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पेरियार ललई के साहित्य की खोज में धर्मवीर यादव गगन पहुंचे पेरियार की भूमि तमिलनाडु

चैन्नई। नेशनल जनमत, ब्यूरो। दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र धर्मवीर यादव गगन उत्तर भारत के पेरियार ललई सिंह यादव की साहित्यिक रचनावली और उनके बहुजन चिंतन की खोज में ई.वी. रामास्वामी पेरियार की धरती तमिलनाडु पहुंचे हुए हैं. आपको बता दे कि धर्मवीर पिछले दो सालों से उत्तर भारत के पेरियार ललई सिंह यादव की साहित्यिक रचनावलियों की खोज में सारे देश में घूम रहे हैं.

उन्होंने पेरियार ललई की साहित्यिक रचनावली की खोज में कानपुर के झींझक गांव ( पेरियार ललई सिंह यादव का पैतृक गांव) से लेकर इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, बनारस, गोरखपुर, बांदा, चित्रकूट, नागपुर, मुम्बई, लुधियाना, चंड़ीगढ़ आदि जिलों का दौरा करके अब चैन्नई की तरफ रुख किया है.

अपने इन दौरों पर धर्मवीर ने उन लोगों की खोज की जो पेरियार ललई के साथ काम करते थे. या उनके वैचारिक आंदोलन के सहभागी थे. अपने चैन्नई प्रवास को फेसबुक पर साझा करते हुए धर्मवीर लिखते हैं कि ..

तमिल भूमि अर्थात् तमिलनाडु से …..

जब ‘ललई’ से हुए ‘पेरियार ललई’ ……..

इनका शुरुआती नाम चौधरी ललई सिंह यादव ‘अहीर’ था l

ये बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण समारोह में जाना चाहते थे l बौद्ध धर्म ग्रहण करना चाहते थे .  स्वास्थ्य ख़राब ( टीबी की बीमारी व खून की उल्टी ) होने के कारण ये वहां नहीं जा सके .  इसके बाद इन्होंने 21 जुलाई, 1967 ई. को कुशीनगर जाकर ‘ऊ चन्द्रमणि जी’ से  बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी . डॉ. अम्बेडकर ने भी ऊ चन्द्रमणि जी से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी .

इस तरह आप गुरुभाई हुए . इस बौद्ध धर्म की दीक्षा के बाद इन्होंने अपने नाम के साथ जुड़े चौधरी, सिंह, यादव, अहीर उपमानओं का त्याग कर दिया और एक सार्वजनिक घोषणा की कि, “आज से मैं मानवतावादी मनुष्य हूँ .अब न तो मेरी कोई जाति है न कोई वर्ण l अब मैं सिर्फ और सिर्फ ‘ललई’ हूँ l” इसके बाद 24 दिसम्बर, 1974 ई. को पेरियार ई.वी. रामास्वामी का निर्वाण हुआ .उनकी स्मृति में 30 दिसम्बर, 1974 को उनके घर एक महान स्मृति-सभा का आयोजन किया गया .

जिसमें इस देश के साथ पूरी दुनिया के महान बुद्धिजीवी, आंदोलनकर्मी आदि पेरियार के घर ‘इरोड’ पर एकत्रित हुए . इस स्मृति-सभा में एकत्रित होने वालों की संख्या लगभग 12 से 15 लाख थी . इसमें पेरियार इरोड वेंकट रामास्वामी की स्मृति में सभी अपने विचार रख रहे थे . ललई भी अपना विचार रखने मंच पर गए l पेरियार ई.वी. रामास्वामी की ही तरह इन्होंने मिथक, धर्म और संस्कृति पर अपना विचार रखना शुरू किया .

पेरियार रामास्वामी की ही तरह ललई भी कड़क आवाज में मिथक और धर्म पर तार्किक-तथ्यात्मक प्रहार कर रहे थे . लोगों को लगा कि जैसे पेरियार रामास्वामी ही हम सभी को संबोधित कर रहे हों . वहां उपस्थित जनता हैरत में थी . इनके इस व्यक्तित्व से प्रभावित होने के कारण उपस्थित जनता ने कहा – ‘ये तो हमारे नए पेरियार हैं l.आज हमें पेरियार मिल गये l अब हमारे नए पेरियार यही होंगे .

इस तरह ‘ललई’ से ‘पेरियार ललई’ हो गए l वहीं से इन्हें जनता ने ‘उत्तर भारत का पेरियार’ कहना शुरू किया l इस प्रकार ‘उत्तर भारत के पेरियार’ ‘पेरियार ललई’ हुए .

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