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कर्मकांड जो ज्यादा करता, समझो पिछड़ा है…. पढ़िए पिछड़ेपन की परिभाषा और कारण बताती एक कविता

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

बौद्धिक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व पीसीएस अधिकारी राजकुमार सचान होरी एक कविता के माध्यम से बताने की कोशिश कर रहे हैं कि पिछड़ा कौन है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने पिछड़ों की सोच को झकझोरने की कोशिश भी की है।

कर्मकांड जो ज्यादा करता ,समझो पिछड़ा है ।
खेत किसानी में ही मरता ,समझो पिछड़ा है ।।
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गैरों से तो मेल मुहब्बत भाई चारा सब कुछ है,
अपनों से बस ज़्यादा लड़ता, समझो पिछड़ा है ।
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भांति भांति के कामों में तो खून पसीना एक करे,
बौद्धिक काम छोड़ कर रहता ,समझो पिछड़ा है ।
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सामाजिक संगठन ढेर से कांव कांव संगीत वहां,
फिर भी राहें सदा भटकता , समझो पिछड़ा है ।
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पीढ़ी दर पीढ़ी का रोना पिछड़ेपन का चालू है,
मगर मर्ज को नहीं पकड़ता, समझो पिछड़ा है ।
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बौद्धिक संघ बना है बन ले लाभ न ले जो इसका भी,
अमृत को भी जहर समझता ,समझो पिछड़ा है ।
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गांव गांव में सजीं बस्तियां पिछड़ेपन की मंडी में,
दूर दूर शहरों से रहता, समझो पिछड़ा है ।
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बड़ा वीर है चौड़ी छाती फिर भी पिछड़े का पिछड़ा,
अधिकारों की जंग से डरता ,समझो पिछड़ा है ।
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बौद्धिक वर्गों को गाली दे पानी पी पी कर कोसे,
‘होरी’ बौद्धिक कभी न बनता ,समझो पिछड़ा है ।
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