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सामाजिक लेखक PCS राकेश पटेल के कविता संग्रह ‘नदियां बहती रहेंगी’ पर रामजी यादव की सटीक समीक्षा

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

राकेश कबीर के नाम से कविताएं लिखने वाले डॉ. राकेश पटेल उत्तर प्रदेश सरकार में पीसीएस अधिकारी हैं। यूपी पीएससी में चयनित होने के बाद आपने अध्यापन जारी रखा और देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरु वि.वि. दिल्ली से अपनी पीएचडी डिग्री हासिल की।

बेहद सामाजिक सोच से भरे राकेश पटेल का कविता संग्रह ‘नदियां बहती रहेंगी’ छपकर आ चुका है। जल्द ही इसका विमोचन लखनऊ में बुद्धिजीवियों की मौजूदगी में होगा।

इस कविता संग्रह और क्रांतिकारी विचारों के लेखक/कवि राकेश पटेल के लेखन के बारे में गांव के लोग पत्रिका के सम्पादक रामजी यादव ने बेबाक टिप्पणी की है। कम शब्दों में उन्होंने राकेश जी की लेखन शैली और कविता संग्रह का मूल निचोड़ बता दिया है।

राकेश पटेल हिंदी कविता में तेजी से जगह बनाने वाले ऐसे युवा कवि हैं जिन्हें निरंतर रंग-रूप बदलती और विचलित होती दुनिया में भी कल पर अटूट भरोसा है।

अपनी एक कविता ‘आरोपित’ में वे कहते हैं मैं आज आरोपित हूँ तो तुम जो चाहे सो कर सकते हो। तुम्हारे पास अखबार, पत्रकार, नेता, अफसर , कोर्ट-कचहरी और वकील सबकुछ हैं। आज मैं निहत्था हूँ और तुम कुछ भी कर सकते हो।

मेरे सामने बेशुमार मुश्किलें हैं लेकिन जीतूंगा मैं ही। निश्चित रूप से राकेश जब कहते हैं कि मेरे सामने बेशुमार चुनौतियां हैं और तुम्हारे हाथ में सब कुछ है तो वे एक निरंतर चलनेवाले संघर्ष में ‘सबकुछ’ पर काबिज लोगों के षडयंत्रों से मिलनेवाली उन पराजयों की बात करते हैं जिनकी शृंखला सुदूर अतीत से चली आ रही है।

बावजूद इसके प्रतिरोध इतना गहरा है कि उम्मीद का दामन छूटने नहीं पाता। इसलिए कल पर कवि का अटूट भरोसा है। कल पर अटूट भरोसा ही राकेश के कवि की अपनी जमीन है जहां से वे अपनी रचनात्मकता की फसल को हरा-भरा करते हैं ।

आखिर ये भरोसा और उम्मीद बनी कहां से है- 

लेकिन यह उम्मीद और भरोसा बनता कहाँ से है ? इसकी छानबीन करना इसलिए जरूरी है ताकि यह जाना जा सके कि राकेश की ज़मीन पर जो कविता उग रही है वह कैसी है ? उनमें अपने दौर से कितनी वाबस्तगी है ? वे अपनी कविताओं के दायरे में कितना वर्तमान और अतीत ले आते हैं और उनकी वास्तविक चिंताएँ क्या हैं ?

राकेश की कविताओं का एक अवलोकन हमें उनके मनोलोक में ले जाता है जहां वे अपने समय के जीवन-जगत और उसके रोज़मर्रा से अपने स्तर पर जूझते प्रतीत होते हैं और तब पता चलता है कि दरअसल उनके कवि-कर्म में रिश्तों, प्रेम , दाम्पत्य, दोस्तों, व्यस्तताओं, निजी जीवन के राग-द्वेषों और संघर्षों से लेकर प्रकृति, पर्यावरण, अजनबीयत का मेल है।

