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तो क्या नोटबंदी के बेतुके फैसले से बर्बाद हुईं मंडियों का दुष्परिणाम है किसान आंदोलन

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

मोदी सरकार ने नोटबंदी का निर्णय लेने के समय तमाम बड़ी-बड़ी बातें की थी. लेकिन धीरे-धीरे सरकार के निर्णयों से ही ये स्पष्ट होने लगा कि सरकार ने जल्दबादी में फैसला ले लिया है. अब इस फैसले के दुष्परिणाम या यूं कहें कि गंभीर परिणाम लोगों के सामने आ रहे हैं. ऐसा ही एक दुष्परिणाम है किसानों का आंदोलन. महाराष्ट्र के बाद अब मध्यप्रदेश के किसान आंदोलित हैं लेकिन साहब हैं कि अपने फैसले को गलत मानने को तैयार नहीं.जब भी देश में कोई बड़ी घटना होती है पीएम साहब चुपचाप विदेश निकल जाते हैं.

खैर आप वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र पीएस का ये लेख पढ़िए आपको स्पष्ट होगा कि नोटबंदी और किसानों के आंदोलन में क्या संबंध हैं-

उग्र हुए किसान और 6 मर गए, या उग्र हुई सरकार और किसानों की जान पर बन आई ?

तमिलनाडु के किसानों को सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनी पेशाब तक पीनी पड़ी. तेलंगाना के किसानों ने मिर्च के दाम एक चौथाई रह जाने के कारण अपनी फसल फूंकी और कुछ वाहन व दुकानें फूंक दी. मध्य प्रदेश में 15 दिन से आंदोलन चल रहा था. जब 6 किसानों की हत्या कर दी गई तब देश का ध्यान उधर गया.

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किसान आंदोलन और मीडिया का चरित्र- 

कोल्हापुर बेल्ट सहित महाराष्ट्र के किसान ताला जड़ो आंदोलन चला रहे हैं और विभिन्न कार्यालयों, नेताओं के घरों में ताला बंद कर रहे हैं।
बीजेपी सरकार को इन सबमें नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की साजिश नजर आती है। जब 6 किसानों की हत्या हो जाती है तो लिखा जाता है कि किसान आंदोलन उग्र हुआ, 6 किसानों की मौत। किसान उग्र होकर मर जाते हैं।

किसान अपनी बात शांतिपूर्वक करते हैं तो कोई सुनने वाला नहीं है और जब तोड़फोड़ करते हैं तो टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में उन्हें Rioters लिखा जाता है।

मिंट अखबार के मुताबिक मध्य प्रदेश के बीजेपी प्रवक्ता हितेश वाजपेयी ने कहा कि इस आंदोलन के पीछे कांग्रेस है और वह इस आंदोलन को पाटीदार बनाम बीजेपी बनाना चाहती है। यानी आंदोलन किसान नहीं कर रहे , कांग्रेस वाले बीजेपी के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

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ई कॉमर्स को न आढ़तिया समझ रहा है ना किसान- 

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात सहित देश के ज्यादातर इलाकों में किसान तबाह हैं और उनको फसल की लागत का आधा दाम मिल रहा है। इसमें नरेंद्र मोदी को विपक्ष की साजिश लग रही है। बड़ी मंडियों में ई कॉमर्स की व्यवस्था की गई है। जिसे न आढ़तिया जानते हैं न किसान। माल खरीदने के लिए आढ़तियों के पास पैसे नहीं हैं । किसान कर्ज लेकर खेत में उत्पाद उपजाकर फंस चुका है। या तो वह लागत के आधे दाम पर बेचकर बर्बाद हो जाए और बैंक उसके घर उधारी की डुगडुगी बजाकर दिवालिया घोषित कर दे, या वह विरोध प्रदर्शन करे। किसान के पास कोई चारा नहीं है।

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जब मंडियां बर्बाद हो रही थीं उसी समय नोटबंदी कर दी गई- 

इतना बड़ा मध्य प्रदेश है। शिवराज चौहान ने 48 केंद्र खोले हैं जहां 8 रुपये किलो के भाव प्याज खरीदा जा रहा है। अब उनको याद आया है कि मूल्य स्थिरीकरण फंड 1000 करोड़ रुपये का बनाया जाए। उड़द और मूंग, अरहर की खरीद के लिए केंद्र बनाने का वादा भी किया है सरकार ने। जब मंडिया बर्बाद की जा रही थीं और नोटबन्दी करके आढ़तियों को नकद खरीद में अक्षम बना दिया गया तब एक बार भी ख्याल में नहीं आया कि इससे देश के किसान तबाह हो जाएंगे.

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शायद इसमें भी इन्हें कांग्रेस या पाकिस्तान की साजिश लग रही होगी, जिसने नोटबन्दी करा दी और बगैर किसी उचित व्यवस्था के ई मंडी किसानों के सर पटक दिया। अमर उजाला अखबार के मुताबिक मोदी सरकार की चिंता बढ़ गई है । सरकार को डर है कि कहीं पाटीदारों के मारे जाने का असर गुजरात पर न पड़े और 1000 दंगा विरोधी पुलिस जवान मंदसौर भेज दिए हैं।

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