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न्यायिक सेवा में हिन्दी माध्यम के प्रतियोगियों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ सड़क पर उतरे छात्र

नई दिल्ली/इलाहाबाद, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

सरकारें कितना भी हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान का नारा बुलंद करें। दिखावे के लिए विभिन्न सरकारी संस्थानों में हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस मनाए लेकिन हिन्दी भाषा को कमतर आंककर अंग्रेजियत को बढ़ावा देने की मानसिकता बदलने का नाम नहीं ले रही।

कोर्ट के निर्णय अंग्रेजी में आने पर कई बार सवाल उठ चुके हैं, क्योंकि आज भी देश में एक बड़ी जनसंख्या ऐसे लोगों की है जो अंग्रेजी नहीं समझते। ऐसे में वकील अपने हिसाब से जो व्याख्या कर देते हैं वही माननी होती है।

अब उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज जूनियर डिवीजन की प्रतियोगी परीक्षा में हिन्दी माध्यम के छात्रों के साथ हो रहे भेदभाव और अवसर की बाध्यता को समाप्त करने के लिए प्रतियोगी छात्र-छात्राओं ने न्यायिक सेवा समानता छात्र मोर्चा के बैनर तले आंदोलन छेड़ दिया है।

अंग्रेजी को इतनी अहमियत क्यों ?

अभ्यर्थियों का आरोप है कि उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) की परीक्षा में भाषा का एक प्रश्न पत्र होता है जिसमें सिर्फ अंग्रेजी भाषा का एक पेपर 200 नंबर का आता है। लेकिन अन्य राज्यों में भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा का भी एक प्रश्न पत्र होता है।

लेकिन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग सिर्फ अंग्रेजी भाषा को ही स्थान देता है और हिन्दी भाषा की अनदेखी करता है। जिसमें अंग्रेजी माध्यम वाले अभ्यर्थी बाजी मार ले जाते हैं। जबकि होनहार हिंदी भाषी अभ्यर्थी विधि विषय में ज्यादा अंक लाने के बावजूद अंग्रेजी कमजोर होने की वजह से अन्तिम चयन में पीछे रह जाते हैं।

आंदोलन कर रहे प्रतियोगी छात्र आशीष पटेल का कहना है कि भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के पेपर की वजह से हिंदी भाषी छात्रों को ज्यादा से ज्यादा 200 में से 15, 20, 25, 30 तक नंबर ही मिल पाते हैं।

वहीं अंग्रेजी भाषी अभ्यर्थियों को 100- 150 से ऊपर तक नंबर मिल जाते हैं। इसकी वजह से हिंदी भाषी अभ्यर्थी लॉ में ज्यादा नंबर लाने के बावजूद अंग्रेजी में पिछड़ जाता है।

लॉ के शोध छात्र रामकरन निर्मल कहते हैं कि हिंदी की लेखिका व कवयित्री महादेवी वर्मा ने भी यह कहा है कि जिस राष्ट्र की राष्ट्रभाषा जितनी मजबूत होगी वह राष्ट्र उतनी ही तरक्की करेगा। जिसका प्रमाण हम कई विकसित राष्ट्रों में देख सकते हैं।

चीन, जापान सहित अन्य देश में कार्य करने की भाषा और बोली उनकी राष्ट्रभाषा ही है। लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद भी हम अंग्रेजी के बोझ को अपने सर से नहीं उतार पाए हैं।

अभ्यर्थियों की मांग है कि भाषा के प्रश्न पत्र मेंअंग्रेजी के साथ एक पेपर हिंदी भाषा का भी होना चाहिए जैसे अन्य राज्यों में है (असम, गुजरात आदि) जिससे सभी को बराबर से मौका मिल सके।

कई शहरों में हो चुके हैं प्रदर्शन- 

उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज परीक्षा में हो रहे भेदभाव के खिलाफ इलाहाबाद , वाराणसी, लखनऊ, गोरखपुर , दिल्ली, और प्रदेश के अन्य शहरों में रह रहे प्रतियोगी छात्रों ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के खिलाफ हल्ला बोल दिया है।

अभ्यर्थियों की तरफ से आवाज उठाने वाले संगठन “न्यायिक सेवा समानता संघर्ष मोर्चा”की अगुवाई कर रहे राम करन निर्मल, अशीष पटेल, सुशील चौधरी, रजनी मधेशिया, देवेन्द्र माथुर, गजेन्द्र सिंह यादव, जीतेन्द्र  सरोज के आह्वान पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी 7 दिसम्बर को इलाहाबाद के चंद्र शेखर आजाद पार्क में इकट्ठे हुए थे।

जिसमें प्रदेश के समस्त प्रतियोगी छात्र एकजुट हुए और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग इलाहाबाद  को 6 घण्टे तक घेरकर रखा तब आयोग के सचिव को मजबूर होकर छात्रों के बीच आना पड़ा और मांगों का ज्ञापन लिया।

उसके बाद न्यायिक सेवा के प्रतिनिधि मंडल ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री को मिलकर ज्ञापन दिया और जनता दरबार में जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विशेष कार्य अधिकारी को अपनी मांगों से अवगत कराया। इसके साथ ही लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह यादव से मुलाकात कर अपनी मांग रखी।

विभिन्न विश्वविद्यालयों से समर्थन जुटा रहे है छात्र- 

मोर्चा का प्रतिनिधि मंडल प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रो को इस आन्दोलन से जोड़ रहे हैं इस कड़ी में प्रतिनिधि मंडल बीएचयू, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रतियोगी छात्रों के साथ मीटिंग कर चुका है।

जल्द ही गोरखपुर विश्वविद्यालय , राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, बरेली ला कालेज के छात्रों के साथ मीटिंग कर आन्दोलन से जोड़ेंगे ताकि 13 मई 2018 को होने वाली परीक्षा इसी हिसाब से हो सके।

छात्रों का कहना है कि अगर हमारी मांगे ना मानी गईं तो प्रदेश के समस्त प्रतियोगी छात्र लाखों की संख्या में इलाहाबाद में एकजुट होकर शासन और प्रशासन को अपनी मांगों से अवगत कराएंगे।

प्रमुख मांगे- 

1. भाषा के प्रश्न पत्र में हिन्दी को शामिल किया जाय।
2. चार अवसर की बाध्यता को समाप्त किया जाय।
3. नियमित वैकेंसी निकाली जाय।
4. भाषा के आधार पर भेदभाव बन्द हो

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