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उत्तरी गुजरात के गांवों में रहने वाले पाटीदारों का गुस्सा बिगाड़ सकता है मोदी खेमे का खेल

मेहसाणा/ नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

गुजरात के उत्तरी हिस्सों के मेहसाणा, पाटन और गांधीनगर जिलों में पाटीदारों का दबदबा है. वे न सिर्फ राजनीतिक तौर पर बल्कि सामाजिक तौर पर भी काफी प्रभावशाली हैं.

पाटीदार यहां का सबसे बड़ा भूमिपति समुदाय है. यह एक समय राज्य का सबसे धनवान कृषक समुदाय हुआ करता था. उन्होंने काफी होशियारी के साथ कृषि से हुई अतिरिक्त आमदनी का निवेश विभिन्न छोटे और मझोले उद्योगों में किया है.

यह इलाका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्य के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल और कई अन्य शीर्ष भाजपा नेताओं का घर है. पिछले तीन दशकों से पाटीदार, भगवा पार्टी के पीछे चट्टान की तरह खड़े रहे हैं.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में भाजपा के बेहद ताकतवर संगठन की रीढ़ यह समुदाय ही रहा है. लेकिन, अब यह क्षेत्र पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) की गतिविधियों का केंद्र बन गया है.

हार्दिक पटेल द्वारा गठित, पास ने 2015 के मध्य में पाटीदारों के लिए अनामत या आरक्षण की मांग को लेकर बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया.

पाटीदार किशोर की आत्महत्या से भड़का गुस्सा- 

पाटीदार समुदाय के किशोर की आत्महत्या ने इस आंदोलन को सुलगाने का काम किया था, जो इंटरमीडिएट की परीक्षा में 90 फीसदी से ज्यादा नंबर लाकर भी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला पाने में नाकाम रहा था.

पुलिस फायरिंग की विभिन्न घटनाओं में कुछ प्रदर्शनकारियों की मृत्यु ने इस समुदाय के गुस्से को और भड़का दिया. आखिर गुस्से के ज्वालामुखी के इस तरह से फटने का कारण क्या था ?

पाटीदार समुदाय राज्य के संपन्न तबकों में से था और उसे भाजपा का संरक्षण भी हासिल था। लेकिन गुजरात के विकास के मॉडल से पैदा हुई आर्थिक दरार, जिसे कई अध्ययनों ने उजागर किया है, इस बात का गवाह है कि वास्तव में यह गुस्सा पिछले कई सालों से भीतर ही भीतर जमा हो रहा था.

गहराता जा रहा कृषि संकट, पाटीदार में उबाल- 

लगातार गहराते जा रहे कृषि संकट के लंबे दौर और हाल के वर्षों में उनके छोटे और मझोले व्यापारों में हुए घाटों ने युवा पाटीदारों को रोजगार की तलाश करने के लिए मजबूर कर दिया है. हालांकि, उनकी पहली पसंद अब भी सरकारी नौकरियां हैं, जो पहले से ही कम हैं.

मूंगफली और अरंडी की खेती करने वाले जयंती लाल पटेल ने बताया, ‘देखिए, हम अपनी पूरी जिंदगी किसानी का काम करते रहे हैं. हम अच्छी कमाई किया करते थे, लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं हैं.

मोदी ने हमसे नहर के पानी का वादा किया था. लेकिन, अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं हुआ है. पिछले चार सालों में हमें खेती में लगातार नुकसान उठाना पड़ा है. हमें यह चिंता होती है कि हमारे बच्चे क्या करेंगे?

विनोद पटेल ने कहा, ‘हम पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर नहीं रह सकते हैं. इसलिए हम बोरिंग पंप में निवेश करने वाले पर निर्भर रहते हैं. पानी निकालने के लिए हमें जमीन से कम से कम 12,00 फीट नीचे तक गड्ढा खोदना पड़ता है.

इसमें करीब 22-23 लाख की लागत आती है. इस गांव के करीब 100 किसान पूरी तरह से इस पर निर्भर हैं. लेकिन, इस पर बहुत ज्यादा कमीशन देना पड़ता. हमें अपनी फसल का एक तिहाई पंप में निवेश करने वाले को देना पड़ता है.’

ऐसे में जबकि राज्य दिसंबर, 9 और दिसंबर, 14 के चुनावों के लिए कमर कस रहा है, उत्तरी गुजरात के गांवों के बहुसंख्यक पाटीदार भाजपा के खिलाफ वोट देने के लिए कृतसंकल्प नजर आते हैं.

आम आदमी पार्टी उत्तरी गुजरात के कुछ सीटों पर मैदान में है. भाजपा को सत्ता से बेदखल करने की इच्छा पाटीदारों में सबसे प्रमुख है और इस बात ने गांवों के सामाजिक समीकरणों को काफी हद तक बदलने का काम किया है.

बदलता सामाजिक समीकरण-

पाटीदारों ने 1981 और 1985 में तब के मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी द्वारा कांग्रेस की तरफ से तैयार किए गए क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम (खाम) के सामाजिक गठबंधन के खिलाफ चले आरक्षण विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया था.

भाजपा ने इस भावना को भुनाया और गुजरात में पाटीदारों और अन्य उच्च जाति समूहों के अपने परंपरागत समर्थकों की मदद से गुजरात में अपना संगठन खड़ा किया.

गुजरते वर्षों में भाजपा ने अपनी हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाया. वोटिंग की बारी आने पर हिंदुओं के बहुसंख्यक समूहों को आपस में जोड़ने वाला धागा यही बना.

दो चीजों ने राज्य में भाजपा को मजबूत बन कर उभरने में मदद की. इसमें एक था- मोदी द्वारा राज्य में बुनियादी ढांचे पर जोर दिया जाना और दूसरा था, ‘हिंदू हृदय सम्राट’ वाली उनकी छवि, जिसे उन्होंने काफी जतन से गढ़ा था.

भाजपा भले अपनी लगातार मिली जीतों का श्रेय विकास को देती हो, लेकिन जमीन पर होनेवाले चुनाव वास्तव में हिंदू बनाम मुस्लिम की राजनीति का अखाड़ा बन गए.

लेकिन, अधिकतर हिंदू समूहों को भावनात्मक रूप से आपस में जोड़ने की यह दोहरी रणनीति अब उत्तरी गुजरात में दरकती दिख रही है.

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