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इलाहाबाद: सड़क पर उतरे हजारों छात्र, न्यायिक सेवाओं में हिन्दी माध्यम के छात्रों के साथ भेदभाव का आरोप

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

केन्द्र और राज्य की बीजेपी सरकार हिन्दी भाषियों का वोट पाने के लिए भारतीय संस्कृति के नाम पर हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान का नारा बुलंद करने का दिखावा जरूर करती है, लेकिन हकीकत इससे बहुत दूर है।

दिखावे के लिए विभिन्न सरकारी संस्थानों में हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस मनाए जाते हैं लेकिन हिन्दी भाषा को कमतर आंककर अंग्रेजियत को बढ़ावा देने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

सरकार की इसी दोहरी मानसिकता के खिलाफ न्यायिक सेवा समानता संघर्ष मोर्चा के बैनर तले शुक्रवार को शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क पूरे प्रदेश भर से आए प्रतियोगी छात्रों का जुटान हुआ।

प्रतियोगी छात्र-छात्राओं ने उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज जूनियर डिवीजन की प्रतियोगी परीक्षा में हिन्दी माध्यम के छात्रों के साथ हो रहे भेदभाव और अवसर की बाध्यता को समाप्त करने के लिए चंद्रशेखर पार्क से एकलव्य चौराहे तक मार्च भी निकाला।

छात्रों की संख्या को देखते हुए प्रशासन की तरफ से एडीएम, एसीएम प्रथम, एसीए द्वितीय छत्रों सो ज्ञापन लेने पहुंचे। छात्रों ने अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन प्रधानमंत्री, राज्यपाल, चीफ जस्टिस उच्च न्यायालय इलाहाबाद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित करते हुए दिए।

मांग ना मानने पर धरने पर बैठे छात्र-छात्राएं- 

इसके बाद छात्र इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर स्थित संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा के सामने क्रमिक अनशन पर बैठ गए हैं जो मांगो के पूर्ण होने तक अनवरत जारी रहेगा।

क्रमिक अनशन पर बैठने वाले छात्र रामकरन निर्मल, आशीष पटेल, सुशील चौधरी, रजनी मधेशिया, सविता वर्मा, प्रतिभा जायसवाल आदि हैं।

अंग्रेजी को इतनी अहमियत क्यों ?

अभ्यर्थियों का आरोप है कि उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) की परीक्षा में भाषा का एक प्रश्न पत्र होता है जिसमें सिर्फ अंग्रेजी भाषा का एक पेपर 200 नंबर का आता है। लेकिन अन्य राज्यों में भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा का भी एक प्रश्न पत्र होता है।

लेकिन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग सिर्फ अंग्रेजी भाषा को ही स्थान देता है और हिन्दी भाषा की अनदेखी करता है। जिसमें अंग्रेजी माध्यम वाले अभ्यर्थी बाजी मार ले जाते हैं। जबकि होनहार हिंदी भाषी अभ्यर्थी विधि विषय में ज्यादा अंक लाने के बावजूद अंग्रेजी कमजोर होने की वजह से अन्तिम चयन में पीछे रह जाते हैं।

आंदोलन कर रहे प्रतियोगी छात्र आशीष पटेल का कहना है कि एक तरफ हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा बनाने के लिए विदेश मंत्री अन्य देशों का समर्थन जुटा रही हैं। दूसरी तरफ अपने ही देश में हिन्दी भाषियों के साथ भेदभाव हो रहा है.

भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के पेपर की वजह से हिंदी भाषी छात्रों को ज्यादा से ज्यादा 200 में से 15, 20, 25, 30 तक नंबर ही मिल पाते हैं।वहीं अंग्रेजी भाषी अभ्यर्थियों को 100- 150 से ऊपर तक नंबर मिल जाते हैं। इसकी वजह से हिंदी भाषी अभ्यर्थी लॉ में ज्यादा नंबर लाने के बावजूद अंग्रेजी में पिछड़ जाता है।

प्रमुख मांगे- 

1. भाषा के प्रश्न पत्र में हिन्दी को शामिल किया जाय।
2. चार अवसर की बाध्यता को समाप्त किया जाय।
3. नियमित वैकेंसी निकाली जाय।
4. भाषा के आधार पर भेदभाव बन्द हो

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