी होने लगी है। क्या आप जानते हैं की इसकी असली वजह क्या है?

इसकी असली वजह है कि सोशल मीडिया जन मीडिया बन चुका है, ये आज समाज का माध्यम है, लोगों की आवाज है। हुक्मरानों को लोगों के इसी बोलने से बड़ी तकलीफ है। शासकों के मन की हकीकत यही होती है कि जनता ना बोले। सिर्फ खेले…सिर्फ झेले।

अब सोशल मीडिया से इतनी परेशानी क्यों?

कितनी हैरत की बात है वह राजनेता जो इसी सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे देश में अपनी बात पहुंचाने की वकालत किया करते थे, वह राजनेता जिसकी पार्टी में देश की सबसे बड़ा IT सेल स्थापित है, वह पार्टी जिसके संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापन में जाता है, वह पार्टी जिसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पूरे चुनाव के दौरान सोशल मीडिया को युवाओं से जुड़ने का माध्यम बताया करते थे।

आज उन्हें सोशल मीडिया में दिखाई जा रही है सच्चाई से समस्या होने लगी है।  क्योंकि सोशल मीडिया ही वो माध्यम है जो दवाब मुक्त होकर उनकी पोल खोल रहा है। हाल ही में अमित शाह ने गुजरात में कहा कि युवाओं को सोशल मीडिया पर बीजेपी विरोधी बातों एवं प्रचार प्रसार पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शाहर कहते हैं कि इस तरह के प्रचार-प्रसार के पीछे कांग्रेस का हाथ है।

हैरत की बात देखिए जब इसी सोशल मीडियो पर सैकड़ों लोगो की टीम बैठाकर बीजेपी झूठे मुद्दे जनता के बीच प्लांट करा रही थी। मीडिया भी इसी जुमले बाजी को देश परिवर्तन की भविष्यवाणी बता रहा था। तब आपको कांग्रेस क्यों दिखाई नहीं दी जो आज दिखाई दे रही है। आखिर क्यों अमित शाह जी?

सोशल मीडिया हमारे ‘मन की बात’ का अड्डा है- 

हम पहले ही कह चुके हैं कि शासक यही चाहता है कि उसे सिर्फ सुनने वाली भीड़ मिले बोलने वाली नहीं। अब मोदी जी को ही देख लीजिए। साहब सिर्फ ‘मन की बात’ करते हैं, केवल अपने मन की बात। क्या मन की बात करने का अधिकार केवल प्रधानमंत्री के पास है?

हमें आपके मन की बात से कोई समस्या नहीं है लेकिन आपको और  आपके सेनापति को हमारे मन की बात से समस्या क्यों है? क्या इसलिए कि हम सवाल करते हैं? साहब इस देश का भिखारी भी भीख मांगने वाले कटोरे पर टैक्स देता है। फिर हम सवाल क्यों न करें ?

साहब जी, आप में सवाल करने से नहीं रोक सकते हैं। आपको इस बात पर विचार करना चाहिए कि आखिर वह कौन सा गुजरात विकास मॉडल है जिससे जनता लाचार होकर आपके विरुद्ध अभियान चलाई हुई है।

मतलबपरस्त राजनीति ने राजनीति का स्तर गिरा दिया है-

राजनीति का स्तर दिनो दिन गिरता जा रहा है। चुनाव कोई भी पार्टी जीते बहुमत किसी भी दल का हो। साम-दाम-दंड-भेद करके किसी भी मुख्यमंत्री को हैक किया जा सकता है। मुख्यमंत्री भी इतने मतलबपरस्त होते हैं कि तुरंत उस सियासत के पाले में जाकर खीर पनीर खाने लगते हैं।

स्वार्थी राजनेताओं ने राजनीति का स्तर एक दम से गिरा दिया है। वह पार्टियां जो चुनाव के समय लड़कियों की सुरक्षा, साइकिल, लैपटॉप देने की वकालत किया करते हैं वही अनेकों नेतागण महिलाओं के साथ बलात्कार एवं छेड़खानी जैसे घटनाओं पर महिलाओं को दोषी करार देते हुए उनके रहन सहन एवं कम कपड़े पहनने के अधिकार पर सवाल उठाते हैं।

आखिर जनता राजनीति की इस बिज़नेस को कब समझ पाएगी? आखिर नेतागण जनता के दर्द को, जनता के सवाल को कब तक नजरअंदाज करेंगे?

– सूरज कुमार बौद्ध ( लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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