नए राजनीतिक व्याकरण को आंखों पर पट्टी बांधे पढ़ते हुए लोग, सामाजिक अन्याय और सांस्कृतिक अंधापन बांटते लोग, विनाशकारी विकास और उसके फलस्वरूप जीवन खोते लोग, प्रकृति और प्राणी तक शामिल हैं।

इस विशाल दायरे से गुजरते हुए हम जान पाते हैं राकेश जिस दुनिया को अभिव्यक्ति का विषय-वस्तु बनाते हैं वह उस तरह साधारण नहीं है।जिस तरह सदियों से उसकी उपेक्षा करनेवाले लिक्खाड़ और कवि करते रहे हैं बल्कि इस अर्थ में असाधारण दुनिया है कि इस दुनिया से ही भारत में लोकतन्त्र की मशाल जल रही है । बेशक इस दुनिया का बड़ा हिस्सा अभी भी अंधेरे में डूबा हुआ है ।

राकेश के नाम के आगे कबीर क्यों है ? 

राकेश अपने नाम के आगे कबीर जोड़ते हैं। यह जोड़ना महज एक नाम का जोड़ना नहीं है बल्कि इस बहाने अपनी परंपरा को खोजना और उसकी भूमिका से स्वयं को जोड़ लेना है। कबीर किस प्रकार मेहनतकश समुदायों को शिक्षित करते हैं? और किस प्रकार उनकी बेड़ियों की शिनाख्त करते हैं? यह देखना और समझना आज के समकालीन जीवन को देखना और समझना है।

खासतौर से तब जब फांसीवाद धर्म और संस्कृति के नाम पर षड्यंत्रों और झूठ के चरम पर जाकर जनता को मूर्ख बना रहा है। समाज हो चाहे विश्वविद्यालय या कार्यस्थल। हर कहीं ये प्रक्रियाएँ तेजी से जीवन के खिलाफ घात कर रही हैं। राकेश जब इनके प्रति अपनी दृष्टि को विकसित करते हैं तो वास्तव में उन्हें कबीर ही अपने सच्चे पूर्वज लगते हैं।

कविता के पात्र दबे-कुचले लोग हैं- 

राकेश, उनसे कथन में ईमानदारी और भाषा में तल्खी सीखते हैं। थोड़ा और विस्तृत ढंग से देखा जाय तो राकेश की कविता के जो पात्र हम पाते हैं वे अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थितियों के चलते दलित और पिछड़ी जातियों से आते हैं और उन जातियों को देश के बौद्धिक और राजनीतिक विमर्शों, भाषणों, परियोजनाओं में बहुत ज्यादा जगह मिली हुई है।

इसके बावजूद वास्तविकता बिलकुल भिन्न है। इन जातियों को उनका वाजिब हक आज तक नहीं मिला। वे अनवरत गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण और असुरक्षा के दायरे में बनी हुई हैं। इसी कारण से उनके शोषक अनेक प्रकार के राजनीतिक पाखंडों के माध्यम से उन्हें बार-बार बेवकूफ बनाते और धोखा देते हैं।

राकेश इस सच को बहुत अच्छी तरह पकड़ते हैं लेकिन एक बात जो गौर करनेवाली है वह है कि वे इन जातियों को एक विशाल मेहनतकश वर्ग के रूप में चित्रित करते हैं । वे उनकी जीवन-स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों के साथ ही उनके शोषण और सामाजिक उत्पीड़नों को जब चित्रित करते हैं तो एक वर्ग के रूप में उनके ऊपर लदी हुई शोषक व्यवस्था के प्रायः अनेक रूपों को पहचानने की कोशिश करते हैं।

जाति, वर्णव्यवस्था के नागों को वे पहचानते हैं- 

वे मेहनतकश वर्ग के चारों ओर कुंडली मारे जाति-धर्म, वर्णव्यवस्था के पैने दाँतों वाले नागों को सही ढंग से पहचान लेते हैं। इस प्रकार राकेश की कविताओं में सदियों के दंश और संताप के बरक्स अपनी मेहनत से खड़े किए गए एक सुदृढ़ वर्तमान के साथ एक उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद है।

