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संसदीय कमेटी ने मोदी सरकार को घेरा, संस्थानों में खाली पड़े OBC पदों पर भर्ती के लिए सरकार गंभीर नहीं

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

आरक्षण को धीरे-धीरे खत्म करने, जेएनयू में ओबीसी का एक भी प्रोफेसर ना होने और ओबीसी विरोधी सरकार होने के आरोपों के बीच ओबीसी कल्याण के बनी संसदीय समिति ने विश्वविद्यालयों में ओबीसी शिक्षकों के खाली पदों को लेकर मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है।

संसदीय समिति ने सरकार से पूछा है कि केन्द्रीय संस्थानों और विश्वविद्यालयों में बैकलॉग के खाली पदों को क्यों नहीं भरा जा रहा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार ओबीसी मामलों की संसदीय समिति ने मोदी सरकार से सवाल किया है कि देश के तमाम विश्वविद्यालयों और तकनीकि संस्थानों में बड़े ओबीसी शिक्षकों के पदों को क्यों नहीं भरा जा रह है।

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मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी इस मामले में कोई सही तर्क संसदीय कमेटी के सामने नहीं रख पाए। समिति ने सरकार के इस तर्क को सिरे से नकार दिया है जिसमें सरकार ने कहा था कि ओबीसी के योग्य शिक्षक ही नहीं मिल पा रहे हैं।

इन विश्वविद्यालयों में खाली है ओबीसी शिक्षकों के पद – 

विश्व भारती  वि.वि.- 50

हरि सिंह गौर वि.वि. सागर- 45

गुरु घासी दास वि.वि.- 44

पांडिचेरी विश्विविद्यालय-34

तेजपुर विश्वविद्यालय- 33

असम विश्वविद्यालय-  32

दिल्ली विश्वविद्यालय- 32

इलाहाबाद विश्वविद्यालय- 32

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समिति ने साफ तौर पर कहा कि ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण को पूरा करने के लिए केन्द्र सरकार का कोई भी शिक्षण संस्थान पूरी तरह से वफादार नहीं है। जो भी भर्तियां हुई हैं वो खाना पूर्ति के लिए की गई हैं।

राज्यसभा सांसद शऱद यादव ने उठाया था मामला- 

सांसद शरद यादव ने कुछ ही दिन पहले कहा था कि केन्द्र के सभी ग्रुपों में ओबीसी का प्रतिनिधित्व अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से कम है। इसका साफ मतलब है कि ओबीसी आरक्षण नीति को ईमानदारी से लागू नहीं किया गया। शरद यादव का आरोप था कि हर प्रकार की कोशिश की गई कि ओबीसी को केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानों में आरक्षण न मिले।

ये कोशिशें साफ झलकती हैं। ओबीसी वर्ग के लोगों को नौकरियों में आरक्षण न दिए जाने की कोशिशें किसी को दिखाई नहीं देतीं। केंद्र सरकार की नौकरी पाने के इच्छुक ओबीसी वर्ग के लोगों का शोषण किया गया है।

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शरद यादव  ने मांग की थी कि ओबीसी वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण नीति लागू न किए जाने और उन्हें आरक्षण के लाभों से वंचित किए जाने की कोशिशों की जेपीसी से जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार में बैठे लोग जानबूझकर ओबीसी को नौकरियों में आरक्षण नहीं देते और उनका कोटा खाली रह जाता है।

जेएनयू में ओबीसी शिक्षकों के मसले पर संघर्ष कर रहे हैं छात्र- 

26 दिसंबर को जेएनयू में विद्वत परिषद की बैठक के दौरान 9 छात्रों ने हिस्सेदारी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था. छात्रों का आरोप था कि पीएचडी में जो वायवा होता है उसमें ओबीसी-एससी छात्रों के साथ भेदभाव होता है. इसलिए पीएचडी के लिए होने वाले वायवा के अंकों को कम करके उसे लिखित परीक्षा में जोड़ा जाए.

इसके अलावा यूजीसी द्वारा पीएचडी के नियमों में बार-बार बदलाव करके ओबीसी-एससी के छात्रों की संख्या कम करने के  लिए की जा रहीं साजिशों का विरोध भी किया था। प्रदर्शन में शामिल प्रशांत निहाल ने बताया कि इतने सालों से आरक्षण मिलने के बाद भी जेएनयू कैम्पस में ओबीसी का कोई भी प्रोफेसर क्यों नहीं है? छात्रों ने कहा कि प्रशासन भेदभाव के चलते ओबीसी-एससी के शिक्षकों को प्रोफेसर तक आने ही नहीं देता.

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इन्ही मुद्दों पर नौ छात्रों को किया गया था  निलंबित- 

इसी मुद्दे को आधार बनाते हुए शकील अंजुम, मुलायम सिह यादव, दिलीप कुमार यादव, दिलीप कुमार, भूपाली विट्ठल, मृत्युंजय सिंह यादव,दावा शेरपा, एस राहुल, प्रशांत कुमार निहाल को निलंबित कर दिया गया था। बाद में फाइन करने के बाद दिलीप यादव को छोड़कर सभी छात्रों को रजिस्ट्रेशन दे दिया गया।

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