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जातिवाद के खिलाफ एक PCS अधिकारी के क्रोध को दर्शाती कविता-“ये कौन तय करेगा कि सच क्या है” ?

लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

उत्तर प्रदेश सरकार के रवैये के खिलाफ आम जनमानस में ही नहीं ईमानदार और स्वाभिमानी नौकरीपेशा लोगों और नौकरशाहों में भी आक्रोश है। हाल फिलहाल दलित और पिछड़ों के खिलाफ घटित हुईं घटनाओं को देखते हुए इस आक्रोश को और बल मिला है।

अजय सिंह विष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के बाद उत्तर प्रदेश में बह रही सवर्णवाद और ठाकुरवाद की बयार में वंचित तबके के लोग खुद को ठगा महसूस कह रहे हैं।

ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर नियुक्तियों और शासन सत्ता में जातिवाद का बोलबाला है, जिसे धर्म और राष्ट्रवाद की चासनी में दबाने की कोशिश की जा रही है। इसी से क्षुब्ध उत्तर प्रदेश सरकार के एक पीसीएस अधिकारी ने अपने मन की वेदना को इस कविता के रूप में उकेरा है।

सच क्या है ?

ये कौन तय करेगा कि
सच क्या है
ये कैसे तय होगा कि सच क्या है

तुम्हारे कहे हुए पे हम
बाग बाग हो जाये
खुश होके तुम्हारी भीड़ में
शामिल हो जाये
तालियां बजाए
तुम्हारे नारे जयकारे लगाए
तो हर झूठ सच है
अविवादित मुख्यधारा है

लेकिन जब हम नारे लगाए
खुद की जीत के
जय जय भीम के
नमो बुद्धाय और जै अर्जक के
तुम्हारी चोटी खड़ी हो जाती है
भृकुटि तन जाती है
जनेऊ चरमरा जाते हैं

तिलक का लाल रंग बहकर
नथुनो में घुस जाता है
और आतंकित होकर तुम
रचने लगते हो षड्यंत्र
समूह के खिलाफ

जो जनतंत्र के झंडे को
शान से लहराते हुए
गलियों चौराहों से होते हुए
इकट्ठा हो गया है
शहर के चौक पे

आज वो आमादा है
कब्जा करने को
अपने हिस्से के हर स्पेस को
देखते हैं कौन रोकता है
मानवतादी मेहनतकशों को
उनके नेक इरादों को पूरा करने से

क्रांति पथ पर चलने से
ए एलान है कल के शानदार
ललाई हुई सुबह का
जो तटस्थ रहेंगे
अंधेरा उनके हिस्से बेशक आएगा
तब पता चल जाएगा कि
सच क्या है?

(रचनाकर उत्तर प्रदेश सरकार में पीसीएस अधिकारी हैं)

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