और इस उम्मीद के साथ ही बार-बार अपने समाज की ओर लौटकर उसका हालचाल जानने और उसके साथ जुड़ जाने की गहरी ललक और बेचैनी दिखाई देती है।

प्रकृति राकेश को जितना अपनी ओर खींचती और रोमांचित करती है उससे अधिक उन्हें तकलीफ से भरती भी है । वे पहाड़ों के कटने और नदियों के सूखते जाने से बहुत गहरी पीड़ा महसूस करते हैं । जैसे लगता है कि नदियों का सूखना उनके भीतर एक अवसाद भरता है ।

नदियों पर उनकी कई कवितायें हैं। सीतापुर शहर में सूखती हुई सरायन नदी हो या जौनपुर की सई, गोमती या बनारस की वरुणा। सभी के सूखते जाने की समान पीड़ा राकेश की कविताओं में है।

खेतिहर मजदूरों की समस्याओं की झलक- 

वे पिछड़ी जाति के एक कृषक परिवार से आते हैं जहां सामाजिक रूप से जाति-दंश का शिकार भले न होना पड़ा हो लेकिन आर्थिक स्थितियों के कारण विपत्तियों का अंत नहीं था। इसलिए राकेश की कविताएं पर्याप्त रूप से खेतिहरों, मजदूरों, किसानों और दस्तकारों की तर्जुमानी करती हैं। उनके छोटे-छोटे सुख-दुख राकेश बहुत संवेदनशीलता से पकड़ते हैं ।

राकेश के राजनीतिक दृष्टिकोण की एक विशिष्टता संविधान और लोकतंत्र में गहरा भरोसा है। इस भरोसे की बिना पर अपने लिए बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। राकेश मानते हैं कि सदियों के जाति-वर्चस्व और वर्णवाद को इस भरोसे से चुनौती दी जा सकती है। लेकिन मामले को जब वे इसके उलट देखते हैं तो पीड़ा और आक्रोश से भर उठते हैं।

राकेश जिस वर्ग से आते हैं वो पिछलग्गू बना हुआ है- 

लेकिन वे हताशा के कवि नहीं हैं। वे उम्मीद के कवि हैं। उनकी उम्मीदें इसलिए भी ठोस और वास्तविक हैं क्योंकि वे जिस सामाजिक-वर्ग से आते हैं वह निर्माणकारी है। उसके बिना खेती, पशुपालन, कल-कारखाने, ट्रेनें, मोटरें, बंदूकें सब कुछ धरी की धरी रह जाएंगी।

उनका समाज भले ही आज दिशा भ्रम का शिकार हो अथवा तात्कालिक फ़ायदों के दुष्चक्र में लिपटा हो लेकिन कल जब उसे समझ आएगा तो वह एक नए निर्माण के लिए पुराने को उतनी ही शिद्दत से ध्वस्त कर देगी जितनी गंभीरता से आज वह किसी की पिछलग्गू है।

राकेश इसी उम्मीद के कवि हैं। जिसके भीतर एक अनगढ़ता, ज़िंदा मिजाज और गर्मजोशी है। जो आज के जीवन को उसके गझिन रंगों में उकेरना चाहता है और कल की उम्मीदों से भरा हुआ है।

राकेश का संकलन ‘नदियां बहती रहेंगी’ उनके प्रति एक उम्मीद जगाता है । लोग इसमें एक युवा कवि के कई शेड्स देख सकेंगे। धन्यवाद !

कविता संग्रह ऑनलाइन देखने के लिए notnul.com पर जाकर देख और डाउनलोड कर सकते हैं।

( वरिष्ठ पत्रकार लेखक रामजी यादव द्वारा लिखी गई प्रस्तावना का सम्पादित अंश )

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