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भगवाराज: धर्म की चासनी में लपेटकर खत्म हो रहा है आरक्षण, अब DU की M.Phil परीक्षा में OBC-SC-ST के साथ साजिश

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

बहेलिया आएगा जाल बिछाएगा हमको फंसाएगा लेकिन हम फंसेंगे नहीं. इस कहानी की तरह ओबीसी की स्थिति हो गई है कि दिन भर रटेगा आरक्षण पर हमला बर्दाश्त नहीं करेंगे, अरे भाई कैसे नहीं करोगे ? अब कर तो दिया आरक्षण पर हमला, हर दिन खत्म तो हो रहा है आरक्षण अब और कितना हमला करवाओगे?

देशभर के सभी केन्द्रीय संस्थानों और परीक्षाओं में ये खेल शुरू हो गया है। आरक्षित वर्ग को सिर्फ उनके आरक्षण तक सीमित कर दो। भले ही आरक्षित  श्रेणी के किसी छात्र-छात्रा ने प्रवेश परीक्षा में टॉप किया हो लेकिन उन्हे सिर्फ आरक्षित श्रेणी में डाल दो यानि सवर्णों को खुले तौर पर 50.5 प्रतिशत आरक्षण सौंप दिया गया है।

शायद पिछड़े तो धर्म की चासनी में लिपटे हैं और राममंदिर के इंतजार में हैं। जहां ब्राह्मण पुरोहितों के साथ ओबीसी के बच्चे दरी बिछाने और मजीरा बजाने का काम करेंगे।

जेएनयू विश्वविद्यालय के शोधार्थी धर्मवीर यादव गगन ने दिल्ली विश्वविद्यालय का खेल हम तक पहुंचाया है।

समझिए पूरा खेल- 

दिल्ली विश्वविद्यालय की एम फिल हिंदी प्रवेश परीक्षा में 78 सफल अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया है। जिसमें ओबीसी के 21 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के योग्य पाया गया। यानि ओबीसी के लिए निर्धारित आरक्षण 27 प्रतिशत  को ही बुलाया गया। 27 फीसदी के अतिरिक्त किसी भी ओबीसी संवर्ग के अभ्यर्थी को इस सूची में जगह नहीं मिल सकी है । ठीक यही प्रक्रिया एससी, एसटी संवर्ग के साथ दोहराई गयी है।

वे ओबीसी, एससी, एसटी अभ्यर्थी जिनकी कंबाइंड (ओपन) रैंक दूसरी, चौथी, दसवीं ….आदि है। उन्हें भी अनारक्षित श्रेणी में जगह नहीं दी गयी है। वे अपने निर्धारित कोटे में ही साक्षात्कार के लिए बुलाए गए हैं। जिसका सीधा नुकसान आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को हो रहा है। वे अच्छी रैंक लाने के बावजूद भी प्रवेश प्रक्रिया से बाहर हैं।

सवर्णों को अघोषित तौर पर  50.5 प्रतिशत आरक्षण थमा दिया गया है। अब बड़ा सवाल ये है कि आरक्षण आरक्षित वर्ग की हिस्सेदारी देने के लिए हैं या उनकी संख्या सिर्फ 27 प्रतिशत तक सीमित कर देने के लिए।

शोधार्थी धर्मवीर यादव गगन लिखते हैं कि- 

खास जाति विशेष के लोगों को 50 फीसदी अघोषित आरक्षण मिल रहा है । क्या इसी व्यवस्था को लागू किये जाने के लिए आरक्षण है ?
कौन सा सामाजिक न्याय पुष्ट हो रहा है ? किन वर्गों का हित हो रहा है इस तरह के आरक्षण से ? प्रवेश परीक्षा का यह आलम है तो नौकरियों में क्या होगा ?

ओबीसी, एससी, एसटी के कितने फीसदी लोग उच्च शिक्षा में हैं ? क्या इसी प्रक्रिया के तहत उनकी जगह सुनिश्चित होगी । जिस तरह से प्रवेश लिया जा रहा है ?

वे लोग जो सामाजिक न्याय के पुरोधा हैं हर मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर करते हुए देखे जाते हैं । क्या उनके लिए यह कोई मुद्दा नहीं है । उनकी नाक के नीचे यह हरसाल क्या होता है ? क्या उन्हें यह दिखाई नहीं देता है ?

जबतक ओवरलैपिंग नहीं होगी आरक्षण का क्या मतलब है ? दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रवेश परीक्षा परिणाम पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।

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