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21 दिन तक अनशन, खून से लिखे खत, अब ‘हिन्दी’ के सम्मान के लिए 12 को विधानसभा घेरेगें न्यायिक सेवा के छात्र

नई दिल्ली/लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

इलाहाबाद में 21 दिन तक क्रमिक अनशन करने, अपनी मांगों को लेकर खून से पत्र लिखने, धरना-प्रदर्शन, रैली, जुलूस निकालने के बाद भी जब गूंगी-बहरी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी तो न्यायिक सेवा के प्रतियोगी छात्रों ने आंदोलन की दिशा प्रदेश की राजधानी लखनऊ की तरफ मोड़ दी।

फिलहाल हिन्दी के मान, सम्मान, अधिकार की लड़ाई लड़ रहे न्यायिक सेवा समानता संघर्ष मोर्चा की टीम लखनऊ में छात्र-छात्राओं के साथ बैठकें कर आंदोलन को तेज करने की रणनीति बना रही है। संघर्ष मोर्चा के सदस्य अलग-अलग छात्र संगठनों के पदाधिकारियों से भी समर्थन जुटा रहे हैं।

संघर्ष मोर्चा के संयोजक आशीष पटेल ने कहा कि लकनऊ में पहले तो हमारा प्रतिनिधिमंडल प्रदेश के ज्यादातर विधायकों, कैबिनेट मंत्रियों और राज्यपाल से मुलाकात कर अपनी मांगों से अवगत करायेगा। इसके साथ ही विधायकों से अपील करेगा कि विधान सभा सत्र में उनकी मांगों को उठाया जाए।

12 जनवरी को विधानसभा के पास जुटेंगे- 

संयोजक रामकरन आर्य ने बताया कि लखनऊ के तमाम विश्वविद्यालयों, विधि कालेजों और कोचिंग संस्थानों में जाकर न्यायिक सेवा का प्रतिनिधिमंडल छात्र/छात्राओं से मिलकर आन्दोलन से जोड़ने का काम करेगा।

12 जनवरी दिन सोमवार को लखनऊ विधानसभा के पास स्थित GPO (महात्मा गांधी प्रतिमा) के पास प्रदेश के समस्त प्रतियोगी छात्र/छात्राएं बड़ी संख्या में जुटेंगे।

आंदोलन की तैयारी में जुटे सुशील चौधरी, रजनी मद्धेशिया, गजेंद्र सिंह यादव, आशीष त्रिपाठी, नीरज गोस्वामी, प्रतिभा जायसवाल, वंदना सिंह , ज्योति सिंह आदि ने छात्र-छात्राओं से अपील करते हुए कहा कि साथियों लड़ाई लम्बी है हमें धैर्य, संयम और एकजुटता के साथ इसे लड़ना होगा और जीतना होगा क्योंकि बहुसंख्यक छात्र/छात्राओं का भविष्य इससे जुड़ा है।

खून से लिख चुके हैं खत- 

सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए रामकरन निर्मल, आशीष पटेल, दिनेश चौहान, सुशील चौधरी, गजेंद्र सिंह यादव ने अपने खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री, राज्यपाल  मुख्यमंत्री को भेजा जिससे निम्न वर्गीय और मध्यम वर्गीय तथा किसानों के बच्चे भी न्यायपालिका का अंग बन सके।

हिंदी भाषी राज्य में अंग्रेजी को इतनी अहमियत क्यों ?

अभ्यर्थियों का कहना है कि उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) की परीक्षा में भाषा का एक प्रश्न पत्र होता है जिसमें सिर्फ अंग्रेजी भाषा का एक पेपर 200 नंबर का आता है। लेकिन अन्य राज्यों में भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषा का भी एक प्रश्न पत्र होता है।

लेकिन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग सिर्फ अंग्रेजी भाषा को ही स्थान देता है और हिन्दी भाषा की अनदेखी करता है। जिसमें अंग्रेजी माध्यम वाले अभ्यर्थी बाजी मार ले जाते हैं।

भाषा के प्रश्न पत्र में अंग्रेजी के पेपर की वजह से हिंदी भाषी छात्रों को ज्यादा से ज्यादा 200 में से 15, 20, 25, 30 तक नंबर ही मिल पाते हैं।वहीं अंग्रेजी भाषी अभ्यर्थियों को 100-150 से ऊपर तक नंबर मिल जाते हैं। इसकी वजह से हिंदी भाषी अभ्यर्थी लॉ में ज्यादा नंबर लाने के बावजूद अंग्रेजी में पिछड़ जाता है।

प्रमुख मांगे- 

1. भाषा के प्रश्न पत्र में हिन्दी को शामिल किया जाय।

2. चार अवसर की बाध्यता को समाप्त किया जाय।

3. नियमित वैकेंसी निकाली जाय।

4. भाषा के आधार पर भेदभाव बन्द हो

गूंगी-बहरी सरकार तक बात पहुंचाने के लिए न्यायिक सेवा के प्रतियोगी छात्रों ने लिखे खून से खत

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