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गूंगी-बहरी सरकार तक बात पहुंचाने के लिए न्यायिक सेवा के प्रतियोगी छात्रों ने लिखे खून से खत

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

क्या अपने किए हर वादे से मुकर जाना ही राजनीति है ? क्या विचारधारा को भाषणों तक सीमित रखना ही राजनीति है ? ये सवाल आज देश का हर वो नौजवान पूछ रहा है जो रोजगार देने की बातों में आकर बीजेपी को वोट दे बैठा।

यही सवाल इलाहाबाद में लगातार 21 वें दिन अनशन पर बैठे न्यायिक सेवा समानता संघर्ष मोर्चा के प्रतियोगी छात्र-छात्राएं कर रहे हैं। छात्र-छात्राओं का सवाल है मोदी-योगी सरकार से क्या हिन्दी-हिन्दु-हिन्दुस्तान की बात करना सिर्फ एक जुमला है।

न्यायिक सेवा के प्रतियोगी छात्र-छात्राएं 12 जनवरी 2018 से इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में स्थित भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने बैठकर अपने भविष्य को अंग्रेजियत के पैरों तले रौंदने से रोकने के लिए अनशन करने पर मजबूर हैं।

कई महीनों से चल रहा है आंदोलन- 

न्यायिक सेवा समानता संघर्ष मोर्चा के बैनर तले तकरीबन दो महीने से लगातार संघर्ष छात्र-छात्राएं संघर्ष कर रहे हैं। बीते 26 जनवरी को अपनी मांगों के समर्थन में प्रतियोगी छात्रों ने क्रमिक अनशन स्थल डॉ. भीमराव अंबेडकर कि प्रतिमा से शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क तक तिरंगा मार्च निकालकर गणतंत्र दिवस पर सरकार को झकझोरा था।

अभी तक प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, दोनों उप मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ,नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना, विधि मंत्री बृजेश पाठक, विधि राज्यमंत्री नीलकंठ तिवारी समेत स्थानीय प्रशासन के सभी अधिकारियों को ज्ञापन दिया जा चुका है।

खून से लिखे खत- 

गूंगी-बहरी सरकार के कानों तक जूं ना रेंगती देख न्यायिक सेवा समानता संघर्ष मोर्चा के संयोजक रामकरन निर्मल, आशीष पटेल तथा अन्य साथियों दिनेश चौहान, सुशील चौधरी, गजेंद्र सिंह यादव ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री, राज्यपाल  मुख्यमंत्री को भेजा जिससे निम्न वर्गीय और मध्यम वर्गीय तथा किसानों के बच्चे भी न्यायपालिका का अंग बन सके।

अंग्रेजी को इतनी अहमियत क्यों ?

अभ्यर्थियों का आरोप है कि उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) की परीक्षा में भाषा का एक प्रश्न पत्र होता है जिसमें सिर्फ अंग्रेजी भाषा का एक पेपर 200 नंबर का आता है। लेकिन अन्य राज्यों में भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा का भी एक प्रश्न पत्र होता है।

लेकिन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग सिर्फ अंग्रेजी भाषा को ही स्थान देता है और हिन्दी भाषा की अनदेखी करता है। जिसमें अंग्रेजी माध्यम वाले अभ्यर्थी बाजी मार ले जाते हैं। जबकि होनहार हिंदी भाषी अभ्यर्थी विधि विषय में ज्यादा अंक लाने के बावजूद अंग्रेजी कमजोर होने की वजह से अन्तिम चयन में पीछे रह जाते हैं।

आंदोलन कर रहे प्रतियोगी छात्र आशीष पटेल का कहना है कि एक तरफ हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा बनाने के लिए विदेश मंत्री अन्य देशों का समर्थन जुटा रही हैं। दूसरी तरफ अपने ही देश में हिन्दी भाषियों के साथ भेदभाव हो रहा है.

भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के पेपर की वजह से हिंदी भाषी छात्रों को ज्यादा से ज्यादा 200 में से 15, 20, 25, 30 तक नंबर ही मिल पाते हैं।वहीं अंग्रेजी भाषी अभ्यर्थियों को 100-150 से ऊपर तक नंबर मिल जाते हैं। इसकी वजह से हिंदी भाषी अभ्यर्थी लॉ में ज्यादा नंबर लाने के बावजूद अंग्रेजी में पिछड़ जाता है।

प्रमुख मांगे- 

1. भाषा के प्रश्न पत्र में हिन्दी को शामिल किया जाय।

2. चार अवसर की बाध्यता को समाप्त किया जाय।

3. नियमित वैकेंसी निकाली जाय।

4. भाषा के आधार पर भेदभाव बन्द हो

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